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अंतरराज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक, 2019

The Interstate River Water Disputes (Amendment) Bill, 2019
  • पृष्ठभूमि
  • भारत में राज्यों के मध्य नदी जल के बंटवारे से संबंधित विवादों को समाप्त करने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत दो अधिनियम बनाए गए थे।
  • पहला अधिनियम नदी बोर्ड अधिनियम,1956 और दूसरा अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 था।
  • गौरतलब है कि नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 पारित होने के बाद लागू नहीं हो सका और न ही इस प्रकार का कोई बोर्ड बनाया गया।
  • भारत में आजादी के बाद से ही कई राज्यों के मध्य विभिन्न नदियों यथा- रावी, व्यास, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, महानदी, पेरियार, वंशधारा और महादायी आदि को लेकर विवाद की स्थिति रही है।
  • ध्यातव्य है कि अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत अगर कोई राज्य केंद्र के पास किसी नदी से जुड़े जल विवाद की शिकायत लेकर जाता है, तो केंद्र सरकार विवाद सुलझाने हेतु एक न्यायाधिकरण का गठन करती है।
  • न्यायाधिकरणों के गठन और देरी से निर्णय देने की समस्या को दूर करने हेतु वर्ष 2002 में सरकारिया कमीशन ने इस अधिनियम (1956) में आवश्यक बदलाव हेतु अपनी सिफारिश दी।
  • इस संदर्भ में वर्ष 2017 में अंतरराज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक, 2017 लोक सभा में प्रस्तुत किया गया, परंतु यह विधेयक पारित नहीं हो सका।
  • वर्तमान परिदृश्य
  • 25 जुलाई, 2019 को केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा अंतरराज्यीय जल विवाद (संशोधन) विधेयक, 2019 लोक सभा में प्रस्तुत किया गया।
  • इस विधेयक में अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम (Inter State River Water Dispute Act), 1956 में संशोधन का प्रावधान प्रस्तुत किया गया है।
  • इसके तहत अंतरराज्यीय नदी जल विवादों के न्यायिक निर्णयन को सरल और कारगर बनाने के साथ ही मौजूदा संस्थागत ढांचे को मजबूत बनाना है।
  • प्रस्तावित विधेयक में उपबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान
  • इस विधेयक में अनेक अधिकरणों (Tribunals) की जगह एक स्थायी केंद्रीय अधिकरण के गठन का प्रावधान किया गया है।
  • यह अधिकरण/न्यायाधिकरण दो वर्ष के अंदर अपना निर्णय देने के लिए बाध्य होगा और इसका निर्णय स्वतः ही अधिसूचित हो जाएगा।
  • गौरतलब है कि वर्तमान में जल विवाद से संबंधित नौ न्यायाधिकरणों में से चार ने अपना निर्णय देने में 10 वर्ष से लेकर 28 वर्ष तक का समय लिया है।
  • इस स्थायी न्यायाधिकरण की आवश्यकता के अनुसार, देश के अंदर कई शाखाएं (Benches) खोली जाएंगी, जो संबंधित जल विवाद के समाधान के उपरांत स्वतः समाप्त हो जाएंगी।
  • इस न्यायाधिकरण में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष तथा छः अन्य सदस्य (तीन न्यायिक और तीन विशेषज्ञ) होंगे, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नामित किए जाएंगे।
  • प्रस्तावित विधेयक में केंद्र सरकार द्वारा प्रत्येक नदी बेसिन (River Basin) के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक डाटा बैंक और सूचना प्रणाली बनाए जाने का भी उपबंध किया गया है।
  • हालांकि विपक्षी दल इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनके अनुसार ‘जल’ राज्य सूची का विषय है और राज्य सरकारों से इस संबंध में विचार-विमर्श नहीं किया गया।

सं.  धीरेन्द्र त्रिपाठी