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मासिक पत्रिका सितम्बर,2018 पी.डी.एफ. डाउनलोड

September 18th, 2018
magzine september 2018

असम समझौते (1985) के लगभग 33 वर्षों बाद इस समझौते की मूल भावना के अनुरूप असम के लिए राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के अंतिम मसौदे का प्रकाशन 30 जुलाई, 2018 को हो सका है। मसौदे में शामिल नामों के सत्यापन के पश्चात ही अंतिम नागरिकता रजिस्टर सूची का प्रकाशन संभव हो सकेगा। इस अंतिम प्रकाशन से पूर्व ही मसौदे को लेकर धार्मिक आधार पर मतभेद प्रारंभ हो गए हैं। मतभेद इस बात को लेकर है कि कट ऑफ डेट 24 मार्च, 1971 के बाद आए सभी बांग्लादेशी प्रवासियों को असम से बाहर किया जाए या फिर धर्म के आधार पर विभेद करते हुए यहां के बहुसंख्यकों अर्थात मुस्लिम धर्मावलंबियों को ही निष्कासित किया जाए। असम के सभी क्षेत्रीय राजनीतिक दल तो सभी अवैध प्रवासियों के यहां से जाने के पक्षधर हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 पेश कर रखा है जिसके अनुसार अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है। इस अंक के आवरण आलेख में असम के राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और उसकी पेचीदगियों का विश्लेषण किया गया है।

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‘मॉब लिंचिंग’ या भीड़ द्वारा की गई हिंसा पर विमर्श जारी है। प्रायः देखा गया है कि बहसों में इस हिंसा को किसी अन्य हिंसा की परिणिति बताते हुए न्याय संगत बताने की कोशिश की जाती है। ऐसी कोशिशें प्रायः धर्म, जाति एवं क्षेत्र की गोलबंदी के आधार पर होती हैं। अब लाख टके का सवाल यह है कि क्या धार्मिक, जातीय एवं क्षेत्रीय गुटबंदी के आधार पर प्रोत्साहन के परिणामस्वरूप ऐसी घटनाएं और बढ़ती जा रही हैं या फिर कारण कुछ और है? यदि हम कारणों के पीछे के कारण में जाएं, तो हम पाते हैं कि निरंतर बढ़ती भीड़ ही कहीं न कहीं, भीड़-हिंसा का कारण है।




बढ़ती भीड़ में व्यक्ति का अपना स्पेस कहीं खो गया है। अपना स्पेस पाने के लिए वह जाति, धर्म या क्षेत्र के नाम पर अन्यों को बाहर करना चाहता है। बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारों की बढ़ती भीड़ में बड़ी आसानी से किसी नाम पर लोगों को लामबंद किया जा सकता है। आज भीड़ ‘हिंसा’ के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखती है। फिरोजाबाद में एक युवक को पीटने में वहां खड़ी भीड़ शामिल हो गई बिना यह जाने कि उसका दोष है या नहीं, जबकि इलाहाबाद में एक 65 वर्षीय बुजुर्ग को पिटते देख भीड़ तमाशबीन ही रही। सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए बुजुर्ग को बचाने भीड़ आगे नहीं आयी। इस अंक में भीड़-हिंसा के मनोविज्ञान पर सामयिक आलेख प्रस्तुत किया गया है।




पाकिस्तान में इमरान खान के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद राजनीति के जानकारों का कहना है कि वे अचम्भित ही करेंगे। या तो बहुत कुछ  करेंगे या फिर कुछ न करेंगे। इस अंक में पाकिस्तान आम चुनाव, 2018 पर भी सामयिक आलेख प्रस्तुत किया गया है।

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