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अश्गाबात समझौता

  • वर्तमान परिप्रेक्ष्य
  • 3 फरवरी, 2018 को भारत ‘अश्गाबात समझौते’ (Ashgabat Agreement) में शामिल हो गया।
  • उल्लेखनीय है कि इस समझौते के सभी चार संस्थापक सदस्यों (ईरान, ओमान, तुर्कमेनिस्तान तथा उज्बेकिस्तान) ने 1 फरवरी, 2018 को ही भारत को इस समझौते में शामिल करने हेतु अपनी सहमति दे दी थी।
  • समझौता
  • एक ‘अंतरराष्ट्रीय परिवहन एवं पारगमन गलियारे’ (International Transport & Transit Corridor) की स्थापना पर हुए समझौते को ही अश्गाबात समझौते के नाम से जाना जाता है।
  • इस समझौते पर 25 अप्रैल, 2011 को तुर्कमेनिस्तान की राजधानी अश्गाबात में उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान ओमान एवं कतर के मध्य हस्ताक्षर संपन्न हुआ था।
  •  हालांकि वर्ष 2013 में कतर इस समझौते से अलग हो गया था।
  •  कालांतर में कजाख्स्तान इस समझौते में शामिल हुआ।
  •  अश्गाबात समझौता 23 अप्रैल, 2016 को प्रभावी हुआ था।
  •  तुर्कमेनिस्तान इस समझौते का निक्षेपकर्ता देश (Depository State) है।
  • उद्देश्य एवं महत्व
  • अश्गाबात समझौते में ‘मध्य एशिया’ (Central Asia) एवं ‘फारस की खाड़ी’ (Persian Gulf ) के बीच वस्तुओं के परिवहन एवं पारगमन को सुगम बनाने की परिकल्पना की गई है।
  • यह समझौता अंतरराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके द्वारा सदस्य देशों के मध्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहन एवं उसमें सुधार किया जाना प्रस्तावित है।
  • इस समझौते के द्वारा स्थापित होने वाला परिवहन एवं पारगमन गलियारा उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाख्स्तान और ईरान से होकर गुजरेगा जो मध्य एशिया को फारस की खाड़ी एवं ओमान सागर से जोड़ेगा।
  • यह गलियारा क्षेत्रीय विकास के साथ-साथ व्यापार, अर्थव्यवस्था, निवेश एवं पारगमन सहयोग की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण साबित होगा।
  • भारत के लिए महत्व
  • इस समझौते में शामिल होने से मध्य एशिया के साथ भारत के संपर्क विकल्पों (Connectivity Options) में विविधता आएगी।
  • साथ ही इस क्षेत्र के साथ भारत के व्यापार एवं व्यावसायिक संबंधों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

लेखक-सौरभ मेहरोत्रा