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कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का निर्णय

Decision of international court in Kulbhushan Jadhav case
  • 17 जुलाई, 2019 को भारतीय नागरिक कुलभूषण सुधीर जाधव के मामले में नीदरलैंड्स की द हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाते हुए जाधव की फांसी पर रोक जारी रखा है।
  • क्या है मामला?
  • कुलभूषण जाधव मामले में पाकिस्तान सरकार द्वारा दायर आरोप- पत्र में कहा गया है कि 3 मार्च, 2016 को पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिम प्रांत बलूचिस्तान में पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव को जासूसी करते हुए पकड़ा था।
  • 10 अप्रैल, 2017 को पाकिस्तान की एक सैन्य अदालत ने जाधव को पाकिस्तान में जासूसी एवं आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई थी।
  • इस संबंध में भारत, पाकिस्तान के इस दावे को खारिज करता रहा है कि जाधव को 3 मार्च, 2016 को बलूचिस्तान प्रांत से गिरफ्तार किया गया था।
  • भारत सरकार के अनुसार, कुलभूषण भारतीय नागरिक एवं पूर्व नौसेना अधिकारी तो हैं, परंतु किसी भी प्रकार की जासूसी गतिविधियों में शामिल नहीं हैं।
  • भारत सरकार का दावा है कि कुलभूषण ईरान में रहते हुए कानूनी रूप से अपना निजी व्यापार चला रहे थे। जाधव को तालिबान द्वारा ईरान से अगवा कर पाकिस्तान को सौंप दिया गया तथा आई.एस.आई. द्वारा इनके जाली दस्तावेज बनाए गए हैं।
  • भारत ने जाधव को फांसी दिए जाने के निर्णय का विरोध करते हुए इस मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice-ICJ) ले गया।
  • भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में यह दलील दी थी कि जाधव को ‘कॉन्सुलर एक्सेस’ यानी भारतीय दूतावास के अधिकारियों से बात करने का अधिकार न देकर पाकिस्तान ने ‘वियना कन्वेंशन ऑन कॉन्सुलर रिलेशंस (Vienna Convention on Consular Relations), 1963’ का उल्लंघन किया है।
  • वहीं पाकिस्तान का कहना था कि जासूसी के मामले में दोषी व्यक्ति को ‘कॉन्सुलर एक्सेस’ नहीं दिया जा सकता।
  • जाधव केस में निर्णय सुनाते हुए ICJ के 16 न्यायाधीशों की पीठ ने 15-1 से भारत के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए जाधव की फांसी पर रोक जारी रखा है एवं इस विषय पर पाकिस्तान को पुनर्विचार तथा पुनर्समीक्षा करने को कहा है।
  • केवल तदर्थ (Adhoc) न्यायाधीश तस्सदुक हुसैन जिलानी (पाकिस्तान) ने विरोध में निर्णय दिया है।
  • ध्यातव्य है कि जाधव केस की सुनवाई पीठ में एक भी पाकिस्तान के न्यायाधीश नहीं होने के कारण पाकिस्तान ने ICJ के अधिनियम के अनुच्छेद 31, पैरा 2 के तहत एक तदर्थ न्यायाधीश को केस की सुनवाई पीठ में शामिल होने के अधिकार का प्रयोग किया था।
  • पाकिस्तान ने इस मामले पर ICJ के क्षेत्राधिकार पर प्रश्न उठाए थे। ICJ ने इस आपत्ति को रद्द करते हुए अपने निर्णय में कहा कि ICJ वर्ष 1963 के ‘वियना कन्वेंशन ऑफ कॉन्सुलर रिलेशंस के अनुसार, दो देशों के बीच उत्पन्न विवादों का अनिवार्य निपटान कर सकती हैं।
  • ICJ ने अपने निर्णय में भारत के इस तर्क को सही माना है कि पाकिस्तान की सैन्य अदालत का जाधव के विरुद्ध दिया गया निर्णय ‘वियना कन्वेंशन ऑफ कॉन्सुलर रिलेशंस’ का उल्लंघन था।
  • ICJ ने यह भी माना है कि कुलभूषण जाधव को इतने दिनों तक कानूनी सहायता नहीं देकर पाकिस्तान ने ‘वियना कन्वेंशन ऑफ कॉन्सुलर रिलेशंस’ के अनुच्छेद 36 का उल्लंघन किया है।
  • ICJ ने अपने निर्णय में कहा कि पाकिस्तान ने जाधव तक ‘कॉन्सुलर ऐक्सेस’ से इंकार करके और उनके अधिकारों की जानकारी नहीं देकर वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 36 का उल्लंघन किया है।
  • हालांकि ICJ ने भारत की यह अपील कि पाकिस्तान अपनी सैन्य अदालत के फैसले को रद्द करने हेतु कदम उठाए, पर पाकिस्तान को ऐसा कोई आदेश नहीं दिया।
  • ICJ ने जाधव को रिहा करने और उसे सुरक्षित रूप से भारत वापस भेजे जाने संबंधी भारत के अनुरोध को नहीं माना।
  • ध्यातव्य है कि जाधव केस में भारत की ओर से हरीश साल्वे ने जाधव की निःशुल्क पैरवी की है।
  • ICJ के निर्णय को भारत एवं पाकिस्तान दोनों देशों में अपनी-अपनी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। परंतु यहां प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि निर्णय तो मिल गया परंतु जाधव मामले में अब आगे क्या हो सकता है।
  • ICJ द्वारा जाधव की फांसी वाले निर्णय की समीक्षा का तात्पर्य एक ऐसा मंच हो सकता है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाए या फिर पाकिस्तान के कानून के विशेषज्ञ सजा की समीक्षा करें।
  • पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के अनुसार, जाधव से पाकिस्तानी कानून के अनुसार व्यवहार किया जाएगा।
  • इसका तात्पर्य है कि कुलभूषण जाधव का मामला अब सिविल कोर्ट में चलेगा जहां उनको कानूनी सहायता प्राप्त हो सके एवं वे अपना पक्ष सही तरीके से रख सकें।
  • स्वतंत्र और संप्रभु देशों के मध्य आपसी राजनयिक संबंधों से संबंधित एक अभिसमय ‘वियना कन्वेंशन ऑन डिपलोमेटिक रिलेशंस’ (Vienna Convention on Diplomatic Relations) 18 अप्रैल, 1961 को हुआ था एवं यह 24 अप्रैल, 1964 से लागू हुआ।
  • इसके आधार पर ही राजनयिकों की सुरक्षा हेतु अंतरराष्ट्रीय कानूनों का प्रावधान किया गया है।
  • इस संधि के प्रमुख प्रावधानों के अंतर्गत कोई भी देश दूसरे देश के राजनयिकों को किसी भी कानूनी मामले में गिरफ्तार नहीं कर सकता है। साथ ही राजनयिक के ऊपर मेजबान देश में किसी तरह का कस्टम टैक्स नहीं लगेगा।
  • इस अभिसमय के दो वर्ष पश्चात 24 अप्रैल, 1963 को ‘वियना कन्वेंशन ऑन कॉन्सुलर रिलेशंस’ बना एवं यह 19 मार्च, 1967 को लागू हुआ।
  • इस अभिसमय (Convention) में कुल 79 अनुच्छेद हैं। इस अभिसमय के अनुच्छेद 31 के अंतर्गत मेजबान देश दूसरे देश के दूतावास में प्रवेश करने से पूर्व दूतावास के प्रमुख या संबंधित अधिकारी से अनुमति प्राप्त करेगा।
  • अभिसमय के अनुच्छेद 36 के अंतर्गत यदि किसी विदेशी नागरिक को कोई देश अपनी राजनीतिक सीमा के भीतर गिरफ्तार करता है, तो संबंधित देश के दूतावास को तुरंत इसकी सूचना देनी पड़ेगी।
  • गिरफ्तार किए गए विदेशी नागरिक के आग्रह पर पुलिस को संबंधित दूतावास या राजनयिक को इसकी सूचना भी देनी पड़ेगी जिसमें पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति के विषय में, गिरफ्तारी का कारण एवं स्थान आदि बताना होगा। अर्थात गिरफ्तार विदेशी नागरिक को राजनयिक पहुंच देनी होगी।
  • भारत ने इसी नियम का हवाला देते हुए जाधव का मामला उठाया था।
  • यद्यपि कुलभूषण जाधव केस का अंतिम रूप से समाधान तो नहीं हो पाया है, परंतु इतना तो अवश्य है कि ICJ का यह निर्णय केवल भारत और पाकिस्तान से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि यह निर्णय संपूर्ण विश्व के देशों एवं मानवाधिकारों के लिए भी है। भविष्य में इस निर्णय के आधार पर किसी एक देश के नागरिकों को किसी और देश में इसी प्रकार का व्यवहार किए जाने पर ICJ में चुनौती दी जा सकेगी एवं इस निर्णय का संदर्भ दिया जा सकेगा।