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प्रधानमंत्री जी-वन योजना

   ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी मुद्दों के कारण वैश्विक स्तर पर जैव ईंधन को महत्वपूर्ण संसाधन माना गया है। जैव ईंधन के उपयोग को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक देशों ने अपनी घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न कार्यप्रणालियों, प्रोत्साहन और सब्सिडी के माध्यम को अपनाया है। भारत सरकार ने भी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम, राष्ट्रीय बायोडीजल मिशन, बायोडीजल अपमिश्रण कार्यक्रम जैसे सुव्यवस्थित कार्यक्रमों के माध्यम से देश में जैव ईंधन को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास किए हैं। परंतु तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद भारत में वर्ष 2017-18 के दौरान इथेनॉल की खरीद काफी कम रही। अतः पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा बायोमास और अन्य कचरों से दूसरी पीढ़ी के इथेनॉल प्राप्त करने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए ‘प्रधानमंत्री जी-वन योजना’ लागू की गई है। इसके अंतर्गत देश में दूसरी पीढ़ी की इथेनॉल क्षमता विकसित करने और इस नए क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने का प्रयास किया जा रहा है।

  • 28 फरवरी, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने प्रधानमंत्री जी-वन (JI-VAN-जैव ईंधन वातावरण अनुकूल फसल अवशेष निवारण) योजना हेतु वित्तीय सहायता को मंजूरी प्रदान कर दी।
  • इसके अंतर्गत ऐसी एकीकृत बायो-इथेनॉल परियोजनाओं हेतु वित्तीय सहायता का प्रावधान है, जिसमें लिग्नोसेलुलॉसिक बायोमास और अन्य नवीकरणीय फीडस्टॉक का प्रयोग किया जाता है।
  • जी-वन योजना हेतु वर्ष 2018-19 से वर्ष 2023-24 की अवधि में कुल 1969.50 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय को मंजूरी प्रदान की गई है।
  • इस राशि में से 1800 करोड़ रुपये 12 वाणिज्यिक परियोजनाओं की मदद हेतु, 150 करोड़ रुपये प्रदर्शित परियोजनाओं हेतु तथा शेष 9.50 करोड़ रुपये केंद्र को उच्च प्रौद्योगिकी प्रशासनिक शुल्क के रूप में दिए जाएंगे।
  • इस योजना के अंतर्गत वाणिज्यिक स्तर पर 12 परियोजनाओं को और प्रदर्शन के स्तर पर दूसरी पीढ़ी के 10 इथेनॉल परियोजनाओं को दो चरणों में वित्तीय सहायता दी जाएगी।
  • पहला चरण वर्ष 2018-19 से वर्ष 2022-23 तक होगा। इस अवधि में 6 वाणिज्यिक परियोजनाओं और 5 प्रदर्शन के स्तर वाली परियोजनाओं को आर्थिक सहायता दी जाएगी।
  • दूसरा चरण वर्ष 2020-21 से वर्ष 2023-24 तक होगा। इस अवधि में शेष बची 6 वाणिज्यिक परियोजनाओं और 5 प्रदर्शन स्तर वाली परियोजनाओं को सहायता की व्यवस्था की गई है।
  • इस योजना के अंतर्गत दूसरी पीढ़ी के इथेनॉल क्षेत्र को प्रोत्साहित एवं सहायता करने का कार्य किया गया है। इस योजना से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होने की संभावना है-

1. जीवाश्म ईंधन के स्थान पर जैव ईंधन के प्रयोग को बढ़ावा देकर जीवाश्म ईंधनों के आयात पर निर्भरता कम करने की भारत सरकार की परिकल्पना को साकार करना।

   2.   जीवाश्म ईंधन प्रगतिशील सम्मिश्रण या विकल्प के माध्यम से हरित गृह गैसों के उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य को प्राप्त करना।

   3.   बायोमास या फसल अवशेष के जलाने से उत्पन्न पर्यावरण संबंधी चिंताओं का समाधान करना एवं नागरिकों के स्वास्थ्य में सुधार लाना।

   4.   किसानों को उनके अपशिष्ट कृषि अवशेषों का लाभकारी आय उपलब्ध कराते हुए किसानों की आय में सुधार करना।

   5.   द्वितीय पीढ़ी की इथेनॉल परियोजना तथा बायोमास आपूर्ति शृंखला में ग्रामीण एवं शहरी लोगों हेतु रोजगार के अवसर उत्पन्न करना।

   6.   बायोमास अपशिष्ट एवं शहरी क्षेत्रों से निकलने वाले अपशिष्टों के संग्रहण की उचित व्यवस्था कर ‘स्वच्छ भारत मिशन’ कार्यक्रम में सहयोग करना।

   7.   द्वितीय पीढ़ी के बायोमास इथेनॉल प्रौद्योगिकियों का स्वदेशीकरण करना।        

  • योजना के लाभार्थियों द्वारा बनाए गए इथेनॉल को अनिवार्य रूप से तेल विपणन कंपनियों को आपूर्ति की जाएगी ताकि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम के अंतर्गत इनमें निर्धारित मात्रा में मिश्रण किया जा सके।
  • प्रधानमंत्री जी-वन योजना को लागू करने का अधिकार पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाली एक तकनीकी  इकाई ‘सेंटर फॉर हाई टेक्नोलॉजी’ को सौंपा गया है।
  • इस योजना का लाभ उठाने के इच्छुक परियोजना विकासकर्ताओं को अपने प्रस्ताव समीक्षा हेतु मंत्रालय की वैज्ञानिक सलाहकार समिति को सौंपने होंगे।
  • इस समिति द्वारा अनुशंसित परियोजनाओं को मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में संचालन समिति द्वारा मंजूरी दी जाएगी।
  • भारत सरकार ने ईबीपी कार्यक्रम वर्ष 2003 में लागू किया था। इसके माध्यम से पेट्रोल में निर्धारित मात्रा में इथेनॉल का मिश्रण कर पर्यावरण को जीवश्म ईंधनों के प्रयोग से होने वाले दुष्प्रभावों से बचाना, कच्चे तेल के आयात को कम कर विदेशी मुद्रा बचाना एवं किसानों को क्षतिपूर्ति दिलाना है।
  • वर्तमान में ईबीपी कार्यक्रम 21 राज्यों एवं 4 संघ शासित प्रदेशों में चलाया जा रहा है।
  • इस कार्यक्रम के अंतर्गत तेल विपणन कंपनियों को पेट्रोल में 10 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाना अनिवार्य किया गया है।
  • वर्तमान नीति के अंतर्गत पेट्रो-रसायन के अलावा मोलासिस तथा नॉन-फीडस्टॉक उत्पादों जैसे सेलुलोज एवं लिग्नोसेलुलोज जैसे पदार्थों से इथेनॉल प्राप्त करने की अनुमति दी गई है।
देश में जैव ईंधन के उत्पादन के लिए संभावित कच्चे माल के रूप में उपलब्ध पदार्थ एथेनॉल उत्पादन हेतु : बी. शीरा, गन्ने का रस, घास के रूप में बायोमास, कृषि अवशेष (चावल का पुआल, कपास की डंठल, मक्के के कोष, लकड़ी का बुरादा, खोई इत्यादि) शक्कर युक्त सामग्री, जैसे-चुकंदर, चारा इत्यादि तथा स्टॉर्च युक्त सामग्री जैसे-मक्का, कसावा, सड़ा हुआ आलू आदि; अनाज जैसे-गेहूं, चावल इत्यादि के अखाद्य योग्य दाने। शैवाल युक्त फीडस्टॉक तथा समुद्री शैवाल की खेती भी एथेनॉल उत्पादन हेतु संभावित फीडस्टॉक हो सकती है। बायोडीजल उत्पादन हेतु : अखाद्य तिलहन, प्रयोग किया हुआ खाद्य तेल, पशुओं की चर्बी, एसिड ऑयल, शैवाल फीडस्टॉक आदि।
उन्नत जैव ईंधन हेतु : बायोमास, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक अपशिष्ट आदि। u गैर-खाद्य तिलहन/फसलों जैसे पोंगामिया पिन्नता (करंज), मेलिया अजादिरचट्टा (नीम), एरंड, जेट्रोफा केरकस, कॉलोफिलम इनोफिलम, सिमरोबा ग्लॉका, हिबिस्कस कैनबिनस आदि का जैव ईंधन हेतु प्रयोग किया जा सकता है।
बायोएथेनॉल हेतु मीठे ज्वार और ऊर्जा घास जैसे मिसकेनथुस जाईगंटम, स्विचग्रास (पैनिकम विग्राटम), विशालकाय रीड (अरुंडो डोनाक्स) इत्यादि का भी उपयोग किया जा सकता है।
परिवहन ईंधन के रूप में प्रयोग किए जा सकने वाले ‘‘जैव ईंधन’’
बायोएथेनॉल – बायोमास से उत्पन्न इथेनॉल जैसे कि चीनी युक्त सामग्री, जैसे- गन्ना, चुकंदर, मीठे चारा आदि; स्टॉर्च युक्त मक्का, कसावा, पके आलू, शैवाल आदि; और सेल्युलोजिक सामग्रियों जैसे कि बर्गेस, लकड़ी का कचरा, कृषि या वन अवशेष या औद्योगिक अपशिष्ट जैसे अन्य नवीकरणीय संसाधन।
बायोडीजल – गैर-खाद्य वनस्पति तेलों, एसिड तेल, खाना पकाने के तेल या पशु वसा और जैव-तेल से बने फैटी एसिड के मिथाइल या एथिल एस्टर। u लिग्नोसेलुलॉसिक फीडस्टॉक्स (जैसे और वनों के अवशेष, चावल और गेहूं के भूसे, मक्का, लकड़ी रूपी बायोमास)
जैव सीएनजी : जैव गैस का शुद्ध रूप जिसकी संरचना और ऊर्जा क्षमता जीवाश्म आधारित प्राकृतिक गैस के समान है तथा इसे कृषि अवशेषों, पशुओं के गोबर, खाद्य अपशिष्ट और सीवेज पानी से उत्पन्न किया जाता है।

सं. ललिन्द्र कुमार