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प्रथम द्वैमासिक मौद्रिक नीति वक्तव्य, 2019-20

First Quarterly Monetary Policy Statement, 2019-20
  • वर्तमान परिप्रेक्ष्य
  • 4 अप्रैल, 2019 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर शक्तिकांत दास की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति (MPc) द्वारा ‘प्रथम द्वैमासिक मौद्रिक नीति वक्तव्य, 2019-20’ (First Bi-Monthly Monetary Policy Statement, 2019-20) जारी किया गया।
  • मौद्रिक नीति समिति द्वारा लिए गए निर्णय के तहत ‘चलनिधि समायोजन सुविधा’ (LAF) के अंतर्गत नीतिगत दरों में परिवर्तन (वृद्धि/कमी) करने का निर्णय किया गया है।
  • महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय
  • मौद्रिक नीति समिति द्वारा ‘चलनिधि समायोजन सुविधा’ के अंतर्गत ‘रेपो दर’ (Repo Rate) में तत्काल प्रभाव से 25 आधार अंकों की कमी करते हुए रेपो दर को 6 प्रतिशत करने का निर्णय लिया गया है।
  • ध्यातव्य है कि छठवीं द्वैमासिक मौद्रिक नीति वक्तव्य, 2018-19 में रेपो दर 6.25 प्रतिशत निर्धारित थी।
  • रेपो दर में परिवर्तन (कमी) करने के परिणामस्वरूप ‘रिवर्स रेपो दर’ (Re-RepoRate) भी पूर्व के 6 प्रतिशत से परिवर्तित होकर 5.75 प्रतिशत पर समायोजित हो गई।
  • सीमांत स्थायी सुविधा दर (MSF) तथा बैंक दर (Bank Rate) भी 25 आधार अंकों की कमी के साथ पूर्व के स्तर 6 प्रतिशत से परिवर्तित (कमी) होकर प्रत्येक 6.25 प्रतिशत पर समायोजित हो गए।
  • नकद आरक्षित अनुपात (CRR) तथा एस.एल.आर. (SLR) को पूर्व के स्तर क्रमशः 4 प्रतिशत एवं 19.25 प्रतिशत पर ही बरकरार रखा गया है।
  • मौद्रिक नीति का प्रभाव
  • रेपो दर (Repo Rate) ब्याज की वह दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक, बैंकों को ऋण (Fund) प्रदान करता है। चूंकि ‘रेपो दर’ घटने से बैंकों को ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ (RBI) से सस्ता ऋण प्राप्त हो सकेगा, इसलिए बैंक भी अब कम ब्याज दर पर ऋण (Loan) दे पाएंगे। इससे नया ऋण सस्ता होगा, जबकि ऋण ले चुके लोगों को या तो ई.एम.आई.  (Equated Monthly Income : EMI) में या पुनर्भुगतान अवधि (Repayment Period) में कटौती का फायदा भी मिल सकता है।
  • अन्य संबंधित तथ्य
  • वर्तमान मौद्रिक नीति चालू वित्त वर्ष की पहली मौद्रिक नीति समीक्षा है।
  • समिति द्वारा लिए गए निर्णय के तहत मौद्रिक नीति के रुख को ‘नपी-तुली कठोरता’ (Calibrated Tightening) से ‘तटस्थ’ पर बरकरार रखा गया है।
  • छः सदस्यीय एमपीसी (MPC) की बैठक की अध्यक्षता आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने की। आरबीआई गवर्नर बनने के बाद यह उनकी दूसरी एमपीसी बैठक थी।
  • अगस्त, 2017 से लेकर वर्तमान मौद्रिक नीति तक यह दूसरा अवसर है, जब केंद्रीय बैंक ने रेपो दर में कमी की है, जबकि इस दौरान दो बार (जून एवं अगस्त, 2018 में) ब्याज दरों में वृद्धि की गई थी। शेष समय में इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया था।
  • घरेलू अर्थव्यवस्था
  • घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) द्वारा फरवरी, 2019 में जारी किए गए वर्ष 2018-19 के दूसरे अग्रिम अनुमानों में भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर को पूर्व के 7.2 प्रतिशत की तुलना में संशोधित करते हुए 7 प्रतिशत कर दिया गया।
  • सीएसओ (CSO) के दूसरे अग्रिम अनुमान ने वर्ष 2018-19 में वास्तविक सकल मूल्य वर्धन (GVA) को वर्ष 2017-18 के 6.9 प्रतिशत की तुलना में कमी करते हुए 6.8 प्रतिशत रखा गया।
  • वर्ष 2018-19 के लिए खाद्यान्न उत्पादन का दूसरा अग्रिम अनुमान 281.4 मिलियन टन था, जो वर्ष 2017-18 के चौथे अग्रिम अनुमान की तुलना में 1.2 प्रतिशत कम था। लेकिन वर्ष 2017-18 के दूसरे अग्रिम अनुमान की तुलना में 1.4 प्रतिशत अधिक था।
  • उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में वर्ष-दर-वर्ष परिवर्तन द्वारा मापी गई खुदरा मुद्रास्फीति, चार महीने की लगातार गिरावट के बाद फरवरी में बढ़कर 2.6 प्रतिशत हो गई।
  • मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के कारण पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में हुई कमी की वजह से जनवरी-फरवरी, 2019 में निर्यात वृद्धि कमजोर रही।
  • गैर-तेल निर्यात इंजीनियरिंग सामान, रसायन, चमड़ा और समुद्री उत्पादों में या तो क्रमिक रूप से कम अथवा नकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई।
  • फरवरी, 2019 में व्यापार घाटा क्रमिक रूप से और वर्ष-दर-वर्ष दोनों आधारों पर 17 महीनों में कम होकर अपने निम्नतम स्तर पर था।
  • 31 मार्च, 2019 को भारत का विदेशी ऋण आरक्षित निधि 412.9 बिलियन डॉलर रही।
  • संभावना
  • फरवरी, 2019 के छठे द्वैमासिक मौद्रिक नीति संकल्प में वर्ष 2018-19 के चौथी तिमाही हेतु सीपीआई (CPI) मुद्रास्फीति 2.8 प्रतिशत, वर्ष 2019-20 के प्रथम छमाही हेतु 3.2-3.4 प्रतिशत तथा वर्ष 2019 के तीसरी तिमाही हेतु 3.9 प्रतिशत का अनुमान संतुलित जोखिम के साथ लगाया गया था।
  • जनवरी-फरवरी, 2019 में वास्तविक मुद्रास्फीति का औसत 2.3 प्रतिशत था।
  • फरवरी, 2019 की मौद्रिक नीति में वर्ष 2019-20 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत, (प्रथम छमाही में 7.2 – 7.4% की सीमा तक तथा तीसरी तीमाही में 7.5% की सीमा तक) अनुमानित थी।
  • वर्तमान मौद्रिक नीति में वर्ष 2019-20 के लिए सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत (प्रथम छमाही में 6.8 – 7.1% की सीमा में तथा द्वितीय छमाही 7.3 – 7.4% की सीमा में) जोखिमों के साथ समान रूप से संतुलित रूप में अनुमानित है।
  • एमपीसी के अनुसार, घरेलू अर्थव्यवस्था विशेष रूप से वैश्विक मोर्चे पर विपरीत परिस्थितियों का सामना कर रही है। इस समय जरूरत निजी निवेश को कम करके घरेलू आवेशों को मजबूत करने की है, जो कि सुस्त बना हुआ है।
  • डॉ. पामी दुआ, डॉ. रविंद्र एच.ढोलकिया, डॉ. माइकल देवब्रत पात्र और शक्तिकांत दास ने नीतिगत रेपो दर को 25 आधार अंकों तक कम करने के निर्णय के पक्ष में मत किया। डॉ. चेतन घाटे और डॉ. विरल वी. आचार्य ने नीतिगत दर को अपरिवर्तित रखने के लिए मतदान किया।
  • विश्लेषण
  • वित्त वर्ष 2019-20 की पहली मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश की अर्थव्यवस्था को बहुत उत्साहजनक नहीं बताया है।
  • आरबीआई के अनुसार, विनिर्माण उद्योग की रफ्तार अपेक्षित गति से नहीं बढ़ रही है, सेवा क्षेत्र की स्थिति भी अच्छी नहीं है। वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री तथा अंतरराष्ट्रीय उड़ानों व मालभाड़े में कमी होने के साथ-साथ निर्यात के स्तर पर भी काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति है।
  • इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी चुनौतियां हैं, जैसे कच्चे तेल की कीमतें जिनमें अभी भी स्थिरता नहीं आई है।
  • आरबीआई के अनुसार, आर्थिक विकास दर में अभी भी सुस्ती के लक्षण हैं।अतः इस सुस्ती को खत्म करने हेतु निजी निवेशकों को बढ़ावा देकर विकास दर को आगे करने वाले तत्वों को मजबूत करने की जरूरत है। महंगाई के स्तर पर कोई चुनौती नहीं है, लेकिन विकास के मोर्चे पर चुनौतियां मौजूद हैं।
  • मौद्रिक नीति रिपोर्ट में घरेलू स्तर पर छः चुनौतियों का जिक्र किया गया है जो निम्न हैं-

   (1)  मानसून के सामान्य से कम होने का खतरा

   (2)  ईंधन की कीमतों में उछाल की संभावना

   (3)  कच्चे तेल की कीमतों में अनिश्चितता

   (4)  कुछ दूसरे उत्पादों में महंगाई के बढ़ने का खतरा

   (5)  वित्तीय बाजार में अनिश्चितता

   (6)  राजकोषीय असंतुलन

  • इन चुनौतियों के अलावा निर्यात की स्थिति भी लगातार खराब है। वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में आगे और सुस्ती आ सकती है, जिसका असर भारत के निर्यात पर और अधिक पड़ेगा।
  • इन उपर्युक्त चुनौतियों को देखते हुए ही केंद्रीय बैंक ने कर्ज की दरों को सस्ता किया है ताकि ज्यादा से ज्यादा कर्ज दिया जाए और आर्थिक विकास दर को तेज किया जा सके।

लेखक-शिव शंकर तिवारी