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विश्व जनसंख्या रिपोर्ट,2021

World Population Report, 2021

वर्तमान परिप्रेक्ष्य-

  • 14 अप्रैल, 2021 को ‘मेरा शरीर मेरा अपना है’ ‘(My Body is My Own) नामक शीर्षक से ‘विश्व जनसंख्या स्थिति रिपोर्ट’ (State of World Population Report) 2021 जारी की गई।
  • इस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (United Nations Population Fund : UNFPA) द्वारा जारी किया गया।
  • पहली बार संयुक्त राष्ट्र की किसी रिपोर्ट में ‘दैहिक/शारीरिक स्वायत्तता’ (Bodily Autonomy) पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

‘दैहिक स्वायत्तता

  • रिपोर्ट में ‘दैहिक स्वायत्तता’ को बगैर किसी हिंसा के डर से अपने शरीर के विषय में या किसी और के लिए निर्णय लेने की शक्ति तथा एजेंसी के रूप में परिभाषित किया गया है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु :-
वैश्विक परिदृश्य

  • रिपोर्ट के मुताबिक 57 विकासशील देशों की लगभग आधी महिलाओं को अपने शरीर के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।
  • ये महिलाएं गर्भ निरोधक का उपयोग करने, स्वास्थ्य देखभाल की मांग करने और यहां तक कि अपनी काम-वासना के संबंध में भी खुद निर्णय नहीं ले सकती हैं।
  • केवल 75 प्रतिशत देशों में गर्भ निरोधक के लिए पूर्ण और समान पहुंच कानूनी रूप से सुनिश्चित की गई है।

कोविड-19 का प्रभाव

  • विश्व की अधिकांश महिलाएं, शारीरिक स्वायत्तता के मौलिक अधिकार से वंचित कर दी जाती हैं। कोविड-19 महामारी के कारण इनके हालात और खराब हुए हैं।

भारतीय परिदृश्य

  • रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’(National Family Health Survey :NFHS)-4 वर्ष 2015-16 के मुताबिक- वर्तमान में केवल 12 प्रतिशत विवाहित महिलाएं (15-49 वर्ष आयु वर्ग) अपनी स्वास्थ्य-देखभाल के बारे में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेती हैं।
  • इसी आयु वर्ग की 63 प्रतिशत विवाहित महिलाएं अपने जीवनसाथी के साथ परामर्श कर निर्णय लेती हैं। 
  • लगभग एक-चौथाई या 23 प्रतिशत महिलाओं के जीवनसाथी, मुख्य रूप से उनकी स्वास्थ्य-देखभाल के विषय में निर्णय लेते हैं।

गर्भ निरोधक

  • वर्तमान में केवल 8 प्रतिशत विवाहित महिलाएं (15-49 वर्ष आयु वर्ग) ही स्वतंत्र रूप से गर्भनिरोधक के उपयोग पर निर्णय ले पाती हैं।
  • जबकि 83 प्रतिशत महिलाओं द्वारा अपने जीवनसाथी के साथ मिलकर निर्णय लिए जाते हैं।
  • महिलाओं को गर्भनिरोधक के उपयोग के बारे में दी गई जानकारी भी सीमित होती है।
  • गर्भ निरोधक का उपयोग करने वाली केवल 47 प्रतिशत महिलाओं को इस विधि के दुष्प्रभावों के बारे में बताया गया।
  • मात्र 54 प्रतिशत महिलाओं को अन्य गर्भ निरोधक उपायों के बारे में जानकारी प्रदान की गई।

रिपोर्ट में प्रयुक्त की गई कार्यप्रणाली

  • ‘दैहिक स्वायत्तता’ के संदर्भ में महिलाओं की पहुंच, रिपोर्ट के निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर मापी जाती है :

दैहिक स्वायत्तता का उल्‍लंघन के कुछ उदाहरण-

उच्‍चतम न्‍यायालय के संबंधित फैसले

  • न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ 2017 :
  • उच्‍चतम न्‍यायालय के अनुसार एक महिला के प्रजनन अधिकारों में गर्भ धारण करने, बच्‍चे को जन्म देने और बाद में बच्‍चे को पालने का अधिकार शामिल है एवं यह अधिकार महिलाओं की निजता, उनके सम्मान एवं दैहिक अखंडता के अधिकार का हिस्सा है। 
  • सर्वोच्‍च न्‍यायालय के इस निर्णय ने गर्भपात और सेरोगेसी के लिए संभावित चुनौतियों को हल करने हेतु आवश्यक प्रोत्साहन दिया।
  • चिकित्सकीय समापन (संशोधन) विधेयक [Medical Termination of Pregnancy (Amendment) Bill)] 2021:-

यह गर्भावस्था की अवधि को 20 सप्‍ताह से 24 सप्‍ताह तक बढ़ाने का प्रावधान करता है।
जिससे महिलाओं के लिए सुरक्षित और कानूनी रूप से अवांछित गर्भावस्था को समाप्‍त करना आसान हो जाता है।

‘संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष’ (United Nations Population Fund: UNFPA) के बारे में

  • UNFPA, संयुक्त राष्ट्र की यौन तथा प्रजनन स्वास्थ्य एजेंसी (United Nations Sexual and Reproductive Health Agency) के रूप में कार्य करता है।
  • वर्ष 1967 में इसे ट्रस्ट फंड के रूप में स्थापित किया गया था, तथा वर्ष 1969 में इसका परिचालन शुरू हुआ।
  • वर्ष 1987 में आधिकारिक तौर पर इसे UNFPA नाम दिया गया।
  • वर्ष 1969 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा घोषणा की गई थी कि ‘‘माता-पिता को स्वतंत्र रूप से और जिम्मेदारी पूर्ण तरीके से अपने बच्‍चों की संख्या और उनके बीच अंतर को निर्धारित करने का विशेष अधिकार है।’’
  • UNFPA का लक्ष्य, एक ऐसी दुनिया का निर्माण करना है, जिसमें प्रत्येक गर्भ को स्वीकार किया जाए, प्रत्येक प्रसव सुरक्षित हो तथा हर युवा की संभाव्यताएं पूरी होती हों।

UNFPA प्रत्यक्ष रूप से स्वास्थ्य पर सतत विकास लक्ष्य संख्या 3, शिक्षा पर लक्ष्य 4 और लिंग समानता पर लक्ष्य 5 के संबंध में कार्य करता है।

आगे की राह

  • लैंगिक असमानता और सभी प्रकार के भेद-भाव को समाप्‍त करने तथा उन्हें बनाए रखने वाली सामाजिक एवं आर्थिक संरचनाओं को बदलने पर निर्भर करती है। जिसमें पुरुषों का सहयोगी बनना एवं उन लोगों को अपने विशेषाधिकार तथा प्रभुत्व को त्यागना होगा, जो अत्यधिक दैहिक स्वायत्तता का उल्‍लंघन करते हैं।

संकलन- आदित्य भारद्वाज

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