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मासिक पत्रिका फरवरी-मार्च,2020 पी.डी.एफ. डाउनलोड

बजट में आगामी वर्ष के आयव्यय से संबंधित आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण किया जाता है। यह प्रस्तुतीकरण इस बार कुछ अधिक ही लंबा रहा है। कहा जा रहा है कि इस वर्ष का बजटभाषण इतिहास का सबसे लंबा भाषण रहा। यह लंबाई कुछ इस वजह से भी बढ़ी होगी कि आयकर निर्धारण हेतु पुराने सिस्टम के साथसाथ एक नया सिस्टम भी पेश किया गया है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 11 साल की सबसे न्यून वृद्धि दर के समय यह उत्सुकता का विषय था कि बजट 2020-21 में इससे निपटने हेतु कौनसे कदम उठाये जाएंगे? इस वर्ष के बजट को सुधार का सबसे बड़ा मौका माना जा रहा था।

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क्योंकि यह मोदी 2.0 का पहला बजट था और मोदी सरकार ने धारा 370 और सी... जैसे तमाम बड़े फैसले लिए थे। अर्थविदों का मानना है कि अवसर के बावजूद मौजूदा आर्थिक स्थिति से देश को निकालने के लिए बड़ी छलांग लगाने से सरकार कतरा गई। इसका एक बड़ा कारण यह हो सकता है कि नोटबंदी और जी.एस.टी. जैसे निर्णयों के बाद जो बुरे प्रभाव जाहिर हुए थे, उनसे सबक लेते हुए विकास के लिए मध्य मार्ग या बीच का रास्ता चुना गया हो। अर्थव्यवस्था के संदर्भ में यह विश्वास बढ़ा है कि सुधारों को धीरेधीरे एक क्रमवार अंजाम देना आमूलचूल परिवर्तनों या शॉक ट्रीटमेंट से कहीं ज्यादा अच्छा परिणाम दे सकता है। ऐसा नहीं है कि इस बजट में कुछ किया ही नहीं गया है। बजट 2020 कई नई शुरुआत करता है। यह कुछ सीमित रेलमार्गों और जिला अस्पतालों को सार्वजनिकनिजी भागीदारी के लिए खोलने का प्रस्ताव करता है। सार्वजनिक क्षेत्र की विशालकाय कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम का सीमित आई.पी.. लाने की घोषणा की गई है। विनिवेश के लिए 2.1 लाख करोड़ का लक्ष्य निर्धारित किया गया।  बैंकजमा पर एक लाख के बजाए 5 लाख के बीमे का प्रस्ताव किया गया। 100 करोड़ रुपये से कम टर्न ओवर वाली स्टार्टअप कंपनियों को प्रोत्साहन दिया गया है। इन सुधारों के बावजूद  2024 तक 5 ट्रिलियन का लक्ष्य यदि हासिल करना है, तो अर्थव्यवस्था को फास्ट ट्रैक पर लाने के लिए सुधारों को तीव्र गति से अंजाम देने की जरूरत पड़ेगी। धीरेधीरे सुधार की नीति काम नहीं आएगी, जैसा कि अर्थशास्त्री जे.एम. कीन्स ने आगाह किया था, ‘‘लंबे समय में हम सब मर जाएंगे।’’ पत्रिका के इस अंक में बजट 2020-21 को आवरण आलेख के तहत प्रस्तुत किया गया है।

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संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित जलवायु शिखर सम्मेलनों ने कभी भी आशावाद के परवाज हासिल नहीं किए। हालिया संपन्न मैड्रिड शिखर सम्मेलन (CoP-25) की भी कमोबेश यही उपलब्धि रही है। किसी सफलता के उलट यह सम्मेलन कार्बन बाजारों से निपटने में विफलता के लिए जाना जाएगा। विफलताओं के बावजूद एक अहम सम्मेलन होने के कारण सामयिक आलेख ‘‘संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, 2019’’ इस अंक में प्रस्तुत है।

बगैर जरूरत कुछ किए जाने या कुछ किए जाने के क्या परिणाम हो सकते हैं यह बताता है नागरिकता संशोधन कानून। धर्म के आधार पर प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार यह कानून लायी है। जब पूरे उपमहाद्वीप में जनसंख्या एक विकट समस्या है, तो क्या भारत के इस कानून की शह पाकर पड़ोसी देश अपने देश के अल्पसंख्यकों को और अधिक प्रताड़ित नहीं करेंगे, जिससे यह जनसंख्या विस्थापित होकर भारत में जा बसे। इस प्रकार तो शह कानून और अधिक प्रताड़ना का कारण बन जाएगा। स्पष्ट है कि किसी नए नागरिकता संशोधन कानून को लाए जाने की जरूरत नहीं थी। इसी प्रकार नागरिकता कानून का विरोध बिना जरूरत जब  सड़कों पर आया, तो उसकी परिणति दिल्ली दंगों तक जा पहुंची। नागरिकता संशोधन कानून और उससे जुड़े विवाद पर प्रकाश डालता सामयिक आलेख प्रस्तुत है।

3 जनवरी, 2020 को एक अमेरिकी ड्रोन द्वारा ईरान के सबसे महत्वपूर्ण जनरल की हत्या के बाद संपूर्ण मध्य एशिया गहरे संकट से घिर गया है। अमेरिकाईरान के मध्य युद्ध का संकट 1979 के बाद सर्वाधिक गहरा गया है। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इराक स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर 20 मिसाइलें दागीं। बंकर में छुपी अमेरिकी सेना का तो कुछ नहीं हुआ लेकिन इन्हीं मिसाइलों में से दो तेहरान से उड़ान भर रहे यूक्रेनी एयर लाइंस के एक विमान को जा लगीं, जिससे विमान में सवार सभी 176 निर्दोष यात्रियों की जान चली गई। ईरानअमेरिका के डांवाडोल संबंधों पर सामयिक आलेख इस अंक में प्रस्तुत है।

मानव विकास रिपोर्ट, 2019 एवं इंटरनेट तक पहुंच एक मौलिक अधिकार? पर भी सामयिक आलेख इस अंक में प्रस्तुत हैं। सभी स्थाई स्तंभों के साथमध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (प्रा.) परीक्षा, 2019′ परीक्षा का हल प्रश्नपत्र इस अंक में प्रकाशित है। पाठकों से अनुरोध है कि अंक पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजें।