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CMS CoP 13 : प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर सम्मेलन

CMS CoP 13: Convention on Conservation of Migratory Species
  • पृष्ठभूमि
  • संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण संधि के रूप में सीएमएस प्रवासी जानवरों और उनके आवास के संरक्षण और उपभोग के लिए एक वैश्विक मंच प्रदान करता है।
  • सीएमएस उन राज्यों को एक साथ लाता है, जिनके माध्यम से प्रवासी जानवर गुजरते हैं, राज्य क्षेत्र और एक प्रवासी सीमा के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित संरक्षण उपायों के लिए कानूनी आधार देता है।
  • वर्तमान परिप्रेक्ष्य
  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के तत्वावधान में ‘वन्य जीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय हेतु पक्षकारों का सम्मेलन’ (CMS CoP : Conference of the Parties to the Convention of Migratory Species of Wild Animal) महात्मा मंदिर, गांधीनगर (गुजरात) में 13वें सत्र का आयोजन 15-22 फरवरी, 2020 के मध्य संपन्न हुआ।
  • संबंधित तथ्य
  • CMS CoP का यह पहला सम्मेलन है, जिसे भारत में आयोजित किया गया।
  • CMS CoP के 12वें सत्र का आयोजन एशिया (मनीला, फिलीपींस) में पहली बार किया गया था। यह दूसरा अवसर है, जब इसे पुनः एशिया (भारत) में आयोजित किया गया।
  • इस सम्मेलन का आयोजन प्रत्येक 3 वर्ष पर किया जाता है। सम्मेलन की अध्यक्षता करने वाला देश अगले सम्मेलन के आयोजन तक अर्थात 3 वर्षों तक CMS CoP की अध्यक्षता करता है। वर्तमान में भारत इसका अध्यक्ष है।
  • CMS CoP 13 की थीम- ‘Migratory species connect the planet and together we welcome them home” थी।
  • सम्मेलन के अंतिम दिन ‘गांधीनगर घोषणा-पत्र’ जारी किया गया। CMS सचिव एमी फ्रैंकल ने प्रवासी प्रजातियों की लगातार घट रही संख्या पर चिंता जताते हुए, जीव-जंतुओं के संरक्षण पर जोर दिया है।
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  • गांधीनगर घोषणा-पत्र
  • इस घोषणा-पत्र पर 111 देशों के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए। वर्तमान में CMS के भागीदारों की संख्या (CoP) 130 है।
  • इस घोषणा-पत्र में कहा गया है कि ज्यादातर प्रवासी प्रजातियों की संख्या घट रही है, जिसके लिए अध्ययन की आवश्यकता है।
  • प्रवासी प्रजातियों की घट रही संख्या के पीछे सबसे बड़ा कारण इनके अवैध शिकार और अवैध कारोबार को माना गया और इनके संरक्षण के लिए नई नीति बनाए जाने की आवश्यकता है।
  • इस घोषणा-पत्र में प्रवासी जीव-जंतुओं और पारिस्थितिकीय तंत्रों के आभासी रिश्तों को वर्ष 2020 के बाद जैव-विविधता मसौदे में शामिल करने और इनको वरीयता देने की बात कही गई।
  • इस मसौदे के अक्टूबर, 2020 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जैव-विविधता सम्मेलन में पारित होने की संभावना है।
  • महत्वपूर्ण तथ्य
  • वर्ष 1979 में जर्मनी के बॉन शहर में CMS कन्वेंशन पर हस्ताक्षर होने के कारण इसे ‘बॉन कन्वेंशन’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • CMS कन्वेंशन वर्ष 1983 से अस्तित्व में आया। भारत ने भी वर्ष 1983 में इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए थे।
  • इस सम्मेलन में 10 प्रजातियों को परिशिष्ट-1 में और 13 प्रजातियों को परिशिष्ट-2 में शामिल किया गया है।
  • यह सम्मेलन पिछले 12 सत्रों से अलग था, क्योंकि इसमें CMS की निधियों के बारे में रणनीति बनाने और इसका प्रचार-प्रसार करने के लिए ‘दूत कार्यक्रम’ शुरू किया गया।
  • CMS के दूत कार्यक्रम के तहत भारतीय अभिनेता रणदीप हुड्डा को वर्ष 2023 तक दूत नामित किया गया।
  • CMS संरक्षण सूची में सुधार
  • एशियाई हाथी, तेंदुआ और बंगाल फ्लोरिकन (हुकना) को परिशिष्ट-1 में शामिल किया गया। परिशिष्ट-1 में ऐसी प्रजातियों को शामिल किया जाता है, जिनके ऊपर विलुप्त होने का खतरा बना हुआ है।
  • यदि किसी प्रजाति को परिशिष्ट-1 में डाला जाता है, तो सीमा-पार उसके लिए संरक्षण के प्रयास आसानी से किए जा सकते हैं।
  • कुछ प्रजातियों को परिशिष्ट-2 में शामिल किया गया है। इनमें शामिल हैं-जगुआर (परिशिष्ट-1 में भी), यूरियाल, लिटिल बस्टर्ड (परिशिष्ट-1 में भी), स्मूथ हैमरहेड शार्क, टोपे शार्क इत्यादि।
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  • परिशिष्ट-2 में उन प्रजातियों को शामिल किया जाता है, जिनके संरक्षण के लिए वैश्विक सहयोग की जरूरत होती है।
  • अन्य तथ्य
  • CMS CoP 13 वें सत्र के सम्मेलन में पहली बार प्रवासी प्रजातियों की वर्तमान स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की गई।
  • रिपोर्ट के अनुसार, CMS संधि में शामिल ज्यादातर प्रजातियों की संख्या में गिरावट दर्ज की जा रही है।
  • जिस मार्ग से प्रवासी जीव-जंतु गुजरते हैं एवं जिन स्थानों पर ये प्रवास करते हैं, वहां पर इनके आवासों के संरक्षण हेतु CMS संधि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी अधिकार प्रदान करती है।
  • निष्कर्ष
  • CMS संधि वर्ष 1983 से अस्तित्व में आई। तब से लेकर वर्तमान में प्रवासी जीव-जंतुओं के संरक्षण और उनकी संख्या में वृद्धि को लेकर यह प्रतिबद्ध है। फिर ऐसा क्या कारण है कि प्रत्येक सम्मेलन में इनकी घटती संख्या और आवासों के विनाश को लेकर चर्चा की जाती है?
  • उपभोक्तावादी संस्कृति और प्रकृति से दुराव ने आज वैश्विक जीव-जंतुओं की प्रजातियों के अस्तित्व पर तलवार लटका दी है, जो वर्तमान में विभिन्न सम्मेलनों की चिंताओं से प्रदर्शित हो रहा है।

सं. विभव कृष्ण पाण्डेय