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मासिक पत्रिका जुलाई-अगस्त,2020 पी.डी.एफ. डाउनलोड

Magazine July August 2020

कोविड-19 जनित दुश्वारियों की शृंखला अंतहीन है। अब तो दुनियाभर में लोग इसके साथ ही जीने की अपरिहार्यता को लगभग स्वीकार चुके हैं और खुद को इसके लिए प्रशिक्षित भी कर रहे हैं। यह सही है कि शायद ही कोई बड़ा देश बचा हो, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर लॉकडाउन न किया हो, तो दूसरी ओर यह भी सच है कि शायद ही कोई देश शेष हो, जिसने लॉकडाउन हटा न लिया हो। राष्ट्रीय स्तर पर दुनिया भले ही अनलॉक की ओर धीरे-धीरे बढ़ चली है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश कब खुलेंगे? देश के अंदर प्रवासी येन-केन-प्रकारेण अपने घर पहुंच गए। अंतरराष्ट्रीय प्रवासी कब और कैसे प्रस्थान कर पाएंगे?

महामारी शुरू होने के बाद दुनिया के हर देश ने अपनी सीमाओं को पूर्ण या आंशिक रूप से बंद कर दिया है। गतिशीलता पर दुनियाभर में 65000 से अधिक प्रतिबंध जारी किए गए हैं। वैश्विक गतिहीनता का मूल्य दुनिया को भारी पड़ रहा है। निरस्त की गई अरबों यात्राओं का अर्थ है लाखों रोजगार का समाप्त हो जाना, सपनों का बिखर जाना और जीवन का भयग्रस्त हो जाना। प्रवासन नीति किसी भी देश के एजेंडे से बहुत दूर है। यद्यपि कि वायरस जनित परिस्थितियों के सामान्य होने में एक दीर्घ अवधि के लगने की आशंका प्रबल है, फिर भी सभी देश की सरकारों के समक्ष एक यक्ष प्रश्न उपस्थित है। क्या वे धीरे-धीरे पर्यटकों और व्यापारिक यात्रियों के लिए प्रतिबंधों को हटाएंगे? क्या वे फिर एक बार प्रवासियों का स्वागत करेंगे?

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ऐसी आशंका है कि महामारी के दब जाने या किसी प्रभावी वैक्सीन की खोज के बावजूद भी लोग विदेशियों को स्वीकार करने के लिए कम ही तैयार होंगे। लोग डरे हुए हैं, न केवल इस बीमारी से, बल्कि ऐसी ही किसी भावी महामारी से भी। बहुत से लोग इस महामारी को विदेशियों से जोड़ते हैं। यही कारण है कि दुनियाभर में चीनियों की तरह दिखने वाले लोगों को प्रताड़ित किया गया। चीन में अफ्रीकियों को प्रताड़ित किया गया। ट्रम्प प्रशासन ने आव्रजन को और अधिक कम करने का प्रस्ताव किया। दक्षिण अफ्रीका ने जिम्बाब्वे की सीमा पर बाड़ेबंदी की, जबकि खुद दक्षिण अफ्रीका में वायरस का प्रसार काफी अधिक था।

किसी भी देश की प्रगति में प्रवासियों का बड़ा योगदान हुआ करता है। धनी देशों में भी। ऑस्ट्रेलिया में 53 प्रतिशत डॉक्टर प्रवासी हैं, जबकि अमेरिका में 29 प्रतिशत। नर्सों, कृषकों, डिलिवरी ब्वाय, घरेलू कामगारों जैसे छोटे रोजगारों के संबंध में भी यही सच है। अमेरिका में चिकित्सा एवं जीवन विज्ञानियों के पेशे में कार्यरत 40 प्रतिशत विदेशी मूल के हैं। यहां तक कि वैक्सीन अनुसंधान पूरी दुनिया की मेधा से बनी टीम पर ही आधारित है। आधे से अधिक बड़ी अमेरिकी फर्में पहली या दूसरी पीढ़ी के अप्रवासियों द्वारा ही स्थापित हैं।

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अतः स्पष्ट है कि पूरी दुनिया को खिड़कियां खोलनी होंगी, दरवाजे खोलने होंगे। कोविड की समाप्ति के बाद प्रवासन फिर पहले जैसा ही हो जाएगा, क्योंकि यही वह प्रभावशाली उपकरण है, जो गरीबों को ऊपर उठा सकता है, अमीर देशों को जीवंत कर सकता है और दुनियाभर में नए विचारों को फैला सकता है। एक महामारी के कारण दुनिया में यहां से वहां, वहां से यहां लोगों का आना-जाना न तो बंद होगा न बंद होना चाहिए। देखना यह है कि यथास्थिति कब बहाल होती है, फिलहाल तो हालिया स्थिति को समेटते हुए ‘‘कोरानावायरस का कहर : विश्व व भारत’’ को इस अंक का आवरण आलेख बनाया गया है।

अमेरिका में 25 मई, 2020 को जब पुलिसकर्मी डेरेक शोविन ने गिरफ्तार अश्वेत जॉर्ज फ्लायड पर काबू पाने के लिए उसकी गर्दन पर पैर रखकर दबाया, तो फ्लाएड ने सांस न ले पाने का हवाला देते हुए (I Can’t breath) रहम की भीख मांगी ़किंतु पुलिसकर्मी नहीं माना और फ्लाएड की गर्दन दबाए रखी। अंततः उसकी मौत हो गई। इस हत्या के विरोध में अमेरिका में प्रदर्शन फैल गए। कई शहरों में कर्फ्यू लगाना पड़ा। दूसरी तरफ प्रशासन ने फ्लाएड की गर्दन को 9 मिनट तक दबाए रखने वाले पुलिसकर्मी पर कम गंभीर हत्या की द्वितीय श्रेणी का अभियोग लगाया। तीन अन्य अधिकारी, जो हत्यारे पुलिसकर्मी को रोकने में विफल रहे, पर भी कम अपराधों का आरोप लगाया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका में शांति बहाली के लिए सेना भेजने का सुझाव दिया। इन प्रशासनिक निर्णयों को चुनावों में वोट बटोरने की राजनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। संभवतः इससे गोरों के वोटों का ध्रुवीकरण होगा और रिपब्लिकन उम्मीदवार ट्रम्प की पुनः जीत की संभावनाएं बढ़ेंगी। राजनीतिज्ञों के पूर्वाग्रह ग्रस्त पक्षपातपूर्ण प्रशासनिक निर्णयों से भी किसी देश की उस संपूर्ण नस्ल, जाति, धर्म और अन्य उदारवादी जनसंख्या का दम घुटता है, जिसके विरुद्ध ये निर्णय लिए जाते हैं, भले ही जॉर्ज फ्लाएड की तरह इनकी मौत नहीं हो जाती है। क्या पूरी दुनिया में नस्ली, धार्मिक, जातीय एवं अन्य अल्पसंख्यकों के विरुद्ध ऐसे ही प्रशासनिक एवं राजनीतिक निर्णयों द्वारा दम घुटने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा है? बरास्ते अमेरिकी नस्ली हिंसा ऐसी ही राजनीति की पड़ताल डॉ. अंकित पाठक ने अपने आलेख में की है।

1949 में जब माओत्से तुंग के गुरिल्लाओं ने चीन में सत्ता छीन ली, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से पारिभाषित देश पर अधिकार नहीं किया था। हांगकांग ब्रिटिश शासित था, मकाऊ पर पुर्तगाल का अधिकार था, ताइवान राष्ट्रवादी सरकार के नियंत्रण में था, तिब्बत पर बुद्धिस्ट अनुयायी प्रभावी थे। सुदूर पश्चिम स्थित झिनजियांग के उइघर मुस्लिम साम्यवादी शासन से नियंत्रित होना नहीं चाहते थे। चीन में साम्यवादी शासन के 7 वर्ष बाद भी वह चीन नहीं बन सका है, जिसकी इच्छा साम्यवादी रखते थे। मकाओ और चीन एक देश द्विव्यवस्था के तहत चीन के साथ हैं। ताइवान अभी भी अलग है। झिनजियांग और तिब्बत शांत जरूर हैं, लेकिन केवल इस वजह से कि यहां के लोगों को आतंकित कर के रखा गया है। दरअसल हांगकांग में एक देश दो प्रणालियां आधिकारिक तौर पर 2047 में समाप्त होना है। इससे पूर्व ही चीन हांगकांग को अपने साम्यवादी रंग  में रंगना चाहता है, जबकि हांगकांग अपनी स्वायत्तता बरकरार रखना चाहता है। हांगकांग की वर्तमान उथल-पुथल वस्तुतः एक लंबी लड़ाई की पूर्वपीठिका है। ‘‘आज का हांगकांग, कल का ताइवान’’  हांगकांग में एक लोकप्रिय नारा है। इससे भी एक कदम आगे ‘‘आज का झिनजियांग, कल का हांगकांग’’ भी नारे के रूप में चीन की त्योरियों को चढ़ा रहा है। चीन इसके पीछे पश्चिम की ताकतों को जिम्मेदार मानता है और ताकत के सहारे इनके दमन पर आमादा है। हांगकांग और चीन के इन संबंधों पर सामयिक आलेख इस अंक में प्रस्तुत है।

इसके अतिरिक्त ब्रेक्जिट, उत्तर प्रदेश बजट और भारत वन स्थिति रिपोर्ट-2019 पर भी सामयिक आलेख प्रस्तुत हैं।

अन्य सभी स्तंभ यथावत हैं। पाठकों से प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में………।

 

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