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भारत के पहले लोकपाल का गठन

Constitution of India's first Lokpal
  • पृष्ठभूमि
  • लोकपाल या ऑम्बुड्समैन नामक संस्था ने प्रशासन के प्रहरी बने रहने में अंतरराष्ट्रीय सफलता प्राप्त की है। इसका प्रारंभिक श्रेय स्वीडन को जाता है, जहां सर्वप्रथम इस संस्था की अवधारणा की कल्पना की गई। भारत में लोकपाल नाम वर्ष 1963 में कानूनविद् एल.एम. सिंघवी ने दिया था। 1809 ई. में स्वीडन के बाद वर्ष 1919 में फिनलैंड में, वर्ष 1954 में डेनमार्क में, वर्ष 1961 में नॉर्वे में तथा वर्ष 1967 में ब्रिटेन में ऑम्बुड्समैन की स्थापना की गई थी। अब तक 135 से अधिक देशों में ऑम्बुड्समैन की नियुक्ति की जा चुकी है। भारत में वर्ष 1966 में मोरार जी देसाई की अध्यक्षता में गठित पहले प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा केंद्र में लोकपाल तथा राज्यों में लोकायुक्त नामक कानूनी संस्था की स्थापना की सिफारिश के इतने दिनों बाद अब जाकर यह व्यवस्था साकार रूप ले पाई है।
  • वर्तमान परिदृश्य
  • 23 मार्च, 2019 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन चयन समिति की सिफारिश पर न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष को लोकपाल के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की चयन समिति ने न्यायमूर्ति पी.सी. घोष के नाम की सिफारिश की थी। समिति के सदस्य और लोक सभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस बैठक में भाग नहीं लिया था।
  • लोकपाल का गठन
  • राष्ट्रपति द्वारा पी.सी. घोष को लोकपाल के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया है। कुल 8 सदस्यीय पैनल में 4 न्यायिक सदस्य तथा 4 गैर-न्यायिक सदस्य नियुक्त किए गए हैं। न्यायिक सदस्यों में न्यायमूर्ति दिलीप बाबा साहब भोंसले, न्यायमूर्ति अभिलाषा कुमारी, न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार मोहन्ती तथा न्यायामूर्ति अजय कुमार त्रिपाठी शामिल हैं। जबकि गैर-न्यायिक सदस्यों में दिनेश कुमार जैन, अर्चना रामासुंदरम, महेंद्र सिंह तथा इंद्रजीत प्रसाद गौतम शामिल हैं। इस प्रकार लोकपाल में एक अध्यक्ष और आठ सदस्य हैं।
  • योग्यता
  • ऐसा व्यक्ति, जो भारत का मुख्य न्यायमूर्ति है या रहा है, या उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश है या रहा है या कोई ऐसा विख्यात व्यक्ति जो उपधारा (3) के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट पात्रता को पूरा करता है, लोकपाल का अध्यक्ष होने की योग्यता रखता है।
  • उपधारा (3) (क) के अनुसार, कोई व्यक्ति किसी न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए पात्र होगा, यदि वह उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है, या रहा है, या किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायामूर्ति है या रहा है। उपधारा (3) के खंड (ख) के अनुसार, कोई व्यक्ति न्यायिक सदस्य से भिन्न किसी सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए पात्र होगा, यदि वह निर्दोष, सत्यनिष्ठा और उत्कृष्ठ योग्यता वाला ऐसा व्यक्ति है, जिसके पास भ्रष्टाचार-निरोध नीति, लोक प्रशासन, सतर्कता, वित्त, जिसके अंतर्गत बीमा और बैंककारी भी हैं, विधि और प्रबंधन से संबंधित विषयों में विशेष ज्ञान और कम-से-कम 25 वर्ष की विशेषज्ञता है।
  • कार्यकाल एवं वेतन
  • अधिनियम, 2013 की धारा 6 के अनुसार, अध्यक्ष और प्रत्येक सदस्य, कार्यभार ग्रहण करने की तारीख से 5 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने, जो भी पहले हो, तक के लिए पद पर बने रहेंगे।
  • धारा 7 के अनुसार अध्यक्ष का वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें भारत के मुख्य न्यायाधीश के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों के समान होगी। जबकि अन्य सदस्यों के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों के समान होंगी।
  • क्या है ऑम्बुड्समैन
  • ऑम्बुड्मैन स्वीडिश भाषा का एक शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ लोगों का प्रतिनिधि  या एजेंट होता है। इससे तात्पर्य एक ऐसे व्यक्ति से है जिसे कुप्रशासन, भ्रष्टाचार, अकुशलता, अपारदर्शिता एवं पद के दुरुपयोग से नागरिक अधिकारों की रक्षा हेतु नियुक्त किया जाए। विभिन्न देशों में ऑम्बुड्समैन को भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। ब्रिटेन, डेनमार्क एवं न्यूजीलैंड में यह संस्था ‘संसदीय आयुक्त’ के नाम से जानी जाती है। रूस में इसे वक्ता अथवा प्रोसिक्यूटर के नाम से जानते हैं। भारत में इसे लोकपाल के नाम से संबोधित किया जाता है।
  • लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013
  • केंद्रीय स्तर पर लोकपाल एवं राज्य स्तर पर लोकायुक्त संस्थाओं की स्थापना के लिए बहुप्रतीक्षित लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (2014 का अधिनियम सं. 1) संसद द्वारा वर्ष 2014 में पारित किया गया। इसे 1 जनवरी, 2014 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली। यह अधिनियम 16 जनवरी, 2014 से प्रभावी है। इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है।
  • लोकपाल चयन समिति
  • लोकपाल की सिफारिश करने वाली चयन समिति में निम्नलिखित लोग शामिल होते हैं-

   (i)  प्रधामनंत्री - अध्यक्ष

   (ii)  लोक सभा अध्यक्ष - सदस्य

   (iii)  लोक सभा में विपक्ष का नेता - सदस्य

   (iv) भारत का मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा नाम निर्दिष्ट

       उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश-सदस्य

   (v)  राष्ट्रपति द्वारा नाम निर्दिष्ट किया जाने वाला एक विख्यात

       विधिवेत्ता - सदस्य

   उल्लेखनीय है कि अध्यक्ष या किसी सदस्य की कोई नियुक्ति, केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि चयन समिति में कोई रिक्ति है।

निष्कर्ष

  • वर्तमान में भ्रष्टाचार एक प्रमुख समस्या बन गया है। इसे समाप्त करने के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं, जो कि नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं। इन्हीं प्रयासों के तहत लोकपाल की स्थापना की गई है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश गजेंद्र गढ़कर ने अपनी पुस्तक ‘लॉ, लिबर्टी एंड सोशल जस्टिस’ में उल्लेख किया कि जब तक हम भारत में ऑम्बुड्समैन जैसी संस्था का विकास नहीं करते और संविधान में संशोधन करके अथवा विधायी प्रक्रिया के माध्यम से इस संस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान नहीं करते, तब तक देश में भ्रष्टाचार रूपी समस्या का प्रभावकारी रूप से निदान नहीं हो सकेगा। इसके अतिरिक्त लोगों को नैतिक रूप से शिक्षित किए जाने की भी जरूरत है।

लेखक-काली शंकर