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मासिक पत्रिका सितंबर-अक्टूबर,2019 पी.डी.एफ. डाउनलोड

Magazine September October2019

विश्व के सुंदरतम स्थलों में से एक में शुमार कश्मीर की बड़ी व्यथा यह है कि इसकी पहचान को टुकड़ों में विभक्त करने की लगातार कोशिशें हुईं हैं। अप्रैल, 1948 में यह दो देशों के बीच बंट गया। आजाद कश्मीर गिलगित, बाल्टिस्तान अवैध रूप से पाक के हिस्से में गया तो जम्मू, लद्दाख और कश्मीर घाटी विलय संधि पर हस्ताक्षर (20 अक्टूबर, 1947) के द्वारा वैध तरीके से भारत में जुड़े। पाकिस्तान के हिस्से का कश्मीर शिया, सुन्नी एवं दार्दू आदि हिस्सों में विभक्त है, तो भारत के हिस्से का कश्मीर हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध जनसंख्या में विभक्त है। राजनीतिज्ञों ने विभाजन की खाइयों को लगातार चौड़ा करने का ही कार्य किया है। धारा 370 को कमजोर करने के बाद जम्मू-कश्मीर का एक और आधिकारिक विभाजन जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख में कर दिया गया है। यह समझने की जरूरत है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर (भारतीय हिस्सा एवं पाक अधिकृत हिस्सा) एक संस्कृति में आबद्ध क्षेत्र है। इसे आज नहीं तो कल एक होना ही है। सूरत कुछ भी हो सकती है। पाक अधिकृत क्षेत्र को भारत में मिलाकर ऐसा संभव हो सकता है। दोनों देशों द्वारा समझौते से एक-दूसरे क्षेत्र के कश्मीरियों को परस्पर मिलाने की स्वतंत्रता देकर ऐसा हो सकता है। और भी विकल्प हैं जिनका उल्लेख भी शायद राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आ जाए। संपूर्ण जम्मू-कश्मीर को एकबद्ध करने वाले बहुत से तत्व यहां मौजूद हैं। कश्मीरी रहस्यदर्शी कवयित्री ‘लल्ला’ (लल्लेश्वरी देवी) ऐसे ही तत्वों में से एक हैं। एक समय था जब कश्मीरी लोग कहते थे, ‘‘हम दो ही नाम जानते हैं; एक अल्लाह और दूसरा लल्ला।’’

लल्ला जो जन्म से लल्लेश्वरी देवी थी, लल्ला कैसे हुई? उसकी कहानी कुछ इस प्रकार है : कश्मीरी भाषा में लल्ला यानी पेट का मांस। कथा है कि वह निर्वस्त्र नग्न घूमती थीं। कुछ लोगों ने उनसे कहा, ‘‘एक स्त्री इस तरह घूमे यह अच्छा नहीं लगता। कम-से-कम पेट के नीचे के अंग तो ढंक ले। इस पर लल्ला ने पेट का मांस खींचकर अपने गुप्त अंग ढांके और बालों से छाती को छिपा लिया। इससे उनका नाम ‘लल्ला’ पड़ा। जैसे संतों/साध्वियों के संबंध में जनमानस में कहानियां तिरती हैं, वैसे ही लल्ला के संबंध में अनगिनत कहानियां हैं। वे उन्मणी दशा में गांव-गांव घूमती रहती थीं। बच्चे उन्हें चिढ़ाते हुए उनके पीछे-पीछे भागते। वे उन्हें पागल समझते। एक गांव में, उनके भक्त, कपड़े के एक दुकानदार ने लड़कों को चिढ़ाते हुए देखा तो बुलाकर खूब डांट लगाई। 

लल्ला भक्त दुकानदार के पास गईं और एक कपड़ा मांगा। दुकानदार ने फौरन कपड़ा पेश किया। लल्ला ने उसके दो समान दुकड़े कर एक बाएं कंधे पर डाला और एक दाएं कंधे पर। फिर वह बाजार में घूमने लगीं। रास्ते में कोई उन्हें गाली देता तो कोई नमस्कार करता। जैसे ही कोई गाली देता वह दाएं कंधे के कपड़े पर एक गांठ लगातीं और जब कोई नमस्कार करता तो बाएं कंधे के कपड़े पर एक गांठ लगातीं। शाम होते-होते वे लौटकर उस दुकानदार के पास गईं और उसे दोनों कपड़ों का वजन करने को कहा। दोनों बराबर थे। तब लल्ला ने उसे समझाया देख आज मुझे जितनी गाली मिली उतना ही सम्मान मिला। तो फिक्र क्यों करनी। कोई पत्थर फेंके या फूल, हिसाब बराबर है। लल्ला के पार्थिव शरीर का अंत कब और कैसे हुआ? इसके इर्द-गिर्द भी कहानियां हैं।

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हिंदू कहते हैं, वह आग की लपट बन गईं।, मुसलमान कहते हैं, उन्हें बिजबेहड़ा मस्जिद के पास दफनाया गया। इसी प्रकार की एक कथा यह है कि जब उनके शरीर के अंतिम संस्कार का प्रश्न उठा तो हिंदू और मुसलमान दोनों उन्हें अपना मानकर अपने ढंग से संस्कार करना चाहते थे। तब उनकी आत्मा ने वहां मौजूद लोगों से दो तसले लाने के लिए कहा। एक तसले में शरीर को बिठा दिया और दूसरा सिर पर उल्टा ढंक दिया। धीरे-धीरे उनका शरीर सूक्ष्म होता गया और दोनों तसले आपस में मिल गए। जब उन्हें खोला गया तो शरीर के स्थान पर केवल पानी था, जिसे दोनों संप्रदायों ने बांट लिया। आज के घायल कश्मीर को मां लल्ला के प्यार भरे मरहम की जरूरत है। लल्ला की ममतामयी याद कश्मीर के लिए बेहद जरूरी है। इस्लाम के अनुयायी अपनी औरतों का चेहरा भी नहीं देखते लेकिन अल्लाह के बराबर नग्न विचरने वाली लल्ला की इबादत करते हैं यह महत्वपूर्ण बात है। इस बार के आवरण आलेख में विमर्श का विषय कश्मीर ही है। आर्थिक समीक्षा एवं बजट के आंकड़ों की बोझिलता प्रायः परीक्षार्थियों को परेशानी में डालते हैं।

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आर्थिक समीक्षा की ऐसी कठिनाई को दूर करने के लिए हजार से अधिक पृष्ठों वाली समीक्षा को चंद पृष्ठों में चित्रात्मक शैली में इस प्रकार संजोया गया है कि परीक्षा-प्रश्न इनसे बाहर न जाने पाएं। इसी प्रकार केंद्रीय बजट को इस प्रकार सरल एवं सहज भाषा में समझाने का प्रयास किया गया है कि यह हमारे पाठकों के लिए दुरूह न रह जाए। आर्थिक एवं राजनैतिक उहापोह भरे माहौल के वर्तमान दौर में जी-20 जैसे शिखर सम्मेलनों का खासा महत्व है। जी-20 का 14वां शिखर सम्मेलन जापान के ओसाका नगर में संपन्न हुआ। इस अंक में इस पर सामयिक आलेख प्रस्तुत है।

भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल क्रिकेट की सबसे बड़ी प्रतियोगिता ‘‘क्रिकेट विश्व कप 2019’’ का आयोजन इस बार इंग्लैंड एवं वेल्स में संपन्न हुआ। इस अंक में इस पर भी सामयिक आलेख प्रस्तुत है। पाठकों से सुझाव आमंत्रित हैं। इस बार अगस्त अंक अपरिहार्य परिस्थितियोंवश प्रकाशित नहीं किया जा सका है, जिसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं।