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ब्रू-रियांग समस्या का अंत

End of the brew-reang problem
  • ब्रू-रियांग जनजाति
  • ब्रू-रियांग, जिन्हें मिजोरम में ‘ब्रू’ तथा त्रिपुरा में ‘रियांग’ जनजातीय समुदाय के नाम से पुकारा जाता है, इंडोमंगोलायड प्रजाति से संबंधित हैं। इनकी भाषा ‘‘कौब्रू’’ (Kaubru) तिब्बती-बर्मी भाषायी परिवार से संबंध रखती है। ब्रू-रियांग ऊपरी म्यांमार के शान (Shan) राज्य से बांग्लादेश के चटगांव पहाड़ी भू-भाग में कई झुंडों में प्रवासित हुए। चूंकि चटगांव पहाड़ी भू-भाग की सीमा भारत के त्रिपुरा तथा मिजोरम राज्यों से मिलती है, अतः ये शरणार्थी धीरे-धीरे मिजोरम राज्य में प्रवेश कर गए। मिजोरम में ये आइजोल जिले के लेंगाई और तीरेई (Teirei) नदी घाटी तथा लुंगेली व चिमतुईपुई (Chhimtuipui) जिले से होकर बहने वाली कर्णफूली नदी घाटी में बस गए। ब्रू-रियांग सामान्यतया झूम कृषि करते हैं, अतः घने जंगलों में रहना अधिक पसंद करते हैं। प्रकृति से अपने लगाव के कारण ये घाटियों, झरनों आदि के किनारे रहना पसंद करते हैं। कालांतर में मिजोरम की सीमा को पार कर ये कंचनपुर, चामनू, कैलाशपुर, अम्बासा तथा उत्तरी त्रिपुरा के अन्य स्थानों में भी बस गए। पुनः चटगांव पहाड़ी भू-भाग से ये लोग दक्षिण त्रिपुरा जिले के उदयपुर, बेलोनिया, अमरपुर तथा गंडाचारा उपखंड (Subdivision) में आकर बस गए। असम में ब्रू लोगों का प्रवासन चटगांव पहाड़ी भू-भाग से असम के चाचर क्षेत्र में हुआ। अधिकांश ब्रू-रियांग हिंदू धर्म के वैष्णव संप्रदाय को मानते हैं तथापि कुछ आबादी ईसाई धर्मावलंबी भी है। अधिकांश आबादी औपचारिक शिक्षा से दूर है। त्रिपुरा में इन्हें ‘प्राचीन अनुसूचित जनजाति’ (Primitive Scheduled Tribe) का दर्जा प्राप्त है। सांस्कृतिक रूप से भी ये त्रिपुरियों के अधिक नजदीक हैं, जबकि मिजोरम में ‘मिजो’ जनजाति से इनके संघर्षपूर्ण संबंध रहे हैं, जिसका विश्लेषण हम आगे करेंगे। इनके पिछड़ेपन के मार्ग में उद्योगों की कमी, कमजोर आधारभूत ढांचा और संचार व्यवस्था की कमी बड़ी बाधा (Greatest obstacle) रही है।
  • मिजो-ब्रू संघर्ष
  • वर्ष 1990 के पहले ‘ब्रू’ व ‘मिजो’ लोगों के बीच संघर्ष का कोई महत्वपूर्ण कारण नहीं था।
  • किंतु जब ब्रू समुदाय ने अपनी सांस्कृतिक पहचान का दावा करना प्रारंभ किया, तो मिजो जनजाति इनके उद्देश्यों के प्रति शंकाग्रस्त होने लगी।
  • 16 मार्च, 2001 को प्रकाशित ‘दक्षिण एशिया मानवाधिकार प्रलेखन केंद्र’ (SAHRDC) की रिपोर्ट के अनुसार, संपूर्ण विवाद का प्रारंभ वर्ष 1990 के एक संकल्प से प्रारंभ होता है।
  • यह संकल्प ‘ब्रू नेशनल यूनियन’ जो कि ब्रू लोगों का एक राजनीतिक संगठन था, के द्वारा पारित किया गया था। इस संकल्प में ब्रू नेशनल यूनियन ने ब्रू लोगों के लिए मिजोरम के अंदर ही एक स्वायत्तशासी जिला परिषद (Autonomous District Council-ADC) की मांग की थी।
  • शीघ्र ही मिजो छात्रों के संगठन ‘मिजो ज़िरलई पॉल’ (Mizo Zirlai Pauel-MZP) तथा ‘यंग मिजो एसोसिएशन (Young Mizo Association : YMA) द्वारा इसका विरोध किया गया तथा इसे मिजोरम को विभाजित करने का प्रयास करार दिया गया।
  • MZP का कहना था कि ‘ब्रू’ लोगों को शीघ्र ही मिजोरम छोड़ देना चाहिए। उनका मानना था कि ‘‘मिजोरम सिर्फ मिजो लोगों के लिए है न कि बाहरी लोगों के लिए।’’
  • MZP तथा YMA के नेतृत्व में ब्रू लोगों पर अत्याचार होने लगे। परिणामस्वरूप ये लोग त्रिपुरा और असम में शरण लेने को विवश हुए।
  • वर्ष 1994 में एक ब्रू उग्रवादी संगठन ‘ब्रू नेशनल आर्मी’ (Bru National Army : BNA) अस्तित्व में आई। BNA मिजोरम में ब्रू लोगों को कायम रखना चाहती थी।
  • अक्टूबर, 1997 के दौरान ईसाई धर्मावलंबी बहुसंख्यक मिजो जनजाति द्वारा ब्रू लोगों का जबरन ईसाई धर्म में परिवर्तन करवाया गया तथा ‘मिजो’ भाषा को ब्रू लोगों पर थोप दिया गया। ब्रू महिलाओं के साथ बलात्कार किए गए। गांवों को जला दिया गया।
  • लगभग 30,000 ब्रू जनजाति मिजोरम के मामित, कोलासिब तथा लुंगेली जिलों से भागकर त्रिपुरा में स्थापित अस्थाई राहत शिविरों में विस्थापित हुए।
  • केंद्र सरकार के आरंभिक प्रयास
  • वर्ष 2010 से भारत सरकार ने ‘ब्रू’ शरणार्थियों के स्थायी पुनर्वास के लिए सतत प्रयास किए हैं।
  • त्रिपुरा तथा मिजोरम राज्य सरकारों को केंद्र सरकार ब्रू शरणार्थियों की देखभाल के लिए सहायता प्रदान कर रही है।
  • उपर्युक्त दोनों राज्यों, ब्रू प्रतिनिधियों तथा केंद्र सरकार के मध्य 3 जुलाई, 2018 को हुए एक समझौते के तहत इन शरणार्थियों को दी जाने वाली सहायता राशि में उत्तरोत्तर वृद्धि की गई।
  • जिसके परिणामस्वरूप 328 ब्रू परिवारों के 1369 लोग मिजोरम वापस लौटे।
  • इस बीच लगातार ब्रू लोगों द्वारा त्रिपुरा में ही बसने की मांग की जाती रही, क्योंकि मिजोरम में वे स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं।
  • वर्तमान समझौता
  • 16 जनवरी, 2020 को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में ‘ब्रू-रियांग’ जनजाति के प्रतिनिधियों, त्रिपुरा सरकार और मिजोरम सरकार के मध्य एक स्थायी समझौते पर हस्ताक्षर किया गया। इस प्रकार 23 वर्ष पुरानी समस्या का अंत हो गया।
  • वर्तमान समझौते के अंतर्गत 34000 ब्रू शरणार्थी त्रिपुरा में बसेंगे। केंद्र सरकार इनके पुनर्वास तथा समग्र विकास का जिम्मा सम्भालेगी तथा इसके लिए 600 करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज प्रदान करेगी।
  • इन शरणार्थियों को राज्य के सामान्य नागरिकों की तरह सभी अधिकार प्राप्त होंगे।
  • समझौते में विस्थापित परिवारों को 40×30 वर्ग फीट के आवासीय भूखंड दिए जाएंगे।
  • 1.5 लाख रुपये गृह निर्माण के लिए, 4 लाख की सावधि जमा, 2 वर्ष तक 5000 रु. प्रति माह की आर्थिक सहायता, मुफ्त राशन 2 वर्ष तक प्रदान किए जाएंगे।
  • त्रिपुरा सरकार आवासीय भूखंडों का आवंटन 150 दिनों के भीतर करेगी तथा 270 दिन के भीतर मकान निर्मित कर दिए जाएंगे।
  • इस मौके पर त्रिपुरा में सक्रिय एक उग्रवादी संगठन ‘नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा’ NLFT (SD) के 88 सशस्त्र उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया तथा मुख्य धारा में शामिल हुए।
  • विदित हो कि NLFT (SD) वर्ष 1997 से गैर-कानूनी गतिविधियां (निवारण)  अधिनियम 1967 के अंतर्गत प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन है, जो अपनी गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार स्थापित कैम्पों से संचालित करता है।
  • निष्कर्ष
  • इस ऐतिहासिक समझौते में उत्तर-पूर्वी राज्यों की प्रगति तथा सशक्तीकरण के संकल्प की स्पष्ट झलक दिखाई पड़ती है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने समय-समय पर उत्तर-पूर्वी राज्यों के आर्थिक विकास, ढांचागत सुधार, संपर्क, पर्यटन तथा सामाजिक विकास में नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप किए हैं। प्रस्तुत समझौता इसी क्रम में एक अगला कदम है ताकि संपूर्ण उत्तर-पूर्व क्षेत्र एक शांत क्षेत्र के रूप में अपनी पहचान बना सके।

सं. अमित त्रिपाठी