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उत्तराखंड उच्च न्यायालय : गाय अभिभावक

Uttarakhand High Court: Cow Guardian
  • वर्तमान परिदृश्य
  • 13 अगस्त, 2018 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में गाय की सुरक्षा को सुनिश्चित करने हेतु स्वयं को इसका वैधानिक अभिभावक नियुक्त किया है।
  • इस संबंध में राज्य उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के लिए 31 दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत प्रत्येक 25 गांव पर एक गौशाला का निर्माण और ऐसे लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया गया है, जो अपने पशुओं को खुला छोड़ देते हैं।
  • पेरेंस पैट्री सिद्धांत (‘Parens Patriae’ Doctrine)
  • उत्तराखंड उच्च न्यायालय का यह निर्णय लैटिन सिद्धांत ‘पेरेंस पैट्री’ से प्रेरित है, जिसका अर्थ ‘देश का अभिभावक’ होता है।
  • यह सिद्धांत न्याय व्यवस्था को उन लोगों का संरक्षक/अभिभावक नियुक्त करने की वकालत करता है, जो स्वयं अपनी मदद नहीं कर सकते हैं।
  • गौसंरक्षण से संबंधित महत्वपूर्ण निर्देश
  • राज्य उच्च न्यायालय ने राज्य में गाय, बैल एवं बछड़ों के वध पर रोक लगाने के साथ ही गौमांस के किसी भी प्रकार के व्यापार पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा दिया है।
  • न्यायालय ने गौ-हत्या करने वालों के साथ ही उन लोगों पर भी पशुधन क्रूरता (रोकथाम) अधिनियम, 1960 और उत्तराखंड गाय संरक्षण अधिनियम, 2007 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है, जो अपने पशुओं को खुला छोड़ देते हैं।
  • उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार को कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में एक बड़े पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में एक विशेष दस्ते के गठन का आदेश दिया है। इस विशेष दस्ते में गायों की देखभाल हेतु एक पशु डॉक्टर भी होगा।
  • पृष्ठभूमि
  • गौरतलब है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय का निर्णय उस जनहित याचिका की प्रतिक्रिया में आया है, जिसमें हरिद्वार निवासी किसान याची अलीम अली ने कहा है कि खुले छोड़े हुए पशुओं (विशेषकर गायों) की बूचड़खानों (Slaughter Houses) द्वारा पकड़कर हत्या की जा रही है। इसके साथ ही इन बूचड़खानों का अपशिष्ट, जल निकायों (Water bodies) में बहाया जाता है, जिससे ग्रामीणों के स्वास्थ्य को खतरा पैदा हुआ है।
  • अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
  • ध्यातव्य है कि उत्तराखंड में गौ-हत्या एवं गौमांस के व्यापार पर उत्तराखंड गाय संरक्षण अधिनियम, 2007 के तहत पहले से ही प्रतिबंध है।
  • इस अधिनियम के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम 10 वर्ष तक की सजा या 10000 रु. तक का जुर्माना या फिर दोनों एक साथ मिलने का प्रावधान है।
  • गौरतलब है कि 4 जुलाई, 2018 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सभी पशुओं को जीवित मनुष्य की तरह एक कानूनी इकाई घोषित किया है।
  • वर्ष 2017 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा को एक जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी थी। बाद में उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय को पलट दिया था।

लेखक-धीरेन्द्र त्रिपाठी