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राजकोषीय प्रदर्शन सूचकांक

Confederation of Indian Industry
  • वर्तमान परिप्रेक्ष्य
  • 5 जून, 2019 को भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) ने राजकोषीय प्रदर्शन सूचकांक पेश किया।
  • राजकोषीय प्रदर्शन सूचकांक केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा प्रस्तुत बजट की गुणवत्ता का आकलन है।
  • महत्वपूर्ण तथ्य
  • उक्त सूचकांक सीआईआई द्वारा विकसित किया गया एक अभिनव साधन है, जिसमें केंद्र और राज्य स्तर पर बजट की गुणवत्ता आकलन के लिए कई घटकों का प्रयोग किया गया है।
  • इन घटकों में पूंजीगत व्यय की गुणवत्ता, राजस्व व्यय की गुणवत्ता, राजकोषीय समझदारी, राजस्व गुणवत्ता और कर्ज सूचकांक शामिल है।
  • पूंजीगत व्यय की गुणवत्ता
  • पूंजीगत व्यय की गुणवत्ता का आकलन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में पूंजी व्यय की हिस्सेदारी से किया गया है।
  • राजस्व व्यय की गुणवत्ता           
  • राजस्व व्यय की गुणवत्ता का आकलन जीडीपी में ब्याज भुगतान, सब्सिडी, पेंशन और रक्षा मद में भुगतान की तुलना में राजस्व व्यय की हिस्सेदारी से किया गया है।
  • राजकोषीय समझदारी I-
  • इसके स्तर का आकलन जीडीपी के अनुपात में राजकोषीय घाटा के स्तर से किया गया है।
  • राजकोषीय समझदारी II-
  • इसके स्तर का आकलन जीडीपी के अनुपात में राजस्व घाटा के स्तर से किया गया है।
  • राजस्व गुणवत्ता का आकलन जीडीपी के अनुपात में शुद्ध कर राजस्व (राज्यों के मामलों में स्वयं कर राजस्व) के आधार पर किया गया है।
  • कर्ज सूचकांक का आकलन जीडीपी के अनुपात में ऋण और गारंटी में परिवर्तन के आधार पर किया गया है।
  • सूचकांक को तैयार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की मानव विकास सूचकांक प्रक्रिया को आधार बनाया गया है।
  • सूचकांक के प्रमुख बिंदु
  • भारतीय उद्योग परिसंघ ने वर्ष 2004-05 से वर्ष 2017-18 (राज्यों के लिए 2016-17) की अवधि के लिए राजकोषीय प्रदर्शन सूचकांक तैयार किया है।
  • सूचकांक में गैर-विशेष श्रेणी में आने वाले 18 राज्यों को शामिल किया गया है।
  • केंद्रीय स्थिति
  • वर्ष 2007-08 में केंद्र में राजकोषीय समेकन उच्चतम था, जबकि वर्ष 2009-10 सबसे खराब वित्तीय वर्ष रहा।
  • वर्ष 2010-11 में वित्तीय घाटे में सुधार के बावजूद वर्ष  2011-12 से वर्ष 2014-15 तक राजकोषीय प्रदर्शन सूचकांक (FPI) की स्थिति अच्छी नहीं रही।
  • यह स्थिति मुख्य रूप से कर राजस्व और व्यय गुणवत्ता सूचकांकों (राजस्व और पूंजी दोनों) के खराब प्रदर्शन के कारण थी।
  • वर्ष 2015-16 से सूचकांक में सुधार हुआ और वर्ष 2016-17 में यह उच्च स्तर पर हो गया।
  • वर्ष 2017-18 में प्रदर्शन में फिर से गिरावट आई।
  • यह गिरावट वर्ष 2017-18 में राजकोषीय घाटा सूचकांक में सुधार के बावजूद पूंजीगत व्यय में तेज बदलाव के कारण अपेक्षाकृत कम रहा।
  • राज्यों की स्थिति
  • व्यय की गुणवत्ता और राजस्व गुण में आर्थिक रूप से समृद्ध राज्यों की स्थिति कमजोर रही। जैसे- महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है और उच्च आय वर्ग में आते हैं।
  • ये राज्य समग्र राजकोषीय प्रदर्शन सूचकांक में आवश्यकता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाए।
  • कम आय वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश ने व्यय गुणवत्ता में सुधार किया और पिछले कुछ वर्षों में राजकोषीय प्रदर्शन सूचकांक में निरंतर अच्छा प्रदर्शन किया।
  • जबकि राजकोषीय घाटा सूचकांक में इन राज्यों का प्रदर्शन औसत से कम रहा।
  • बिहार ने गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों को राजकोषीय प्रदर्शन सूचकांक में पीछे छोड़ दिया।
  • राजकोषीय अनुशासन के संदर्भ में पश्चिम बंगाल, केरल और पंजाब का प्रदर्शन सबसे खराब रहा।
  • सूचकांक में बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य सामाजिक क्षेत्रों पर व्यय को लाभकारी माना गया है
  • साथ ही कर राजस्व को एक बारगी आय के स्रोत की तुलना में अधिक टिकाऊ स्रोत माना गया है।
  • भारतीय उद्योग परिसंघ की सिफारिशें
  • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम को केवल एक घटक पर ध्यान केंद्रित न करके अन्य घटकों पर भी एक साथ ध्यान देना चाहिए।
  • उल्लेखनीय है कि उक्त अधिनियम राजकोषीय घाटे को कम करने हेतु सरकारों के लिए लक्ष्य निर्धारित करता है।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत सभी संस्थाओं के समग्र प्रदर्शन पर व्यय गुणवत्ता, राजस्व प्राप्तियों की गुणवत्ता और राजकोषीय समझदारी के दृष्टिकोण से आकलन करना चाहिए।
  • भारतीय उद्योग परिसंघ
  • भारत उद्योग परिसंघ एक गैर-सरकारी, गैर-लाभकारी उद्योगों को नेतृत्व प्रदान करने वाला और उद्योग प्रबंधन संगठन है।
  • यह संगठन भारत की विकास प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
  • भारतीय उद्योग परिसंघ को 1895 ई. में स्थापित किया गया था।
  • इसका उद्देश्य सलाहकार और परामर्श संबंधी प्रक्रियाओं के माध्यम से भारत के विकास, उद्योग, सरकार और नागरिक समाज के बीच भागीदारी के लिए अनुकूल वातावरण बनाना है।
  • वर्तमान में इस व्यापार संघ के निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों से लघु, मध्यम उद्योगों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों सहित लगभग 9000 सदस्य हैं।
  • लगभग 276 राष्ट्रीय और क्षेत्रीय निकायों के 3,00,000 से अधिक उद्यमों की अप्रत्यक्ष सदस्यता है।

संराहुल त्रिपाठी