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छत्तीसगढ़ : लेमरू हाथी संरक्षित क्षेत्र

Chhattisgarh: Lemru Elephant Protected Area
  • वर्तमान परिदृश्य
  • अगस्त, 2019 में छत्तीसगढ़ सरकार ने मंत्रिमंडल की बैठक में पूर्व घोषित लेमरू हाथी संरक्षित क्षेत्र (रिजर्व) की स्थापना के प्रस्ताव को पास कर दिया। सरकार के इस कदम से एक लंबे समय से प्रतीक्षित परियोजना पूर्ण हो सकेगी और हाथियों के आतंक से ग्रसित क्षेत्रों की आबादी को बड़ी राहत मिलेगी। लेमरू हाथी संरक्षित क्षेत्र में हाथियों को स्थानांतरित किया जाएगा, जिससे छत्तीसगढ़ में हाथियों का आतंक कम होगा। यह हाथियों की सुरक्षा और संवर्धन हेतु उसका एक प्राकृतिक निवास भी होगा।
  • पृष्ठभूमि
  • छत्तीसगढ़ में हाथियों के बहुलता वाले क्षेत्र में पिछले पांच वर्षों से हाथियों और मानव के संघर्षों में दर्जनों मानव और लगभग एक दर्जन हाथियों की भी मृत्यु हुई है। इस दौरान जन-हानि, कृषि में नुकसान, क्षतिग्रस्त मकानों आदि की क्षतिपूर्ति के रूप में राज्य सरकार ने 75 करोड़ रुपये का अनुदान दिया। इन्हीं संवेदनशील आंकड़ों के दृष्टिगत ‘लेमरू हाथी रिजर्व’ की स्थापना हेतु एक ‘स्पेशल हाई पॉवर टेक्निकल कमेटी’ का भी गठन किया गया है, जिसके द्वारा प्रदत्त सूचनाएं और सुझाव इस परियोजना के लिए निर्माण का आधार साबित होंगी। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही 5 अक्टूबर, 2007 को वंफ्रेद्र सरकार ने 1995.48 वर्ग किमी. वन्य क्षेत्र में लेमरू हाथी रिजर्व के निर्माण की अनुमति दी थी।
  • कार्ययोजना
  • छत्तीसगढ़ के हाथी प्रभावित क्षेत्रों (9 जिलों) को चिह्नित कर लिया गया है और यहां से 226 उत्पाती हाथियों को लेमरू एलीफैंट रिजर्व में भेजा जाएगा। इसके लिए इन हाथियों को 14 समूहों में बांटा जाएगा, जिन्हें अस्थायी फेंसिंग के जरिए एलीफैंट रिजर्व (हाथी संरक्षित क्षेत्र) तक पहुंचाया जाएगा। ध्यातव्य है कि इस क्षेत्र से वर्ष पर्यंत प्रवाहित होने वाली छः नदियां गुजरती हैं, जिससे हाथियों के समूह को पानी की तलाश में मानव बस्ती की ओर नहीं जाना होगा। साथ ही घने वन उनके भोजन की आवश्यकता को भी पूर्ण करेंगे। हाथी संरक्षित क्षेत्र (लेमरू) में बहुत कम आबादी वाले 80 गांव हैं और इन 80 गांवों की जनसंख्या 20 हजार के लगभग है। इस क्षेत्र का जो निवासी एलीफैंट रिजर्व को छोड़कर जाना चाहेगा, उन्हें नियमानुसार व्यवस्थापन की सुविधा दी जाएगी और जो लोग इस क्षेत्र में ही रहना चाहेंगे, उन्हें वन विभाग की ओर से ऐसे मकान बनाकर दिए जाएंगे, जो हाथियों के खतरे से बचा सकें।
  • कोयला क्षेत्र पर प्रभाव
  • प्रस्तावित हाथी संरक्षित क्षेत्र से कोयला खनन पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। प्रस्तावित संरक्षित क्षेत्र यदि पुरानी योजना के ही अनुरूप रहता है, तो इससे वार्षिक 4 करोड़ टन कोयला उत्पादन प्रभावित होगा। ये कोयला खदानें राज्य के रायगढ़ से लेकर कोरबा और सरगुजा जिलों तक फैली हैं।