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अमेरिका द्वारा ईरान पर पुनः प्रतिबंध

September 7th, 2018
US sanctions on Iran
  • पृष्ठभूमि
  • अमेरिका और ईरान के संबंध वर्ष 1979 की ईरानियन क्रांति के बाद बिगड़ गए। प्रतिक्रिया स्वरूप अमेरिका द्वारा ईरान पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए गए।
  • अमेरिका और ईरान के बिगड़े संबंधों की एक बड़ी वजह ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने की संभावना है। अमेरिका नहीं चाहता कि ईरान परमाणु हथियारों का निर्माण करे।
  • मध्य-पूर्व के क्षेत्र में अमेरिका के अपने हितों के संदर्भ में ईरान के साथ उसके संबंध बनते-बिगड़ते रहे हैं।
  • गौरतलब है कि अमेरिका ने ईरान, इराक और उत्तरी कोरिया को ‘शैतानियत की धुरी’ वाले देशों की संज्ञा दी है।
  • संयुक्त समग्र कार्ययोजना समझौता (जेसीपीओए)
  • जुलाई, 2015 में अमेरिका के ओबामा प्रशासन के समय में अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन, फ्रांस और जर्मनी के साथ मिलकर ईरान ने वियना में परमाणु समझौता किया था।
  • इस समझौते के अंतर्गत ईरान को परमाणु बम के निर्माण कार्यक्रम को बंद करना था, बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटा दिए जाने का आश्वासन दिया गया।
  • इस समझौते को (P5+1) समझौता भी कहते हैं, क्योंकि इस समझौते में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी सदस्यों के साथ ही जर्मनी भी शामिल है।
  • यह समझौता ईरान को वर्ष 2030 तक परमाणु हथियार बनाने के लिए जरूरी परमाणु ईंधन के एकत्रण को प्रतिबंधित करता है।
  • वर्तमान परिदृश्य
  • 6 अगस्त, 2018 को संयुक्त राज्य अमेरिका ने, संयुक्त समग्र कार्ययोजना समझौते (जेसीपीओए) से पीछे हटते हुए ईरान पर दुबारा आर्थिक प्रतिबंध लगाने की घोषणा की।
  • गौरतलब है कि अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प शुरू से ही इस समझौते के मुखर आलोचक रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 2015 में ओबामा प्रशासन में किए गए समझौते से 8 मई, 2018 को अमेरिका ने स्वयं को अलग कर लिया था।
  • प्रतिबंध पर समझौते में शामिल देशों का मत
  • अमेरिका के इस निर्णय का विरोध, समझौते में शामिल उसके यूरोपीय सहयोगियों यथा-ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी के साथ ही चीन और रूस भी कर रहे हैं।
  • जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने इस समझौते से पीछे हटने के अमेरिकी निर्णय का विरोध करते हुए कहा, कि यह समझौता तोड़कर अमेरिका ने मध्य-पूर्व की स्थिति को और बिगाड़ दिया है। मर्केल के अनुसार, यह समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पारदर्शी बनाने के साथ ही उसे नियंत्रित रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
  • रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने यूरोपीय नेताओं से अपने बात-चीत के क्रम में बिना अमेरिका के समझौते को बनाए रखने पर जोर दिया।
  • चीन ने समग्र कार्ययोजना समझौते (जेसीपीओए) को बचाने और उसे क्रियान्वित करने के लिए सभी पक्षों से बातचीत जारी रखने की अपील की।
  • फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने मध्य-पूर्व क्षेत्र में स्थिरता की बहाली हेतु समग्र कार्ययोजना समझौते को बनाए रखने पर जोर दिया।
  • प्रतिबंध का भारत पर असर
  •  ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों का भारत के तेल आयात पर गंभीर असर पड़ने का अंदेशा है। भारत और ईरान के बीच पारंपरिक रूप से बेहतर व्यापारिक संबंध रहे हैं, भारत ईरान से काफी मात्रा में तेल आयात करने के साथ ही उसकी तेल परियोजनाओं में सहयोग भी दे रहा है। इन्हीं नजदीकी संबंधों की वजह से ईरान ने भारत को चाबहार बंदरगाह में साझेदारी का मौका दिया है। इसलिए भारत भी समग्र कार्ययोजना समझौते को बनाए रखने का पक्षधर है।
  •  ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगने की स्थिति में भारत पर ऊर्जा संकट बढ़ने के साथ ही प्रस्तावित ‘उत्तर-दक्षिण गलियारा परियोजना’ के भी संकट में पड़ने की आशंका है।
  • निष्कर्ष
  • संयुक्त समग्र कार्ययोजना समझौते से अलग होने के निर्णय से मध्य-पूर्व क्षेत्र में तनाव बढ़ने के साथ ही ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा। इसके साथ ईरान अपने परमाणु हथियारों के विकास का कार्यक्रम पुनः प्रारंभ कर सकता है, जो अंततः वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की दौड़ पुनः प्रारंभ कर सकता है।

लेखक-धीरेंद्र त्रिपाठी

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