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न्यायमूर्ति वर्मा समिति की रिपोर्ट (यौन उत्पीड़न कानून में बदलाव चाहता था)

Justice Verma Committee Report (wanted to change the law for sexual harassment)
  • भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने “#MeToo” अभियान के विस्तार को देखते हुए मामले की गंभीरता से जांच के लिए हाल ही में कानूनविदों की समिति गठित करने का फैसला लिया है।
  • वर्मा समिति की प्रासंगिकता
  • #MeToo कैंपेन के परिणामस्वरूप गठित न्यायाधीशों का पैनल कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न मामले की रोकथाम के लिए कानूनी एवं संस्थागत ढांचे में बदलाव पर केंद्रित है, इस विषय पर वर्मा समिति ने पहले ही कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे।
  • वर्ष 2013 में न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति ने लैंगिक कानूनों पर सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) विधेयक में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए आंतरिक शिकायत समिति (ICC : Internal Complaints Committee) की बजाय ‘रोजगार ट्रिब्यूनल’ की स्थापना की सिफारिश की थी।
  • MeToo कैंपेन
  • इसकी शुरुआत वर्ष 2006 में हुई थी। अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट तराना बर्क ने यौन शोषण की शिकार महिलाओं को आवाज देने के लिए यह कैंपेन शुरू किया था।
  • अक्टूबर, 2017 में ‘#MeToo’ एक आंदोलन का रूप धारण कर लिया, जब अमेरिकी अभिनेत्री ‘एलिसा मिलानो’ ने ट्वीट के माध्यम से यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को इस कैंपेन से जुड़ने के लिए आमंत्रित किया।
  • न्यायमूर्ति वर्मा समिति
  • 16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप के बाद भारत सरकार ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा के नेतृत्व में इस समिति का 23 दिसंबर, 2012 को गठन किया।
  • 23 जनवरी, 2013 को मात्र 29 दिनों में समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी।
  • न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा, न्यायमूर्ति लीला सेठ और वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम, इस समिति में शामिल थे।
  • महत्वपूर्ण बिंदु
  • इस समिति ने यौन उत्पीड़न विधेयक को ‘असंतोषजनक’ बताया था साथ ही इस विधेयक को विशाखा दिशा-निर्देश की भावना के प्रतिकूल बताया।
  • ध्यातव्य है विशाखा दिशा-निर्देश, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 1997 में तैयार किया गया था।
  • समिति की रिपोर्ट के अनुसार, आंतरिक शिकायत समिति अनुत्पादक होगी, क्योंकि इसके माध्यम से महिलाओं को शिकायत दर्ज कराने से हतोत्साहित किया जा सकता है।
  • समिति की रिपोर्ट के अनुसार, यौन उत्पीड़न की परिभाषा का दायरा बढ़ाना चाहिए तथा किसी भी अवांछित व्यवहार को शिकायतकर्ता की व्यक्तिपरक धारणा से देखा जाना चाहिए।
  • रिपोर्ट में महिलाओं के लिए विशेष
  • समिति ने झूठी शिकायतों के लिए महिलाओं को दंडित करने का विरोध किया और इसे ‘कानून का उद्देश्य’ खत्म करने से प्रेरित एक अपमानजनक प्रावधान कहा।
  • शिकायत दर्ज करने के लिए तीन माह की समय-सीमा समाप्त की जानी चाहिए।
  • शिकायतकर्ता की सहमति के बिना शिकायत को स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए।
  • नियोक्ता की जिम्मेदारी
  • नियोक्ता शिकायतकर्ता को मुआवजों का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा।
  • यदि नियोक्ता यौन उत्पीड़न को प्रोत्साहन देता है, ऐसे माहौल की अनुमति देता है, जहां यौन व्यवहार व्यापक एवं व्यवस्थित हो जाता है, जहां नियोक्ता ट्रिब्यूनल को शिकायत अग्रेषित करने में विफल रहता है, तो इसके लिए नियोक्ता को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

लेखक-अमर सिंह