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आरबीआई सर्कुलर पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

Supreme Court ruling on RBI circular
  • पृष्ठभूमि
  • 12 फरवरी, 2018 को आरबीआई ने एक सर्कुलर द्वारा बैंकों के लिए निर्देश जारी किया था।
  • इस सर्कुलर को चुनौती देते हुए विभिन्न कंपनियों ने अलग-अलग अदालतों में याचिकाएं दाखिल की।
  • अगस्त, 2018 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि बिजली कंपनियों को कोई राहत नहीं दी जा सकती क्योंकि रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 7 का प्रयोग करके सरकार निर्देश जारी कर सकती है।
  • अगस्त, 2018 में ही बिजली कंपनियों और औद्योगिक समूह ने इस सर्कुलर की संवैधानिक वैधता पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय की शरण ली।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 11 सितंबर, 2018 को सर्कुलर में विहित प्रक्रिया पर रोक लगाकर देश की विभिन्न अदालतों में दायर की गई सभी याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित करवा लिया।
  • वर्तमान परिप्रेक्ष्य
  • 2 अप्रैल, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के दो सदस्यीय पीठ न्यायाधीश आर.एफ. नरीमन और विनीत सरन ने उपरोक्त सर्कुलर को अल्ट्रा वायरस और नियम विरुद्ध करार देते हुए रद्द कर दिया।
  • साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह सर्कुलर जारी कर आरबीआई ने अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया है।
  • क्या था सर्कुलर?
  • 2000 करोड़ रुपये से अधिक के बकाया ऋण खातों द्वारा किस्त या ब्याज के पुनर्भुगतान में एक दिन की भी देर हो जाती है, तो उसे फंसे हुए कर्ज की श्रेणी में डालकर ऋण समाधान प्रक्रिया शुरू की जाए।
  • समाधान के लिए 180 दिन की समय-सीमा निर्धारित की गई थी।
  • इस दौरान कंपनियों द्वारा ऋण समाधान नहीं कर पाने की स्थिति में ऋण-शोधन के लिए दिवालिया एवं ऋण-शोधन अक्षमता संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code- IBC) के अंतर्गत लाया जाए।
  • ऐसे मामलों को राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के पास अनिवार्य रूप से भेजा जाए।
  • यह प्रक्रिया 180 दिन की समय-सीमा खत्म होने के बाद 15 दिनों के भीतर शुरू की जाए।
  • इसी के साथ ऋण-शोधन तंत्र जैसे कॉर्पोरेट ऋण पुनर्गठन (सीडीआर), रणनीतिक ऋण पुनर्गठन और संकटग्रस्त परिसंपत्तियों का पुनर्गठन को खत्म कर दिया गया।
  • न्यायालय ने सर्कुलर क्यों रद्द किया
  • वर्ष 2017 में अध्यादेश द्वारा बैंकिंग नियमन अधिनियम में संशोधन किया गया और केंद्रीय बैंक को अधिकार दिया गया।
  • अधिनियम की धारा 35 ए ए के तहत विशेष डिफाल्ट के मामलों में निर्देश दिया जा सकता है लेकिन सर्कुलर द्वारा केंद्रीय बैंक ने सभी मामलों को एक साथ रखा।
  • अतः न्यायालय ने पाया कि सर्कुलर से वर्ष 2017 में संशोधित बैंकिंग अधिनियम की धारा 35 ए ए का उल्लंघन हुआ था।
  • उच्चत्तम न्यायालय के आदेश का प्रभाव
  • बैंक ऐसे मामलों को दिवालिया एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के बाहर भी निपटा सकेंगे।
  • बिजली, आयरन, स्टील, इन्फ्रास्ट्रक्चर और टेक्सटाइल्स कंपनियों को बड़ी राहत मिली क्योंकि इन कंपनियों का कर्ज और एनपीए अधिक है।
  • दिवालिया एवं ऋण-शोधन अक्षमता संहिता
  • आईबीसी कानून वर्ष 2016 में संसद ने पारित किया था।
  • वर्ष 2017 व 2018 में इसमें संशोधन किया गया, जिसके बाद ये कानून बेहद सख्त हो गया है।
  • इसके तहत कर्ज लेने वाली कंपनी कर्ज नहीं चुका पाती है, तो इसके निदेशक की निजी संपत्तियों को कुर्क कर लिया जाए और कंपनी के संचालन का अधिकार उनसे ले लिया जाए।
  • किसी कंपनी पर एक लाख रुपये से अधिक कर्ज होने तथा इसको 90 दिनों तक न चुका पाने की स्थिति में कर्जदाता बैंक न्यायालय जा सकता है।
  • IBC न्यायालय को यह अधिकार है कि कंपनी का प्रबंधन किसी और को दे दे।
  • कंपनी की वित्तीय हालत न सुधरने पर नौ महीने के बाद कंपनी की संपत्तियों को बेचा जा सकता है।
  • अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
  • सरकार ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील प्राधिकरण का गठन जून, 2016 में किया।
  • इनका गठन कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत किया गया।
  • उल्लेखनीय है कि कंपनी अधिनियम, 1956 के स्थान पर कंपनी अधिनियम, 2013 प्रतिस्थापित किया गया है।
  • मामले में निर्णय करते हुए उच्चतम न्यायालय ने बैंकिंग नियमन अधिनियम की धारा 35 ए ए और 35 ए बी के तहत आरबीआई को प्रदत्त अधिकारों के बीच अंतर को भी बताया।
  • केंद्रीय बैंक, बैंकों को आईबीसी के तहत कार्य करने का निर्देश तभी दे सकता है, जब ऐसा करने के लिए केंद्र सरकार की सहमति हो तथा यह निर्देश विशेष डिफाल्ट के संबंध में होना चाहिए।
  • केंद्रीय बैंक धारा 35 ए ए में निर्धारित प्रक्रिया के अलावा किसी भी प्रक्रिया का प्रयोग नहीं कर सकता है।

संराहुल त्रिपाठी