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राज्य सभा का 250वां सत्र

250th session of Rajya Sabha
  • पृष्ठभूमि
  • भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा की पहली बैठक 13 मई, 1952 को आयोजित हुई थी। राज्य सभा के 249वें सत्र के अंत तक कुल 5466 बैठकें हो चुकी हैं। पिछले 67 वर्षों के दौरान राज्य सभा द्वारा 108 संविधान संशोधन विधेयक सहित कुल 3817 विधेयकों को पारित किया गया। इस दौरान 208 महिलाओं एवं 137 नामांकित सदस्यों सहित कुल 2,282 लोगों को राज्य सभा सदस्य होने का गौरव प्राप्त हुआ।
  • वर्तमान परिदृश्य
  • 18 नवंबर, 2019 को राज्य सभा का शीतकालीन सत्र शुरू हुआ। यह सत्र राज्य सभा का ऐतिहासिक 250वां सत्र था।
  • 250वां सत्र
  • राज्य सभा का ऐतिहासिक 250वां सत्र 18 नवंबर, 2019 से 13 दिसंबर, 2019 तक चला। यह सत्र लगभग 100 प्रतिशत उत्पादकता के साथ समाप्त हुआ। राज्य सभा के सभापति वेंकैया नायडू के अनुसार, उच्च सदन ने 49 वर्षों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। इस सत्र के दौरान प्रतिदिन 9.5 तारांकित प्रश्नों का मौखिक रूप से उत्तर दिया गया और 39 प्रतिशत समय विधेयकों को पारित करने में व्यतीत हुआ।
  • सभापति नायडू ने सदन को सूचित किया कि सदन के शीतकालीन सत्र (250वां) के दौरान कुल 20 बैठकें हुईं। इस दौरान कुल उपलब्ध समय 108 घंटे, 33 मिनट में से सदन ने 107 घंटे, 11 मिनट कार्य किया। सभापति के अनुसार, राज्य सभा के इस शीतकालीन सत्र के दौरान सदन द्वारा 15 विधेयक पारित किए गए।
  • इस सत्र के दौरान 67 वर्षों में पहली बार सदस्यों द्वारा मूल भारतीय भाषाओं यथा-हिंदी, संस्कृत, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मराठी, बंगाली और संथाली, में अपनी बात रखी गई। राज्य सभा में ‘भारतीय राजव्यवस्था में राज्य सभा की भूमिका और आगे की राह’ (The Role of Rajya Sabha in Indian Polity and The Way Forward) पर एक विशेष चर्चा हुई। नियम 176 के तहत एक चर्चा देश में आर्थिक स्थिति पर आयोजित की गई।
  • भारतीय संविधान को अंगीकार करने के 70 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में संसद के केंद्रीय सभागार (Central Hall) में 26 नवंबर, 2019 को दोनों सदनों के सदस्यों के लिए विशेष समारोह आयोजित किया गया।
  • राज्य सभा : एक परिचय
  • भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत तत्कालीन विधानमंडल के द्वितीय सदन के तौर पर काउंसिल ऑफ स्टेट्स का सृजन किया गया, जिसका विशेषाधिकार सीमित था और जो वस्तुतः वर्ष 1921 में अस्तित्व में आया।
  • संविधान सभा ने वर्ष 1950 तक केंद्रीय विधानमंडल के रूप में कार्य किया, फिर इसे ‘अनंतिम संसद’ के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। यह 1952 में पहले चुनाव कराए जाने तक एक-सदनी रहा।
  • स्वतंत्र भारत के लिए एक द्वि-सदनी विधानमंडल बनाने का निर्णय मुख्यतः इसलिए किया गया क्योंकि परिसंघीय प्रणाली को अपार विविधताओं वाले देश के लिए सर्वाधिक सहज माना गया। काउंसिल ऑफ स्टेट्स के रूप में एक ऐसे द्वितीय सदन का सृजन किया गया जिसकी संरचना और निर्वाचन पद्धति प्रत्यक्षतः निर्वाचित लोक सभा से पूर्णतः अलग थी। इसके सदस्यों का निर्वाचन राज्यों और दो संघ राज्य क्षेत्रों (वर्तमान में तीन संघ राज्य क्षेत्र) की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया गया। इसके अलावा राष्ट्रपति द्वारा सभा के लिए 12 सदस्यों के नाम निर्देशन का भी उपबंध किया गया। इसकी सदस्यता हेतु न्यूनतम आयु 30 वर्ष नियत की गई। भारत के उपराष्ट्रपति को राज्य सभा का पदेन सभापति बनाया गया है।
  • राज्य सभा एक स्थायी सदन है और यह भंग नहीं होता, तथापि प्रत्येक दो वर्ष बाद राज्य सभा के एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं। पूर्णकालिक अवधि के लिए निर्वाचित सदस्य 6 वर्षों की अवधि के लिए कार्य करता है।
  • राज्य सभा : संवैधानिक प्रावधान
  • अनुच्छेद 80 – राज्य सभा की संरचना (कुल सदस्य संख्या 250)
  • अनुच्छेद 89 – राज्य सभा का सभापति और उपसभापति
  • अनुच्छेद 90 – उपसभापति का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद    से हटाया जाना
  • अनुच्छेद 92 – जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना
  • अनुच्छेद 97 – सभापति और उपसभापति तथा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन एवं भत्ते   
  • अनुच्छेद 249 – राज्य सूची के विषय के संबंध में राष्ट्रीय हित में विधि बनाने की संसद की शक्ति
  • चौथी अनुसूची – राज्य सभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को स्थानों के आवंटन का उपबंध है।
  • निष्कर्ष
  • राज्य सभा के 250वें सत्र के दौरान सभापति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि 1952 में अपनी स्थापना के बाद से उच्च सदन ने देश के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान देते हुए लंबा सफर तय किया है, हालांकि अभी भी मीलों यात्रा करनी है, राज्य सभा में गरिमा और प्रतिष्ठा के अवयव संयोजित किए गए हैं।
  • भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य सभा ने रचनात्मक और प्रभावी भूमिका निभाई है। विधायी क्षेत्र और सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के मामले में इसका कार्य निष्पादन काफी अहम रहा है। संघीय सभा होने के नाते इसने देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने का कार्य किया तथा संसदीय लोकतंत्र में लोगों की आस्था बढ़ाई है।                  

सं. काली शंकरशारदेय