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‘सहकारिता’ मंत्रालय (Ministry of Cooperation)

Ministry of Cooperation

वर्तमान संदर्भ

  • 6 जुलाई, 2021 को केंद्र सरकार ने ‘सहकार से समृद्धि’ के विजन को साकार करने के लिए एक अलग सहकारिता मंत्रालय का गठन किया है।
  • इस नए मंत्रालय का कार्यभार अमित शाह (गृह मंत्री) काे सौंपा गया है।
  • वर्ष 2021-22 की बजट घोषणा में, वित्त मंत्री ने सहकारिता को बढ़ावा देने की बात कही थी।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • कारण-
  • यह देश में सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने के लिए एक अलग प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत ढांचा प्रदान करेगा।
  • यह सहकारी समितियों के लिए ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की प्रक्रियाओं को कारगर बनाने और ‘बहु-राज्य सहकारी समिति, व्यक्तियों का एक स्वायत्त समितियों’ के विकास को सक्षम बनाने के लिए कार्य करेगा।

सहकारी समिति

  • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, सहकारिता ऐसे व्यक्तियों की एक स्वायत्त संस्था है जो अपनी सामान्य आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जरूरतों तथा अपेक्षाओं को संयुक्त स्वामित्व एवं प्रजातांत्रिक विधि से नियंत्रित उद्यमों के माध्यम से पूरा करती है।
  • सहकारी समितियां कई प्रकार की होती हैं, जैसे उपभोक्ता सहकारी समिति, उत्पादक सहकारी समिति, ऋण सहकारी समिति, आवास सहकारी समिति, और विपणन सहकारी समिति आदि।
  • भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसने विश्व में सबसे बड़े सहकारी आंदोलन की नींव रखी।
  • सहकारिता के महत्व को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2012 को ‘सहकारिता का अंतरराष्ट्रीय वर्ष ’ घोषित किया था।

लोक उद्यम विभाग (Department of Public Enterprises)

  • 6 जुलाई, 2021 को एक अधिसूचना के माध्यम से लोक उद्यम विभाग को भारी उद्योग मंत्रालय से निकालकर वित्त मंत्रालय से जोड़ दिया गया है।
  • इस नए विभाग के जुड़ने से वित्त मंत्रालय में 6 विभाग हो गए हैं।
  • वित्त मंत्रालय के विभाग-

(1) आर्थिक मामलों का विभाग (Department of Economic Affairs)
(2) व्यय विभाग (Department of Expenditure)
(3) राजस्व विभाग (Department of Revenue)
(4) निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग (Department of Investment and Public Asset Management)
(5) वित्तीय सेवा विभाग (Department of Financial Services)
(6) लोक उद्यम विभाग (Department of Public Enterprises)

सहकारी समिति के संवैधानिक प्रावधान

  • 97 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 के माध्यम से संविधान में एक नया भाग ‘IX B’ जोड़ा गया, जो भारत में कार्यरत सहकारी समितियों के संदर्भ में है।
  • संविधान के भाग-III के अंतर्गत अनुच्‍छेद-19 (1) (c) में ‘‘संघों और संगठनों’’ (Union and Associations) के बाद ‘‘सहकारिता’’ शब्द जोड़ा गया। यह प्रावधान सभी नागरिकों को सहकारी समितियां बनाने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
  • राज्य नीति निदेशक तत्‍वों भाग-IV में ‘सहकारी समितियों के प्रचार’ के संबंध में एक नया अनुच्‍छेद 43 B जोड़ा गया।

सहकारी आंदोलन

  • सहकारी समितियों की शुरुआत सबसे पहले यूरोप में हुई थी।
  • ब्रिटिश सरकार ने भारत में सहकारी आंदोलन को गरीब किसानों को साहूकारों के उत्पीड़न से बचने के लिए शुरू किया था।
  • भारत में सहकारी समिति शब्द का अस्तित्व पुणे और अहमदनगर (महाराष्ट्र) के किसान आंदोलन के बाद से माना जाता है।
  • संस्थागत तौर पर 1903 में, बंगाल सरकार के सहयोग से बैंकिंग में पहली ऋण सहकारी समिति का गठन किया गया था।
  • वर्ष 1904 में, सहकारी साख समिति अधिनियम, 1904 पारित किया गया, जिसने सहकारिता को एक निश्चित संरचना और आकार प्रदान किया।
  • वर्ष 1919 में, सहकारिता एक प्रांतीय विषय बन गया और प्रांतों को ‘मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों’ के तहत अपने स्वयं के सहकारी कानून बनाने के लिए अधिकृत किया गया।
  • सहकारिता को प्रांतों के विषय के रूप में भारत सरकार अधिनियम, 1935 में भी रखा गया।
  • वर्ष 1942 में ब्रिटिश सरकार ने एक से अधिक प्रांतो की सदस्यता वाली सहकारी समितियों को आच्‍छादित करने के लिए बहु-इकाई सहकारी समिति अधिनियम बनाया।
  • आजादी के बाद, सहकारिता पंचवर्षीय योजनाओं का अभिन्न अंग बन गई।
  • वर्ष 1958 में, राष्ट्रीय विकास परिषद ने सहकारिता के लिए राष्ट्रीय नीति, कार्मिकों का प्रशिक्षण और सहकारी विपणन समितियों की स्थापना के लिए सिफारिशें की ।
  • राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) एक सांविधिक निगम के रूप में, ‘राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 1962 के तहत स्थापित किया गया।
  • वर्ष 1984 में, भारत सरकार ने एक प्रकार की समितियों को शासित करने वाले विभिन्‍न कानूनों को हटाने के लिए ‘बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम लाया।
  • वर्ष 2002 में भारत सरकार ने सहकारिता के लिए राष्ट्रीय नीति की घोषणा की।

सहकारिता का महत्व

  • यह छोटे और अंतिम स्थान पर खड़े किसानों को कृषि ऋण प्रदान करता है, जहां राज्य और निजी क्षेत्र बहुत कुछ नहीं कर पाए हैं।

(i) उत्पादन बढ़ाने में भूमिका-उदाहरण के लिए अमूल सहकारिता आंदोलन।
(ii) गरीबी निवारण एवं वित्तीय समावेशन में सहायक सहकारी बैंक
(iii) महिला उत्थान एवं लिंग समानता को बढ़ावा -सेवा (SEWA) को-आपरेटिव
(iv) स्वास्थ्य सेवा में वृद्धि आयुष्मान सहकार योजना (राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम द्वारा)

सहकारिता की चुनौतियां

  • प्रबंधन और जोड़ तोड़ : जब तक सहकारी समितियों के प्रबंधन के लिए कुछ सुरक्षित तरीकों को नहीं लाया जाता तब तक इन समितियों की बड़ी सदस्य संख्या का प्रबंधन नहीं किया जा सकता।
  • जानकारी का अभाव : लोगों को सहकारी आंदोलनों, सहकारी संस्थाओं के नियमों और विनियमों के बारे में अच्‍छी तरह से जानकारी नहीं है।
  • सीमित पहुंच: सहकारी समितियों में से अधिकांश समितियां कुछ सदस्यों तक ही सीमित हैं और उनका संचालन केवल एक या दो गांवों तक ही सीमित है।
  • वित्तीय कमजोरी : वित्त की समस्या के कारण ये समितियां प्रशिक्षित कर्मियों की कमी से जूझ रही हैं। इसके अतिरिक्त, राजनीतिक हस्ताक्षेप भ्रष्टाचार, एवं राज्य सरकारों की अनदेखी भी सहकारी समितियों की समस्याएं हैं।

सहकारी समितियों की स्थिति

  • देश में लगभग 194 195 दुग्ध सहकारी समितियां और 330 सहकारी चीनी मिलें चल रही हैं।
  • वर्ष 2019-20 में, दुग्ध सहकारी समितियों ने 4.80 करोड़ लीटर दुग्‍ध का उत्पादन किया।
  • पूरे देश के कुल चीनी उत्पादन में लगभग 35 प्रतिशत का योगदान सहकारी चीनी मिलों का हैं।
  • वर्ष 2019-20 में, 95238 प्राथमिक कृषि ऋण समितियां, 363 जिला केंद्रीय सहकारी बैंक और 33 राज्य सहकारी बैंक, ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण प्रदान करने के लिए मौजूद थे।

निष्कर्ष

  • सहकारिता का कार्य विभिन्‍न नियमों और विनियमों के माध्यम से होता था, जिसे अब एक मंत्रालय के माध्यम से किया जाएगा।
  • कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय पहले कृषि और सहकारिता मंत्रालय के रूप में कार्य करता था।
  • भारत में सहकारिता का इतिहास 19वीं शताब्दी से शुरू हुआ और धीरे-धीरे कालानुक्रम में एक मंत्रालय के रूप में अस्त्वि में आ गया।

संकलन-विभव कृष्ण पांडेय

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