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भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट, 2018

Annual Report of Reserve Bank of India, 2018
    • वर्तमान परिप्रेक्ष्य
    • भारतीय रिजर्व बैंक ने 29 अगस्त, 2018 को भारत सरकार के लिए वित्त वर्ष 2017-18 की वार्षिक रिपोर्ट जारी की।
    • सांविधिक दायित्व
    • भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 53(2) में यह प्रावधान है कि रिजर्व बैंक अपने वित्तीय वर्ष की समाप्ति के दो माह के भीतर वार्षिक रिपोर्ट भारत सरकार को प्रस्तुत करेगा। रिपोर्ट में अर्थव्यवस्था का आकलन, संभावनाएं, अर्थव्यवस्था की स्थिति की समीक्षा, पूरे वर्ष के दौरान रिजर्व बैंक का काम, अगले वर्ष के लिए रिजर्व बैंक का विजन व एजेंडा सम्मिलित किया जाता है।
    • आकलन, 2017-18
    • विमुद्रीकरण और जीएसटी क्रियान्वयन के फलस्वरूप वर्ष 2017-18 में भारतीय अर्थव्यवस्था के संवृद्धि पथ में कई उतार चढ़ाव आया। वर्ष 2017-18 में सकल पूंजी निर्माण के कारण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इस दौरान जीडीपी संवृद्धि 6.7 प्रतिशत रही, जो पिछले वर्ष की दर से 0.4 प्रतिशत बिंदु कम रही।




    • कृषि एवं संबंधित गतिविधियां तथा विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई, जिसके कारण औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई।
    • सेवा क्षेत्र में दो वर्ष की मंदी का क्रम टूटा और वर्ष 2017-18 के दौरान सेवा क्षेत्र में 7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो वर्ष 2014-15 के दौरान 9.3 प्रतिशत थी।
    • नए मूल्य उपभोक्ता सूचकांक (सीपीआई) शृंखला में औसत वार्षिक मुद्रास्फीति 3.6 प्रतिशत रह गई, जो वर्ष 2012-13 से लेकर अब तक का न्यूनतम स्तर है।
    • फसल के भरपूर उत्पादन के बल पर ग्रामीण मांग तथा ग्रामीण विकास व बुनियादी ढांचे पर सरकार द्वारा जोर देने के कारण निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीएफ) में सुधार हुआ।
    • कृषि में खाद्यान्न व बागवानी में अब तक का सर्वाधिक उत्पादन दर्ज किया गया।
    • संभावनाएं
    • वर्ष 2018-19 के दौरान वैश्विक संवृद्धि दर 3.9 प्रतिशत होने का अनुमान है, जो वर्ष 2017-18 के दौरान 0.2 प्रतिशत रही। भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियां विद्यमान हैं। दक्षिणी-पश्चिमी मानसून द्वारा देश के बड़े भू-भाग पर अच्छी वर्षा के कारण लगातार तीसरे वर्ष कृषि उत्पादन बेहतर रहने का अनुमान है। विनिर्माण और खनन गतिविधियों में वृद्धि के कारण औद्योगिक क्षेत्र में संवृद्धि के लक्षण दिख रहे हैं। सेवा क्षेत्र में भी वृद्धि के पर्याप्त कारक उपस्थित हैं। बुनियादी सुविधा के क्षेत्र में सरकार द्वारा विभिन्न मदों जैसे सड़क, बंदरगाह, सस्ते मकान बनाने के लिए जोर दिया जा रहा है, जिसके कारण इन क्षेत्रों में संवृद्धि का अनुमान है। वर्ष 2018-19 के दौरान वास्तविक जीडीपी 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो वर्ष 2017-18 के दौरान 6.7 प्रतिशत थी। बैंकिंग प्रणाली को सुचारु बनाए रखने के लिए की गई पहलों के वर्ष 2018-19 के दौरान चरम पर पहुंचने का अनुमान है।




    •  इस दौरान कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय मूल्यों में वृद्धि से राजकोषीय स्थिति की सीमाएं बढ़ सकती हैं। केंद्र और राज्यों का सकल राजकोषीय घाटा वर्ष 2017-18 के 6.6 प्रतिशत के संशोधित अनुमान से घटाकर वर्ष 2018-19 में जीडीपी के 5.9 प्रतिशत तक लाने हेतु बजट में प्रावधान किया गया है। वर्ष 2018-19 में प्रतिकूल वैश्विक पारिस्थितियां भारत के बाह्य क्षेत्र को प्रभावित कर सकती हैं।
    • आर्थिक समीक्षा के महत्वपूर्ण तथ्य
    • वर्ष 2017-18 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था 5 तिमाहियों की मंदी से बाहर आई। सेवा क्षेत्र में निर्माण की गति हाल के वर्षों में तीव्रतम हो गई है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के साथ अनके मदों में बढ़ते आयात के कारण चालू घाटा बढ़ रहा है।
    • वास्तविक अर्थव्यवस्था
    • सकल पूंजी निर्माण से सहायता मिलने के कारण वर्ष 2017-18 के दौरान निवेश दर जीडीपी का 34.1 प्रतिशत हो गया, जो पिछले वर्ष 33.2 प्रतिशत था। इस दौरान निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) जीडीपी संवृद्धि का 55 प्रतिशत रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में घटा है। वर्ष 2017-18 के दौरान समग्र मांग जीडीपी 66.6 प्रतिशत रहने के कारण उपभोग का प्रमुख घटक रहा। जबकि इस दौरान समग्र आपूर्ति जिसे जीवीए में मापा जाता है, की वृद्धि दर पिछले वर्ष 7.1 प्रतिशत से 0.6 प्रतिशतता बिंदु कम 6.5 प्रतिशत रही।
    • कृषि
    • वास्तविक जीवीए में कृषि और संबंधित क्रिया-कलापों का योगदान वर्ष 2016-17 में जीडीपी के 13.6 प्रतिशत की तुलना में घटकर 7.9 प्रतिशत रह गया। समग्र रूप से वर्ष 2018 के दौरान चावल, गेहूं, दालों और मोटे अनाज का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ, जबकि सोयाबीन के कम उत्पादन के कारण तिलहन में कमी आई। वर्ष 2018-19 के केंद्रीय बजट में ग्रामीण आय को बढ़ाने और कृषि को बढ़ावा देने के लिए एमएसपी में वृद्धि, ग्रामीण कृषि बाजारों व कृषि उत्पाद बाजार समितियों (एपीएमसी) में कृषि विपणन ढांचे के विकास के साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड की स्थापना व प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का प्रस्ताव किया गया है।
    • रोजगार-पे-रोल डेटा के आधार पर संकलित आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016-17 की तुलना में वर्ष 2017-18 में सृजित रोजगार इस क्षेत्र में बढ़ोत्तरी की ओर संकेत करते हैं।
    • औद्योगिक क्षेत्र
    • वर्ष 2017-18 में जीवीए की समग्र वृद्धि में उद्योग क्षेत्र का भारित योगदान वर्ष 2015-16 के 33.5 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत हो गया। विकास का चक्रीय घटक वर्ष 2017-18 में नकारात्मक हो गया और विनिर्माण क्षेत्र में क्षमता का उपयोग 10 वर्ष के औसत के निचले स्तर पर ही रहा। पिछले वर्ष की तुलना में वर्ष 2017-18  में उद्योग के जीवीए वृद्धि में हुई गिरावट औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में भी दिखाई देती है। इस दौरान खनन और बिजली क्षेत्रों में मंदी थी। उपयोग आधारित गतिविधि के मामले में उपभोक्ता वस्तुओं, प्राथमिक वस्तुओं, पूंजीगत वस्तुओं और संरचनागत/निर्माण वस्तुओं ने औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की तेजी में योगदान दिया।
    • सेवा क्षेत्र
    • वर्ष 2017-18 के दौरान सेवा क्षेत्र में लगातार दो वर्षों की मंदी का क्रम टूटा और वृद्धि दर वर्ष-दर-वर्ष आधार पर 7.6 प्रतिशत हो गई। फिर भी यह वृद्धि वर्ष 2014-16 के 9.3 प्रतिशत की तुलना में कम है। व्यापार और परिवहन क्रमशः 59 प्रतिशत और 26 प्रतिशत के साथ सेवा क्षेत्र के सबसे बड़े घटक रहे।
    • कीमतों की स्थिति
    • वर्ष 2017-18 के दौरान मुख्य महंगाई दर में 3.6 प्रतिशत की औसत वार्षिक दर से कमी आई, एचआरए के प्रभाव को छोड़कर औसत महंगाई दर 3.4 प्रतिशत रही। वर्ष 2017-18 में खाद्य और पेय पदार्थों की महंगाई दर में तीव्र गिरावट आई, जो पिछले वर्ष के 46 प्रतिशत से घटकर 29 प्रतिशत रह गई। इसका मुख्य कारण मानसून और मार्च, 2017 से दालों की कीमतों में आई अपस्फीति का बढ़ते जाना रहा। वर्ष 2017-18 के दौरान महंगाई दर में ईंधन का योगदान 11.3 प्रतिशत रहा, जो कि  पिछले वर्ष 4.8 प्रतिशत की तुलना में अधिक है। खाद्य और ईंधन को छोड़कर वार्षिक औसत महंगाई दर में कमी आई और यह 40 आधार अंक गिरकर लगभग 4.2 प्रतिशत पर आ गई।
    • मुद्रा एवं ऋण
    • आरक्षित मुद्रा-5 जनवरी, 2018 को आरक्षित मुद्रा अब तक के उच्चतम स्तर 60.6 प्रतिशत हो गई थी, परंतु बाद में 29 जून, 2018 की स्थिति में यह कम होकर 21.1 प्रतिशत रह गई। संचालनगत मुद्रा (सीआईसी) जो आरक्षित मुद्रा की मुख्य चालक होती है, में वर्ष-दर-वर्ष के आधार पर लगभग 4.9 ट्रिलियन रुपये की वृद्धि हुई। वर्ष 2017-18 में भारत का करेंसी अनुपात जीडीपी की तुलना में बढ़कर 10.9 प्रतिशत हो गया। करेंसी उपयोग के संदर्भ में संचालनगत मुद्रा समकक्ष उभरती हुई बाजार अर्थव्यवस्थाओं और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। डिजिटल भुगतान विमुद्रीकरण के तुरंत बाद दिसंबर, 2016 में शीर्ष पर पहुंच गया था, परंतु हाल के कुछ महीनों पहले तक डिजिटल भुगतान में कमी आई हालांकि हाल के महीनों में इसमें कुछ बढ़त भी देखी गई।
    • मुद्रा आपूर्ति31 मार्च, 2018 को मुद्रा आपूर्ति एक वर्ष पूर्व के 6.9 प्रतिशत की तुलना में 9.2 प्रतिशत थी, जबकि 22 जून, 2018 की स्थिति में मुद्रा आपूर्ति की वृद्धि 9.8 प्रतिशत थी।
    • ऋण-31 मार्च, 2018 को ऋण संवृद्धि 10 प्रतिशत थी, जो पिछले वर्ष 4.5 की तुलना में काफी उच्चतर थी। 22 जून, 2018 को वाणिज्यिक बैंकों की ऋण संवृद्धि 12.8 प्रतिशत दर्ज की गई। वर्ष 2017-18 के दौरान वाणिज्यिक क्षेत्र को होने वाला संसाधनों का कुल प्रवाह बढ़कर 27.1 प्रतिशत हो गया, जबकि पिछले वर्ष इसमें 3.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी।
    • वित्तीय बाजार
    • मुद्रा बाजार-वर्ष 2017-18 में बाजार में हुए कुल कारोबार में मांग आधारित लेन-देन का हिस्सा 10 प्रतिशत से भी कम रहा। इस दौरान मुद्रा  बाजार में औसत दैनिक कारोबार 17 प्रतिशत वृद्धि के साथ 1687 बिलियन रु. हो गया, जो वर्ष 2016-17 के दौरान 1441 बिलियन रु. था। वर्ष 2017-18 के दौरान मुद्रा बाजार सामान्य रूप से स्थिर बना रहा। इसमें विमुद्रीकरण के बाद रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत निर्णयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। असंपार्श्विकृत अंतर बैंक मांग मुद्रा बाजार में पूरे वर्ष भारित औसत मांग दर (WACR) पर आधारित कारोबार नीतिगत दर की तुलना में कमी के रुझान के साथ चलता रहा। अप्रैल, 2017 में ऋणात्मक स्प्रेड 32 आधार अंकों के स्तर पर था जो मार्च, 2018 में घटकर औसतन 5 आधार अंकों पर रह गया।




  • सरकारी प्रतिभूति बाजा
  • वर्ष 2017-18 के दौरान केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों की दिनांकित प्रतिभूतियों तथा खजाना बिलों के लेन-देन की मासिक औसत मात्रा में 15.7 प्रतिशत की गिरावट आई। इस गिरावट का प्रमुख कारण प्रतिफलों में अगस्त, 2017 से निरंतर वृद्धि होने से मूल्यन में कमी थी। वर्ष 2018-19 की शुरुआत में जून के अंत तक लेन-देन की मासिक औसत मात्रा में 10.2 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई।
  • कॉर्पोरेट कर्ज बाजार- निवल बकाया कॉर्पोरेट बॉण्ड में 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई जिससे मार्च, 2018 तक बढ़कर 27.4 ट्रिलियन रु. हो गया, जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 16.3 प्रतिशत है। वर्ष 2017-18 के दौरान बॉण्ड बाजार का औसत दैनिक कारोबार भी तीव्र वृद्धि के साथ 74.6 बिलियन रु. हो गया, जो एक वर्ष पहले 61 बिलियन रु. के स्तर पर था।
  • वर्ष 2017-18 के दौरान मुंबई शेयर बाजार के सूचकांक में 3.6 प्रतिशत की गिरावट आई और वर्ष की समाप्ति सूचकांक 32,969 के स्तर पर हुई। इस गिरावट की शुरुआत मुख्य रूप से अमेरिका और चीन के बीच व्यापार टकराव से उत्पन्न होने वाली चिंताओं और उसके बाद अमेरिका द्वारा इस्पात और एल्युमीनियम के आयात पर सीमा शुल्क लगाने, चीनी सामानों पर आयात शुल्क लगाने और घरेलू समष्टिगत आर्थिक आंकड़ों के मिले-जुले होने की घोषणाओं से हुई। वर्ष 2017-18 के दौरान सामान्यतः स्थिर परिस्थितियों में विदेशी मुद्रा बाजार के कुल कारोबार में तेजी आई। मार्च, 2018 के अंत में रुपये के मूल्य में समग्र रूप से एक वर्ष पहले की तुलना में 0.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इस दौरान रुपये के औसत मूल्य में पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई।
  • सरकारी वित्त
  •  वर्ष 2017-18 में केंद्र का सकल राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.5 प्रतिशत रहा, जबकि बजट में इसे 3.2 निर्धारित किया गया था। इस दौरान राजकोषीय कार्यनीति में ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुनियादी ढांचा और गरीबी उन्मूलन पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसके साथ ही वार्षिक बजट में रेल बजट का विलय तथा वार्षिक बजट 1 फरवरी को पेश करने की व्यवस्था की गई। केंद्र द्वारा राज्यों को अंतरण करने के पश्चात कर राजस्व बजट में निर्धारित राशि से 1.3 प्रतिशत अधिक रहा, जबकि गैर-कर राजस्व बजट में निर्धारित लक्ष्य से 33.3 प्रतिशत कम दर्ज किया गया। वर्ष 2018-19 के लिए केंद्र का जीएफडी 3.3 प्रतिशत निर्धारित किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 0.2 प्रतिशतता बिंदु कम है।
  • वर्ष 2017-18 में राज्यों का समेकित जीएफडी बजट में निर्धारित लक्ष्य जीडीपी के 2.7 प्रतिशत से अधिक जीडीपी के 3.1 प्रतिशत दर्ज किया गया। पेंशन और ब्याज संबंधी भुगतान में वृद्धि से राजस्व व्यय बजट में निर्धारित लक्ष्य से 2.3 प्रतिशत बढ़ गया, जबकि पिछले वर्ष उसमें सुधार हुआ था।
  • बाह्य क्षेत्र
  • वर्ष 2017-18 में वैश्विक परिदृश्य में संरक्षणवाद में वृद्धि और जवाबी कार्य-नीतियों के कारण भारत को विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। इस दौरान अमेरिकी डॉलर में मूल्यवर्गित निर्यात में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई तथा भारत के वाणिज्यिक वस्तुओं के निर्यात में सुधार हुआ। पिछले पांच वर्ष के दौरान वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी में 12.3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। वर्ष 2017-18 के दौरान आयात में समग्र रूप से वृद्धि दर्ज की गई, जिसका मुख्य कारण स्वर्ण और पेट्रोलियम उत्पाद रहे, जिनका योगदान इसमें एक-तिहाई से अधिक रहा। भारित योगदान आधार पर कुल आयात वृद्धि में गैर-तेल, गैर-स्वर्ण आयात का हिस्सा 65.1 प्रतिशत रहा। इस दौरान अदृश्य मदों में द्विअंकीय वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2017-18 के दौरान चालू खाता घाटा जीडीपी का 1.9 प्रतिशत हो गया, जो पिछले वर्ष जीडीपी का 0.6 प्रतिशत था। इस दौरान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश बाह्य निवल पूंजी अंतर्वाह का 57 प्रतिशत था। भारत में एफडीआई का सकल अंतर्वाह बढ़ा और वर्ष 2017 में वैश्विक एफडीआई का 10वां सबसे बड़ा निवेश प्राप्तकर्ता देश भारत था, जो सर्वथा नए निवेश के लिए विश्व में सबसे पसंदीदा देश था।