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इस्राइल-फिलिस्तीन संघर्ष

Israel-Palestine conflict

मुद्दा : हाल के दिनों में इस्राइल एवं फिलिस्तीनी उग्रवादी संगठन हमास के मध्य बढ़ते तनाव एवं हिंसा के कारण दोनों देश अंतरराष्ट्रीय राजनीति की चर्चा के केंद्र में आ गए।
विवाद क्यों : इस्राइल-फिलिस्तीन के मध्य यह विवाद यहूदी राष्ट्र इस्राइल के जन्म के साथ ही शुरू होता है, जिसमें यरूशलम के प्रतीक और भूमि को लेकर दोनों देश संघर्षरत हैं।


वर्ष 1948 के पहले अरब-इस्राइल युद्ध में इस्राइल ने यरूशलम के पश्चिमी जबकि जा जॉर्डन ने पूर्वी हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसे बाद में इस्राइल ने पूरा कब्जा किया। पूर्वी यरूशलम पर कब्जे के बाद से इस्राइल यहां लगातार बस्तियों का विस्तार कर रहा है। फिलिस्तीनी पूर्वी यरूशलम को अपनी राजधानी बनाना चाहते हैं जबकि इस्राइल पूरे शहर को अपनी राजधानी एकीकृत, शाश्वत के रूप में देखता है।


हालिया विवाद :(1) वर्ष 2021 की शुरुआत में पूर्वी यरूशलम के केंद्रीय न्यायालय ने फिलिस्तीनियों के 7 परिवारों को शेख जर्राह से बेदखल होने के पक्ष में निर्णय दिया, जिसके बाद से हिंसा का दौर शुरू हुआ।


(2) हाल ही में इस्राइल सशस्त्र बलों ने यरूशलम में राष्ट्रवादियों द्वारा वर्ष 1967 में शहर के पूर्वी हिस्से पर इस्राइल के कब्जे को स्मरण करते हुए निकाले जाने वाले मार्च से पहले यरूशलम के हरम अस-शरीफ में अल-अक्सा मस्जिद पर हमला कर दिया, जिसके विरोध स्वरूप फिलिस्तीनियों ने पुलिस पर पथराव किया। बाद में मस्जिद में हैंड ग्रेनेड फेके जाने की वजह से हालात और बेकाबू हो गए।

विवाद को भड़काने वाले कारक :-
(1) हमास की उपस्थिति :- वर्ष 1987 में मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड की हिंसक शाखा जो हिंसक जिहाद के माध्यम से ‘‘फिलिस्तीन के हर इंच पर अल्‍लाह के झंडे को ऊपर उठाने’’ की मांग करता है।
(2) दोनों राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता :- दोनों पक्षों मंे नेतृत्व संरचनाओं में अक्षमता और ठहराव है, जिससे बहुत से समूह नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं।
(3) फिलिस्तीन द्वारा द्विराज्यीय समाधान को स्वीकृति न देना। फिलिस्तीनी लोगों की भावनाएं भी बदल रही हैं, उनमें से अधिकांश का कहना है कि वे द्विराज्य समाधान नहीं चाहते हैं।
(4) फिलिस्तीनी संगठन हमास व फतह के बीच की दूरी और इन दोनों का अलग-अलग रास्तों पर बढ़ना।


Note-फतह फिलिस्तीन का सबसे बड़ा राजनीतिक गुट है, जिसका गठन दिवंगत यासिर अराफात ने 1950 के दशक में किया था।

(5) इस क्षेत्र से अमेरिका के महत्व का कम होना एवं उसका इस्राइल के पक्ष में झुकाव : अमेरिका सुरक्षा परिषद में फिलिस्तीनी कारणों से हाेने वाली बैठकों मे बाधा डाल रहता है एवं इस्राइल के बचाव के अधिकारों को मान्यता देता है।

  • अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा यरूशलम को इस्राइल की वास्तविक राजधानी के रूप में मान्यता देना भी एक बड़ी समस्या बन गया है।
  • मौजूदा ‘जो बाइडेन’ प्रशासन ने इस मामले में तटस्थ रहने की बात की है, लेकिन इस संघर्ष में ज्यादा कूटनीतिक ऊर्जा निवेश की आवश्यकता है।

आगे की राह :-दोनों राज्यों की एक निश्चित सीमा होनी चाहिए, बल का अनुपातहीन प्रयोग केवल आतंकवाद एवं उग्रवाद को ही बढ़ावा देगा, न कि स्थायी समाधान को।

  • क्षेत्रीय शक्तियों जैसे सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को स्थायी समाधान हेतु पहल करनी चाहिए जैसा कि कतर एवं मिस्र पहले से ही कर रहे हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ एवं विश्व की प्रमुख महाशक्तियाें को स्थायी समाधान निकालने एवं पूर्ण शांति की स्थापना के लिए आपसी वार्ता एवं सम्मेलनों द्वारा कोशिश करनी चाहिए।

भारत की भूमिका : वर्तमान अंतरराष्ट्रीय संबंधों के परिदृश्य को एवं अपनी भविष्य की आवश्यकताओं तथा अपनी सॉफ्ट नेशन छवि को ध्यान में रखते हुए भारत का मानना है कि इस क्षेत्र में स्थिरता लाने एवं दशकों पुराने इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए शांति वार्ता ही एकमात्र रास्ता है।

  • भारत के दाेनों राज्यों से घनिष्ठ संबंध हैं और वह फिलिस्तीन का समर्थन करता है, लेकिन एक को दूसरे के ऊपर चुनना भी बुद्धिमानी नहीं है।
  • फिलिस्तीन चाहता है कि भारत वार्ताकार के रूप में कार्य करे, क्योंकि उनका विश्वास अमेरिका, रूस और चीन पर ज़्यादा नहीं है।
  • भारत को ऐसी कोई भी भूमिका चुनते समय इस्राइल के साथ उसके कूटनीतिक, व्यापारिक संबंध एवं कृषि तथा विज्ञान क्षेत्र के अनेक समझौतों तथा वर्ष 1947 में स्वयं के विभाजन की त्रासदी के कारण इस्राइल को राष्ट्र न मानने का निर्णय एवं एक शांति प्रिय एवं साॅफ्ट पॉवर नेशन की छवि को एवं अपने समस्त हितों को ध्यान में रखना होगा।

निष्कर्ष :-धरातल पर स्थिति वास्तव में बहुत सोचनीय है, तनाव बढ़ता जा रहा है और इसमें सम्मिलित मुद्दों को देखते हुए यह समस्या निकट भविष्य में सुलझती नहीं दिख रही है

  • शांतिवार्ता कम-से-कम 2 दशकों से हो रही है, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकल रहा है। हालांकि इस संबंध में भारत का रुख अभी भी कायम है।
  • दोनों पक्षों को एक संभावित समाधान पर पहुंचना होगा जो आपसी हित में हो, लेकिन इसका आधार केवल बातचीत ही हो सकता है, न कि रक्तपात।

Note- दोनों देशांे के बीच विवाद के मुख्य बिंदु

वेस्ट बैंक :- यह इस्राइल और जाॅर्डिन के मध्य है। इस्राइल ने वर्ष 1967 से इसे अपने कब्जे में ले रखा है। इस्राइल और फिलिस्तीन दोनों ही इसे अपना क्षेत्र बताते हैं।
गाजा पट्टी :– इस्राइल और मिस्त्र के बीच है। यहां हमास का कब्जा है। वर्ष 2007 में इस्राइल ने इस क्षेत्र पर कई प्रतिबंध आरोपित किए।
गोलन हाइट्स :- राजनीतिक एवं रणनीतिक रूप से यह सीरिया का एक पठार है, जिस पर वर्ष 1967 से ही इस्राइल का कब्जा है, इस विवाद काे लेकर कई शांतिवार्ताएं असफल हो चुकी हैं।
नागरिकता की दोहरी नीति :- वर्ष 1967 में पूर्वी यरूशलम पर कब्जे के बाद से इस्राइल यहां पैदा होने वाले यहूदी लोगों को तो इस्राइल नागरिक मानता है, लेकिन फिलिस्तीनी लोगों को कई शर्तों के साथ रहने की अनुमति दी जाती है।

संकलन- आकाश मिश्रा

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