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चांग’ ई-4 मिशन

Chang 'E-4 Mission

   पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह ‘चंद्रमा’ वैज्ञानिकों के मध्य उत्सुकता का विषय रहा है। चंद्रमा संबंधी जिज्ञासाओं को शांत करने के उद्देश्य से सर्वप्रथम 20 जुलाई, 1969 को नील आर्मस्ट्रांग (नासा) ने चंद्रमा पर कदम रखे। परंतु अब तक हम चंद्रमा के संबंध में संपूर्ण जानकारी प्राप्त नहीं कर पाए हैं। इसी संबंध में चंद्रमा का एक अनसुलझा रहस्य है, जिसे चंद्रमा का ‘डार्क साइड’ (Dark Side) या ‘न दिखने वाला हिस्सा’ (Far Side) कहा जाता है। ध्यातव्य है कि ‘टाइडल लॉकिंग’ (Tidal Locking) प्रभाव के कारण चंद्रमा की अपने अक्ष पर घूर्णन गति (Rotation) पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमण गति (Revolution) के समान है, जिससे पृथ्वी से चंद्रमा का केवल एक हिस्सा ही दिखलाई पड़ता है। अतः इस कारण चंद्रमा के न दिखाई देने वाले दूसरे हिस्से को ‘डार्क साइड’ की संज्ञा दी गई है। यहां ‘डार्क’ का अर्थ अंधेरा या रोशनी की कमी नहीं है। वस्तुतः चंद्रमा के सामने एवं पिछले हिस्से में दिन और रात दोनों होते हैं। पृथ्वी से चंद्रमा के इसी ‘न दिखाई देने वाले हिस्से’ के संबंध में अधिक जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से 8 दिसंबर, 2018 को दक्षिण-पश्चिम चीन के सिचुआन प्रांत में स्थित शिचांग (Xichang) उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र से लांग मार्च-3 बी रॉकेट के माध्यम से चांग’ ई-4 (Chang’ e-4) लूनर प्रोब का प्रक्षेपण किया गया था।

  • वर्तमान संदर्भ
  • 3 जनवरी, 2019 को ‘चांग’ ई-4’ लूनर प्रोब पृथ्वी से चंद्रमा के न दिखाई देने वाले हिस्से पर दक्षिणी ध्रुव-ऐटकेन बेसिन के वॉन कारमन (Von Karman) äेटर पर उतरा।
  • चांग‘ई-4
  • चांग’ई-4 लूनर प्रोब में एक लैंडर एवं एक रोवर शामिल है।
  • ‘चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन’ ने रोवर को ‘यू तू-2’ (Yu Tu-2) या ‘जेड रैबिट-2’ (Jade Rabbit-2) नाम दिया है।
  • चीन के लोक साहित्य में चांग’ ई (Chang’e) को चंद्रमा देवी (Moon goddess) के रूप में एवं ‘यू तू’ को देवी का सफेद पालतू खरगोश माना जाता है।
  • उपकरण एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग
  • चांग‘ई-4 मिशन अपने साथ नीदरलैंड्स, जर्मनी, स्वीडन तथा सऊदी अरब द्वारा विकसित चार पेलोड ले गया है।
  • लैंडर से संबद्ध जर्मनी द्वारा विकसित ‘न्यूट्रॉन रेडिएशन डिटेक्टर’ तथा रोवर पर सवार स्वीडन द्वारा विकसित ‘न्यूट्रल एटम डिटेक्टर’  को परीक्षण कार्यों हेतु भेजा गया है।
  • गौरतलब है कि लैंडर में दो कैमरे लगे हैं- एक जर्मन निर्मित विकिरण प्रयोग हेतु जिसे एलएनडी (LND) कहा गया है तथा एक स्पेक्ट्रोमीटर जो कम आवृत्ति के रेडियो खगोल विज्ञान प्रेक्षणों का  संचालन करेगा।
  • अन्य उपकरणों या प्रयोगों में शामिल हैं- एक पैनोरेमिक (Panoramic) कैमरा, चंद्र सतह के नीचे जांच करने के लिए एक रडार, खनिजों की पहचान करने हेतु एक इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर।
  • चीन एवं रूस के वैज्ञानिकों की सहायता से निर्मित ‘रेडियोआइसोटोप ताप स्रोत’ चंद्र रात्रि (Lunar Night) के दौरान प्रोब को सहयोग करेगा। एक चंद्र रात्रि पृथ्वी के 14 दिनों के बराबर होती है तथा इस दौरान तापमान -180o सेल्सियस तक पहुंच जाता है।
  • इस मिशन के नियंत्रण एवं निगरानी हेतु चीन ने अर्जेंटीना में ‘ग्राउंड स्टेशन’ निर्मित किया है।
  • नासा के ‘लूनर रिकॉनेंसेंस आर्बिटर’ (Lunar Reconnaissance Orbiter) के वैज्ञानिकों ने भी चांग’ ई-4 प्रोब की लैंडिंग हेतु अध्ययन में चीन के वैज्ञानिकों को सहयोग प्रदान किया।
  • विशेषताएं
  • इस मिशन में लैंडर के साथ एक जैविक प्रयोग को संचालित करने के लिए एक कनस्तर भी चांद पर भेजा गया है।
  • इस कनस्तर में कपास, सफेद सरसों, आलू, अरेबिडोप्सिस के बीजों के साथ फ्रूट फ्लाई के अंडे तथा कुछ खमीर भी भेजा गया था।
  • इस मिशन द्वारा भेजी गई तस्वीरों से स्पष्ट होता है कि चांद पर केवल कपास के बीजों में ही अंकुरण हुआ, जबकि अन्य किसी बीज में अंकुरण नहीं हुआ।
  • यह प्रथम अवसर है, जब चंद्रमा पर कोई जैविक पदार्थ विकसित हुआ है।
  • अब तक चंद्रमा पर पृथ्वी से दिखाई देने वाले हिस्से पर ही मिशन संचालित होते रहे हैं। ऐसा पहली बार है जब कोई अंतरिक्ष यान चंद्रमा के सुदूर हिस्से पर उतरा है, जो अब तक अछूता रहा है।
  • इसे अंतरिक्ष की खोज में एक मील के पत्थर के रूप में देखा जा रहा है।
  • पूर्व में विभिन्न अंतरिक्षयानों ने चांद के अनदेखे हिस्से की तस्वीरें लेने में तो सफलता प्राप्त की थी, लेकिन कोई लैंडर अभी तक इस हिस्से पर उतर नहीं सका था।
  • भविष्य के कार्यक्रम
  • चीन चंद्र अन्वेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। चंद्र मिशन के अगले चरण के रूप में चीन ‘चांग’ई-5 प्रोब’ का प्रक्षेपण करना चाहता है, जिसका उद्देश्य चंद्रमा से 2 किग्रा. नमूना एकत्र कर पृथ्वी पर वापस लाना है।
  • इसके अतिरिक्त चीन वर्ष 2020 तक मंगल ग्रह हेतु एक मिशन प्रक्षेपित करने की योजना बना रहा है, जिसका उद्देश्य मंगल की परिक्रमा करना एवं उसकी सतह पर लैंड करना है।

सं. ललिन्द्र कुमार