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श्रीलंका में राजनीतिक संकट

Political crisis in Sri Lanka

   दक्षिण एशिया में स्थित भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका को राजनीतिक रूप से सबसे स्थिर देशों में से एक माना जाता है। हालांकि यह द्वीपीय देश इन दिनों राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। वर्तमान में श्रीलंका के सर्वोच्च न्यायालय के दखल के बाद इस संकट पर फिलहाल विराम लग गया है।

  • राजनीतिक संकट की पृष्ठभूमि
  • इस राजनीतिक संकट की शुरुआत 26 अक्टूबर, 2018 को उस समय हुई, जब राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने तत्कालीन प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को उनके पद से बर्खास्त कर दिया।
  • इसके साथ ही राष्ट्रपति सिरिसेना ने पूर्व राष्ट्रपति व मजबूत विपक्षी नेता महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। हालांकि श्रीलंका की 225 सदस्यीय संसद में राजपक्षे को आवश्यक बहुमत प्राप्त नहीं था।
  • राष्ट्रपति की इस कार्यवाही को असंवैधानिक मानते हुए रानिल विक्रमसिंघे ने अपने पद से हटने से इंकार कर दिया।
  • इन परिस्थितियों में देश में एक साथ दो प्रधानमंत्री हो जाने से एक बड़ा संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया।
  • जब राजपक्षे सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत नहीं जुटा सके तो राष्ट्रपति सिरिसेना ने नियत कार्यकाल से 20 महीने पहले ही संसद को भंग कर मध्यावधि चुनावों की घोषणाा कर दी।
  • विरोध प्रदर्शन एवं रैलियां
  • इसके बाद दोनों पक्षों के मध्य विरोध प्रदर्शन व रैलियों का सिलसिला प्रारंभ हो गया। बर्खास्त प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे के समर्थन में राजधानी कोलंबो के निकट स्थित श्रीलंका के प्रधानमंत्री के आधिकारिक निवास ‘टेंपल ट्रीस’ (Temple Trees) पर हजारों की संख्या में लोगों ने विरोध सभा की।
  • 5 नवंबर, 2018 को श्रीलंका के हजारों लोगों ने महिंदा राजपक्षे और मैत्रिपाला सिरिसेना की नई सरकार के समर्थन में रैली की। श्रीलंका पुलिस के अनुसार, इस रैली में लगभग 1 लाख 20 हजार लोग शामिल हुए थे।
  • न्यायपालिका की प्रभावी भूमिका
  • 3 दिसंबर, 2018 को देश के नए प्रधानमंत्री के रूप में महिंदा राजपक्षे और उनके मंत्रिमंडल की नियुक्ति के विरुद्ध 122 सांसदों द्वारा क्वो वारंटो रिट (Quo warranto writ) न्यायालय में दाखिल की गई।
  • अपीलीय कोर्ट ने महिंदा राजपक्षे एवं उनके मंत्रिमंडल को काम- काज से रोकने का अंतरिम आदेश जारी कर दिया।
  • 13 दिसंबर, 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति सिरिसेना के नियत समय से 20 महीने पहले संसद भंग करने के निर्णय को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
  • 14 दिसंबर, 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपील कोर्ट के अंतरिम आदेश को रोकने से भी इंकार कर दिया। इन परिस्थितियों में राजपक्षे के पास अपने पद से इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
  • वर्तमान स्थिति
  • 15 दिसंबर, 2018 को सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद राजपक्षे ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
  • 16 दिसंबर, 2018 को विक्रमसिंघे को फिर से प्रधानमंत्री के रूप में बहाल कर दिया गया। इसी दिन राष्ट्रपति सचिवालय में उन्हें पुनः प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई।
  • 20 दिसंबर, 2018 को राष्ट्रपति सिरिसेना ने विक्रमसिंघे के 30 सदस्यीय मंत्रिमंडल को शपथ दिलाई। मंगला समरवीरा को दोबारा वित्त मंत्री बनाकर 1 जनवरी, 2019 से सरकार के कामकाज हेतु आवश्यक धन उपलब्ध कराने के लिए अस्थायी बजट पास कराने का मार्ग सुनिश्चित किया गया।
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
  • श्रीलंका के राजनीतिक संकट पर सभी बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों एवं देशों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस संकट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सभी पक्षों को लोकतंत्र और संविधान का सम्मान करते हुए समाधान निकालना चाहिए।
  • चीन, पाकिस्तान और बुरुंडी जैसे देशों ने अपने आर्थिक एवं रणनीतिक हितों को देखते हुए राजपक्षे सरकार का समर्थन किया।
  • गौरतलब है कि राजपक्षे को चीन समर्थक माना जाता है, वहीं रानिल विक्रमसिंघे को भारत का करीबी माना जाता है।
  • ध्यातव्य है कि श्रीलंका पर चीन का बड़ा कर्ज एवं दोनों नेताओं (राजपक्षे और विक्रमसिंघे) की विदेश नीति को लेकर अलग दृष्टिकोण भी इस राजनीतिक संकट की एक प्रमुख वजह थी।
  • श्रीलंकाई संकट पर भारत ने परिपक्वतापूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लोकतांत्रिक गुणों और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राजनीतिक समाधान निकालने की नसीहत दी।
  • श्रीलंका की राजनीतिक प्रणाली
  • श्रीलंका की राजनीतिक प्रणाली अध्यक्षीय प्रणाली और संसदीय प्रणाली का मिला-जुला रूप है। इस प्रणाली में राष्ट्रपति देश व सरकार दोनों का प्रमुख होता है।
  • इस द्वीपीय देश में बहुदलीय प्रणाली (Multi-party System) प्रचलित है। सरकार द्वारा कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग किया जाता है।
  • सरकार के अन्य दो प्रमुख अंग न्यायपालिका और विधायिका में से न्यायपालिका पूर्णतया स्वतंत्र है, वहीं विधायी शक्तियां सरकार एवं संसद दोनों में निहित हैं।

लेखक-धीरेन्द्र त्रिपाठी

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