Contact Us: 0532-246-5524,25, M: -9335140296 Email: [email protected]

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग

National Kamdhenu Commission

पृष्ठभूमि

  • गोजातीय आबादी से प्राप्त पंचगव्य की औषधीय महत्ता तथा अन्य उपयोगिताओं के मद्देनजर सरकार द्वारा देश में गौसंरक्षण और विकास कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। स्वदेशी गोजातीय आबादी के संरक्षण एवं विकास हेतु ‘राष्ट्रीय कामधेनु प्रजनन केंद्र’ (National Kamdhenu Breeding Centre) की स्थापना की गई है।

वर्तमान परिदृश्य

  • 6 Òरवरी, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय कामधेनु आयोग की स्थापना के प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान की। केंद्रीय बजट 2019-20 में इसकी स्थापना की घोषणा की गई थी।

उद्देश्य

  • राष्ट्रीय कामधेनु आयोग का उद्देश्य देश में स्वदेशी नस्लों सहित समस्त गोजातीय आबादी की सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास करना है।
  • प्रभाव
  • राष्ट्रीय कामधेनु आयोग की स्थापना से देश में मवेशियों की सुरक्षा, संरक्षण और विकास को बल मिलेगा।
  • इसमें देशी नस्लों का विकास और संरक्षण भी शामिल है।
  • इसके परिणामस्वरूप पशुधन क्षेत्र में वृद्धि होगी, जो अधिक समावेशी है तथा इससे महिलाओं तथा छोटे और सीमांत किसानों को लाभ होगा।
  • राष्ट्रीय कामधेनु आयोग गाय, जैविक खाद, बायोगैस आदि के प्रजनन और पालन के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य में लगे हुए पशु चिकित्सा (Veterinary), पशु विज्ञान या कृषि विश्वविद्यालय या विभागों या केंद्र/राज्य सरकरों के संगठनों के साथ मिलकर काम करेगा।
  • राष्ट्रीय गोकुल मिशन

  दिसंबर, 2014 में 2025 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ राष्ट्रीय गोकुल मिशन की शुरुआत की गई थी। इसका उद्देश्य गोजातीय आबादी के आनुवंशिक उन्नयन के द्वारा स्वदेशी नस्लों का विकास और संरक्षण करना है। इस योजना में दो घटक शामिल हैं-

(i) गोजातीय प्रजनन के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (National Programme for Bovine Breeding)।

(ii) गोजातीय उत्पादकता पर राष्ट्रीय मिशन (National Mission on Bovine Productivity)।

  • वर्ष 2019-20 के अंतरिम बजट में राष्ट्रीय गोकुल मिशन के परिव्यय में 750 करोड़ रुपये की वृद्धि की गई है।
  • देशी नस्लों के संरक्षण की आवश्यकता क्यों?

  भारत में 299.6 मिलियन गोजातीय आबादी है, जिसमें से 190.9 मिलियन मवेशी (Cattle) हैं, जबकि 108.7 मिलियन भैंसें हैं, इनमें से 80 प्रतिशत मवेशी, देशी और गैर-विवरणी नस्लों के हैं। भारत के गोजातीय आनुवंशिक संसाधन का प्रतिनिधित्व 41 पंजीकृत देशी नस्ल के मवेशी और 13 पंजीकृत भैंस की नस्लों द्वारा किया जाता है। उल्लेखनीय है कि देशी जानवरों के दूध में वसा (Fat) और एसएनएफ (SNF : Solids Not Fat) की मात्रा उच्च होती है। इस बात के भी प्रमाण हैं कि विदेशी नस्ल के जानवरों की अपेक्षा देशी नस्ल के जानवरों की उत्पादकता जलवायु परिवर्तन से बहुत कम प्रभावित होगी।

  • निष्कर्ष

  केंद्र सरकार द्वारा अपने अंतरिम बजट में गोवंश संरक्षण एवं संवर्द्धन पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, गो संरक्षण के लिए पहले से लागू की गई योजनाओं की भी निगरानी की जानी है। देशी नस्ल के जानवरों की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए इनके संरक्षण के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, हालांकि इनकी संख्या लगातार घट रही है। पुंगनूर (Punganur) जैसी गाय की कुछ नस्लें संकटग्रस्त हो गई हैं। उम्मीद है कि राष्ट्रीय कामधेनु आयोग की स्थापना के बाद राष्ट्रीय गोकुल मिशन के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता मिलेगी।

लेखक-काली शंकर ‘शारदेय’