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सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्यों को ‘ग्राम न्यायालय’ की स्थापना का निर्देश

Supreme Court directs states to establish 'Village Court'
  • वर्तमान परिपे्रक्ष्य
  • 3 फरवरी‚ 2020 को सर्वोच्च न्यायालय ने ‘ग्राम न्यायालय’ की स्थापना से संबंधित एक याचिका की सुनवाई के दौरान कई राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा ग्राम न्यायालय की स्थापना न करने पर नाराजगी जताई।
  • इसी संबंध में असम‚ चंडीगढ़‚ गुजरात‚ हरियाणा‚ ओडिशा‚ पश्चिम बंगाल‚ पंजाब और तेलंगाना राज्यों पर जवाब न देने के कारण 1-1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को चार सप्ताह के भीतर ‘ग्राम न्यायालय’ स्थापना संबंधी अधिसूचना जारी करने के निर्देश दिए हैं।
  • महत्वपूर्ण बिंदु
  • वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक गैर-सरकारी संगठन ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ सोसाइटी फॉर फास्ट जस्टिस’ द्वारा दाखिल की गई याचिका पर केंद्र सरकार‚ राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया था।
  • न्यायमूर्ति एन.वी. रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि तीन राज्यों- राजस्थान‚ महाराष्ट्र और केरल के अतिरिक्त कोई राज्य इस दिशा में सकारात्मक कार्य नहीं कर रहे हैं।
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना के अनुसार‚ आवश्यक 2500 के स्थान पर देशभर में केवल 208 ‘ग्राम न्यायालय’ ही कार्य कर रहे हैं।

वर्ष 2016-17 तक ग्राम न्यायालय संबंधी आंकड़े

राज्य

अधिसूचित

कार्यरत

मध्य प्रदेश

89

89

राजस्थान

45

45

कर्नाटक

2

0

ओडिशा

16

13

महाराष्ट्र

23

23

झारखंड

6

0

गोवा

2

0

पंजाब

2

1

हरियाणा

2

2

उत्तर प्रदेश

104

2

  • ग्राम न्यायालय
  • ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय प्रणाली की त्वरित एवं आसान पहुंच के लिए ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम‚ 2008’ को संसद में पारित किया गया है।
  • यह कानून 2 अक्टूबर‚ 2009 को प्रभावी हुआ।
  • ग्राम न्यायालय की स्थापना का प्रावधान भारतीय संविधान के भाग-4 में उल्लिखित राज्य के नीति-निदेशक तत्व के अनुच्छेद 39(a) के अंतर्गत ‘समान न्याय और नि:शुल्क विधिक सहायता’ की भावना के अनुरूप किया गया है।
  • ध्यातव्य है कि वर्ष 1986 में 114वें विधि आयोग ने भी पंचायत स्तर पर ‘ग्राम न्यायालयों’ की स्थापना की सिफारिश की थी।
  • स्वतंत्रता से पूर्व ‘दि तमिलनाडु विलेज कोट्‌र्स एक्ट‚ 1888’ में भी पंचायत स्तर पर कुछ इसी तरह की व्यवस्था को वैधानिकता प्रदान करने का प्रयास किया गया था।
  • ग्राम न्यायालय की स्थापना एवं संरचना
  • ग्राम न्यायालय अधिनियम‚ 2008 के अनुच्छेद 3(1) के तहत राज्य सरकारों को उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात जिले में मध्यवर्ती स्तर पर प्रत्येक पंचायत या निकटवर्ती पंचायतों के समूह के लिए एक या एक से अधिक ‘ग्राम न्यायालयों’ की स्थापना का अधिकार दिया गया है।
  • राज्य सरकार उच्च न्यायालय के परामर्श से ग्राम न्यायालय में प्रथम श्रेणी के ‘न्यायाधिकारी’ की नियुक्ति करेगी।
  • न्यायाधिकारी के वेतन‚ भत्ते एवं उनकी सेवा से संबंधित अन्य नियम एवं शर्तें प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के समान होंगी।
  • ग्राम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र
  • ग्राम न्यायालय एक मोबाइल न्यायालय होगा और इसे दीवानी एवं फौजदारी के सामान्य मामलों की सुनवाई करने का अधिकार होगा‚ जिसका निर्धारण ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम‚ 2008’ की अनुसूची 1 एवं 2 में किया गया है।
  • केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकरों को अपने संबंधित विधायी क्षमता के अनुसार अधिनियम की अनुसूची 1 एवं 2 में संशोधन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
  • ‘ग्राम न्यायालय’ का क्षेत्राधिकार‚ समय-समय पर राज्य सरकार के परामर्श से संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाएगा।
  • ग्राम न्यायालय ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम‚ 1872’ का अनुपालन करने के लिए बाध्य नहीं होगा।
  • ग्राम न्यायालय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करते हुए शीघ्र न्याय प्रदान करने का प्रयास करेंगे।
  • फैसलें के विरुद्ध अपील
  • किसी आदेश के 30 दिनों के भीतर दीवानी मामले संबंधित जिला न्यायालय में तथा फौजदारी मामले संबंधित सत्र न्यायालय में किसी फैसले के विरुद्ध चुनौती दी जा सकेगी।
  • जिला एवं सत्र न्यायालयों को ग्राम न्यायालय के अपील के विरुद्ध फैसलों पर 6 महीने के भीतर फैसला करना होगा।
  • ग्राम न्यायालय के महत्व
  • ‘ग्राम न्यायालयों’ की पंचायत स्तर पर पहुंच से सामान्य नागरिकों के जीवन में धन और समय की बचत होगी।
  • ग्राम न्यायालय की स्थापना से अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की कमी आएगी।

संमहेन्द्र मिश्रा