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निर्वाचन आयोग : राज्य सभा व विधानपरिषद चुनावों में नोटा विकल्प समाप्त

November 6th, 2018
Election Commission: Rajya Sabha and Vidhan Parishad elections no.
  • वर्तमान परिदृश्य
  • राज्य सभा और विधानपरिषद के चुनावों में, मत-पत्रों में नोटा (none of the above – NOTA) का विकल्प नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्रीय चुनाव आयोग ने 11 सितंबर, 2018 को इससे जुड़े निर्देश राज्य चुनाव आयोग को दे दिए हैं।
  • पृष्ठभूमि
  • 21 अगस्त, 2018 को भारत के मुख्य न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता में जस्टिस डॉ. वाई. चंद्रचूड़ तथा जस्टिस ए.एम. खानविल्कर की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य सभा चुनाव में नोटा का इस्तेमाल नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि नोटा दल-बदल (डिफेक्शन) को बढ़ावा देगा। इससे भ्रष्टाचार के लिए दरवाजे खुलेंगे। नोटा को सिर्फ प्रत्यक्ष चुनावों में अर्थात लोक सभा और राज्यों की विधानसभा चुनावों में ही लागू किया जाना चाहिए। राज्य सभा चुनाव में नोटा लागू करने से एक मत के औसत मूल्यांकन की धारणा नष्ट होगी। शीर्ष कोर्ट का यह भी मानना है कि इससे ऐसे चुनावों में मतदाता की भूमिका को नजरअंदाज कर दिया गया है, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों का पतन होता है। इसके साथ ही नोटा के प्रयोग से अप्रत्यक्ष चुनाव में समाहित चुनावी निष्पक्षता खत्म होती है।




  • नोटा के विकल्प को चुनौती
  •  गुजरात के शैलेश मनुभाई परमार ने (जो पिछले वर्ष राज्य सभा चुनाव में गुजरात विधानसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक थे) मत-पत्रों में नोटा के विकल्प की अनुमति देने वाली चुनाव आयोग की अधिसूचना को चुनौती दी थी। इस संदर्भ में केंद्र सरकार ने भी शैलेश मनुभाई परमार की याचिका का समर्थन करते हुए कहा कि नोटा का प्रयोग राज्य सभा चुनाव के दौरान नहीं किया जाना चाहिए।
  • नोटा का इतिहास
  • विधि आयोग ने वर्ष 1999 में दी गई अपनी 170वीं रिपोर्ट में लोक सभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने का समर्थन किया था। वर्तमान ईवीएम में ‘नोटा’ का जो विकल्प है इसकी सिफारिश भी विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में ‘नकारात्मक मतदान की व्यवस्था’ लागू करने की बात कहकर की थी।
  • भारत में इस प्रक्रिया की शुरुआत वर्ष 2009 में तब हुई जब चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से नोटा का विकल्प उपलब्ध कराने से जुड़ी अपनी मंशा प्रस्तुत की।
  • भारत में नोटा 27 सितंबर, 2013 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी.सदाशिवम की अगुवाई वाली बेंच द्वारा दिए गए एक आदेश के बाद शुरू हुआ। पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जनता को मतदान के लिए नोटा (NOTA) का भी विकल्प उपलब्ध करावाया जाए। इस आदेश के बाद भारत नोटा का विकल्प उपलब्ध कराने वाला विश्व का 14वां देश बन गया।




  • नोटा का मतलब है कि चुनाव में खड़े तमाम उम्मीदवारों में से अगर मतदाता किसी को पसंद नहीं करता तो नोटा का बटन दबाकर अपनी नापसंद जाहिर कर सकता है।
  • अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
  • भारत में वोट नहीं देने का अधिकार ‘नोटा’ से पहले भी मतदाताओं को प्राप्त था। भारत की चुनाव आचार संहिता, 1961 के नियम 49(ओ) में उल्लेख किया गया था, जिसके अंतर्गत मतदाता फार्म 17A में अपना इलेक्टोरल सिरियल नंबर लिखकर नकारात्मक वोट का उपयोग कर सकता था।
  • वर्ष 2013 में पहली बार हुए पांच राज्यों (छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली) के विधानसभा के चुनाव में नोटा को अपनाया गया। इन सभी राज्यों में 1.85 प्रतिशत वोट, नोटा पाए गए।
  • ईवीएम मशीन में नोटा का बटन गुलाबी रंग का होता है। ईवीएम के मत-पत्र पर एक क्रॉस का चिह्न बनाया गया है, इस चिह्न को 18 सितंबर, 2015 को चुनाव आयोग द्वारा चुना गया था।




  • वर्तमान में नोटा के वोट की गणना की जाती है परंतु इसे रद्द मतों की श्रेणी में रखा जाता है। यानी इससे चुनाव के परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। दुनिया के कई देशों में 50 प्रतिशत से ज्यादा मत पर ही जीत का प्रावधान है, ऐसे में यदि वहां 50 प्रतिशत से ज्यादा नोटा, वोटों की संख्या हो जाती है, तो चुनाव को रद्द कर फिर से चुनाव कराया जाता है। फलस्वरूप यहां नोटा का महत्व काफी बढ़ जाता है।
  • माना जाता है नोटा का सबसे पहले इस्तेमाल अमेरिका में हुआ। मत-पत्रों में ‘नोटा’ का पहली बार प्रयोग 1976 में अमेरिका के कैलिफोर्निया’ में इस्ला विस्ता म्युनिसिपल एडवाइजरी काउंसिल के चुनाव में हुआ। अमेरिका में नोटा के स्थान पर ‘नन ऑफ दीज कैंडिडेट’ वाक्य का प्रयोग किया जाता है।

लेखक-अमर सिंह

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