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संयुक्त राष्ट्र, राज्य नहीं : दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला

United Nations, not state: Delhi High Court verdict
  • वर्तमान परिप्रेक्ष्य
  • 15 मई, 2019 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने ‘संजय बहल बनाम भारत संघ एवं अन्य’ की याचिका पर फैसला देते हुए कहा कि ‘संयुक्त राष्ट्र, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत एक राज्य नहीं है’ तथा ‘संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र के लिए उत्तरदायी नहीं है।
  • पृष्ठभूमि
  • याचिका एक बर्खास्त संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व कर्मी संजय बहल द्वारा की गई थी, जो दुर्व्यवहार/ कदाचार के दोषी पाए जाने पर सेवा से बर्खास्त कर दिए गए थे।
  • संजय बहल को अमेरिकी संघीय न्यायालय ने दुर्व्यवहार/कदाचार के आधार पर 97 महीने की कैद के साथ दो वर्ष की अनिवार्य परिवीक्षा (Mandatory Probation) की सजा सुनाई थी।
  • याची को मई, 2014 में कैद से रिहा करके भारत निर्वासित कर दिया गया था।
  • विवाद एवं न्यायालय का फैसला
  • न्यायमूर्ति सुरेश कुमार केत की एकल न्यायाधीश पीठ ने संयुक्त राष्ट्र (विशेषाधिकार एवं प्रतिरक्षा) अधिनियम, 1947 के तहत संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्राप्त प्रतिरक्षा से संबंधित याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला दिया।
  • दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर अपनी याचिका में याची ने दावा किया था कि उसके केस में निर्धारित प्रक्रियाओं का अनुपालन नहीं किया गया था।
  • नवंबर, 2018 में याची ने विदेश मंत्रालय को पत्र लिखकर नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 (Civil Procedure Code, 1908) की धारा-86 के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र संगठन के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई प्रारंभ करने की मांग की थी, जिसके जवाब में विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र को सम्मन जारी करने के लिए भारत सरकार की स्वीकृति आवश्यक नहीं है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र विदेशी राज्य नहीं बल्कि एक संगठन है।
  • नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा-86 यह सुनिश्चित करती है कि किसी विदेशी राज्य के खिलाफ केंद्र सरकार की सहमति से किसी भी न्यायालय में वाद दायर किया जा सकता है।
  • संयुक्त राष्ट्र (प्रतिरक्षा एवं विशेषाधिकार) अधिनियम, 1947 के अनुच्छेद 2 की धारा-2 में संयुक्त राष्ट्र को सभी प्रकार की कानूनी प्रक्रियाओं से बचाव का अधिकार देती है, जो सभी राष्ट्रीय कानूनों पर समान रूप से लागू होती है। परंतु इस वाद में न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि ‘संयुक्त राष्ट्र प्रतिरक्षा से छूट के अधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहता है, अतः राष्ट्रीय कानूनों के पालन से संबंधित अनुच्छेद याचिकाकर्ता की कोई सहायता नहीं करेगा।’
  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने संजय बहल के वाद में वर्ष 1947 की अनुसूची के अनुच्छेद 2 की धारा-2 का उल्लेख करते हुए कहा कि इस वाद में संयुक्त राष्ट्र को प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त है।
  • संबंधित अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
  • समान प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा-86 केंद्र सरकार की सहमति से राजदूतों, राजनयिकों, राष्ट्र प्रतिनिधियों के विरुद्ध वाद दायर करने का अधिकार देती है।
  • अनुच्छेद 12 में दी गई व्यापक परिभाषा के अनुसार, शब्द ‘राज्य’ का अर्थ संघ है एवं राज्य सरकारें, संसद एवं राज्य विधायिकाएं, सभी स्थानीय या अन्य अधिकारियों को भारत के क्षेत्र में या भारत सरकार के नियंत्रण में दर्शाता है।

सं. अश्वनी सिंह