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इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान

India Cooling Action Plan

कूलिंग या शीतलन किसी देश की आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य एवं उत्पादकता से भी प्रत्यक्षः संबंधित है। कूलिंग एवं सतत विकास लक्ष्यों जैसे अच्छी स्वास्थ्य एवं देखभाल (SDG 3), सभ्य कार्य एवं आर्थिक संवृद्धि (SDG 8), सतत शहर एवं समुदाय (SDG 11) एवं जलवायु क्रिया (SDG 13) के मध्य सहलग्नता को अच्छी तरह मान्यता प्राप्त है। कूलिंग की आवश्यकता से भारत भी अछूता नहीं है। भारत की शीतलन (कूलिंग) आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा रेफ्रीजरेशन और एयर कंडीशनिंग (RAC) प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके पूरा किया जाता है, जो सिंथेटिक रेफ्रिजरेटर या प्राकृतिक रेफ्रिजरेंट के उपयोग पर आधारित होते हैं। अधिकांश सिंथेटिक रेफ्रिजरेंट में या ओजोन रिक्तीकरण संभाव्य या ग्लोबल वार्मिंग संभाष्य पदार्थों का उपयोग होता है। चूंकि भारत मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अंतर्गत ओजन परत को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों के उपयोग को रोकने हेतु एक पक्षकार है, अतः इस दृष्टि से भारत ने ‘इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान’ का शुभारंभ करने की दिशा में एक सक्रिय पहल आरंभ की है।

  • 8 मार्च, 2019 को केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने दिल्ली में ‘इंडिया एक्शन कूलिंग प्लान’ का शुभारंभ किया।
  • इसके साथ ही भारत एक व्यापक शीतलन (कूलिंग) कार्ययोजना विकसित करने वाला विश्व के पहले देशों में से एक बन गया है, जिसके पास विभिन्न क्षेत्रों में कूलिंग आवश्यकताओं से निपटने एवं कूलिंग मांग में कमी लाने वाली क्रियाओं हेतु एक दीर्घकालिक दृष्टि है।
  • इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) का व्यापक लक्ष्य समाज के लिए पर्यावरणीय एवं सामाजिक-आर्थिक लाभ प्राप्त करते हुए सभी के लिए स्थायी शीतलन उपलब्ध कराना तथा गर्मी से आराम पहुंचाना है। इसके अतिरिक्त ICAP के निम्नलिखित लक्ष्य हैं-
  • तकनीकी समाधानों के विकास का समर्थन करने एवं नवाचार चुनौतियों को प्रोत्साहित करने हेतु राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी कार्यक्रम के अंतर्गत अनुसंधान के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में कूलिंग एवं संबंधित क्षेत्रों को पहचान दिलाना।
  • वर्ष 2037-38 तक सभी क्षेत्रों (सेक्टरों) में कूलिंग की मांग को 20 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक घटाना।
  • वर्ष 2037-38 तक प्रशीतक (Refrigerant) की मांग को 25 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक घटाना।
  • वर्ष 2037-38 तक शीतलन (Cooling) ऊर्जा की मांग को 25 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक घटाना।
  • स्किल इंडिया मिशन के साथ तालमेल कर वर्ष 2022-23 तक इस क्षेत्र में 1 लाख सर्विसिंग सेक्टर तकनीशियनों का प्रशिक्षण और प्रमाणन करना।
  • आगामी 20 वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों में शीतलन आवश्यकताओं तथा संबंधित प्रशीतक मांग एवं ऊर्जा उपयोग का आकलन करना।
  • प्रशीतक आधारित प्रौद्योगिकियों और वैकल्पिक तकनीकों जैसे शीतलीकरण की आवश्यकता को पूरा करने हेतु उपलब्ध तकनीकों का खाका तैयार करना।
  • सभी के लिए स्थायी शीतलन एवं गर्मी से आराम प्रदान करने हेतु प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप का सुझाव देना।
  • ‘रेफ्रीजरेशन एवं एयर कंडीशनर’ (RAC) सेवा तकनीशियन के कौशल पर ध्यान देना।
  • वैकल्पिक प्रौद्योगिकियों के स्वदेशी विकास हेतु अनुसंधान एवं विकास नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करना।
  • शीतलन मांग से निपटने हेतु एक सह-क्रियात्मक दृष्टिकोण
  • विभिन्न क्षेत्रों में कई हितधारकों की भागीदारी
  • एक संतुलित परिप्रेक्ष्य यह दर्शाता है कि भारत की शीतलन संवृद्धि (Growth) उसके विकासात्मक आवश्यकताओं के साथ एक सीध में है।
  • शीतलन की संवृद्धि के पैमाने एवं प्रभाव की पहचान करता है।
  • शीतलन के विभिन्न विषयगत क्षेत्रों पर डोमेन विशेषज्ञों के सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध राष्ट्रव्यापी आंकड़ों को एकत्र करता है।
  • ICAP के विकास हेतु सात अलग-अलग विषयगत क्षेत्रों की पहचान की गई है। ये क्षेत्र इस प्रकार हैं- भवनों में ‘स्पेस कूलिंग’, वातानुकूलन प्रौद्योगिकी, ‘कोल्ड-चेन एवं रेफ्रीजरेशन’, परिवहन वातानुकूलन, वातानुकूलन एवं प्रशीतन सर्विसिंग सेक्टर, प्रशीतक मांग एवं स्वदेशी उत्पादन, अनुसंधान एवं विकास तथा उत्पादन क्षेत्र-वैकल्पिक प्रशीतक।
  • ICAP से पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में लाभ के अतिरिक्त निम्नलिखित लाभ भी मिलेंगे।
  • सभी को गर्मी से राहत : हाउसिंग बोर्ड के ईडब्ल्यूएस (EWS) तथा एलआईजी (LIG) घरों में कूलिंग का प्रावधान है।
  • सतत कूलिंग : कूलिंग से संबंधित हरित गृह गैसों का कम उत्सर्जन होगा।
  • किसानों की आय दोगुनी करना : बेहतर कोल्ड चेन की सुविधा, किसानों को अपने उत्पादों का अच्छा मूल्य प्राप्त होगा तथा कृषि उत्पाद बर्बाद भी नहीं होंगे।
  • बेहतर जीवन और पर्यावरण सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु दक्ष कामगार उपलब्ध होंगे।
  • एयर कंडीशनर और उससे जुड़े कूलिंग सामानों हेतु घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ने से मेक इन इंडिया कार्यक्रम को बढ़ावा मिलेगा।
  • कूलिंग तकनीक हेतु अनुसंधान और विकास का उचित प्रबंध होगा, जिससे कूलिंग क्षेत्र में नई तकनीक को बढ़ावा मिलेगा।
  • वर्तमान समय में कूलिंग की आवश्यकता प्रत्येक क्षेत्र में है तथा यह आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण अंग है। इस कारण, सतत विकास के लक्ष्यों से कूलिंग के प्रत्यक्ष संबंध को स्वीकारा जा चुका है। ऐसी स्थिति में ‘आईसीएपी’ का शुभारंभ एक सराहनीय कदम है।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल : मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संबंधी समझौता है, जिसके अंतर्गत सार्वभौमिक अनुसमर्थन के साथ ओजोन रिक्तीकरण (Depletion) पदार्थों के उपयोग को समाप्त करते हुए पृथ्वी  के ओजोन परत की रक्षा की जाती है। ओजोन परत के रिक्तीकरण के कारण पृथ्वी तक पराबैंगनी विकिरण में वृद्धि होती है, जिसके परिणामस्वरूप त्वचा कैंसर, नेत्र विकार, प्रतिरक्षा प्रणाली पर दुष्प्रभाव के साथ-साथ जलसंभरों (Watersheds) कृषि भूमि एवं वनों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यह समझौता वर्ष 1987 में हुआ था।
  • ओजोन परत की क्षीणता के लिए उत्तरदायी गैसें हैं- क्लोरोफ्लोरोकार्बन, हैलोजन्स, नाइट्रस ऑक्साइड, ट्राइक्लोरोएथिलीन, हैलोन-1211, 1301 इत्यादि।
  • क्लोरोफ्लोरोकार्बन, क्लोरीन, फ्लोरीन एवं ऑक्सीजन से बना मानव निर्मित गैसीय व द्रवीय पदार्थ है, जो कि रेफ्रिजरेटर तथा वातानुकूलित यंत्रों में शीतलन हेतु प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग रेफ्रिजरेटर के साथ-साथ प्लास्टिक फोम, एयरकंडीशनर्स, विमान प्रणोदक आदि में किया जाता है।
  • रेफ्रिजरेटरों में प्रशीतक के रूप में भरी जाने वाली गैसों का विपणन सामान्यतः ‘मेफोन’ ब्रांड नाम के तहत किया जाता है। ये सामान्यतः हैलोनिक हाइड्रोकार्बन (Dichloro diFluoro Methane, HCFC आदि) होते हैं। हालांकि अमोनिया भी प्रशीतक के रूप में बड़े संयंत्रों में प्रयुक्त होती है।

सं. ललिन्द्र कुमार