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मासिक पत्रिका मार्च-अप्रैल 2017 पी.डी.एफ. डाउनलोड

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5 राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणाम क्या संकेत करते हैं? क्या ये सत्ता विरोधी रुझान प्रदर्शित करते हैं? हां, क्योंकि किसी भी राज्य में सत्ताधारी पार्टी पुनः सरकार नहीं बना पाई। नहीं, क्योंकि मणिपुर में सत्ताधारी पार्टी ने सर्वाधिक सीटें जीती हैं। क्या ये चुनाव परिणाम केंद्र सरकार की नीतियों के प्रति जनता के समर्थन की अभिव्यक्ति हैं? हां, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी को इन चुनावों में भारी जन-समर्थन प्राप्त हुआ है। नहीं, क्योंकि पंजाब एवं गोवा में भाजपा की सीटों एवं मत प्रतिशत दोनों में ही पिछले चुनाव की तुलना में गिरावट आई है। क्या विजेता दलों के मतों की प्रतिशतता एवं उनके द्वारा जीती गई सीटों में सीधा संबंध है? हां, क्योंकि उ.प्र., उत्तराखंड एवं पंजाब में ऐसा ही हुआ है। नहीं, क्योंकि मणिपुर एवं गोवा में भारतीय जनता पार्टी के मतों की प्रतिशतता अधिक होने के बावजूद विजित सीटों की संख्या कम है। क्या मतदान प्रतिशतता में वृद्धि हुई है? हां, क्योंकि उत्तर प्रदेश एवं मणिपुर में वर्ष 2012 के विधान सभा चुनावों की तुलना में मत प्रतिशत में वृद्धि हुई है। नहीं, क्योंकि पंजाब, उत्तराखंड एवं गोवा में गत विधान सभा चुनावों की तुलना में मतदान प्रतिशत में कमी आई है। वस्तुतः हकीकत यह है कि भिन्न-भिन्न अंचलों में अवस्थित 5 राज्यों के चुनाव परिणामों का विश्लेषण किसी समान आधार पर संभव नहीं है। सांस्कृतिक वैविध्य से परिपूर्ण भारत के राज्यों के अपने-अपने विश्लेषण हैं। वर्तमान चुनाव परिणामों को भी इसी दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। सांस्कृतिक विविधता लोकतांत्रिक निर्णयों को भी परिचालित करती है। इसका ताजा उदाहरण है-जहां गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री ने गोहत्या के लिए मृत्युदंड का कानून लागू किया है, वहीं नगालैंड एवं मिजोरम के भाजपा प्रमुखों ने कहा है कि ‘यदि भारतीय जनता पार्टी मेघालय, नगालैंड एवं मिजोरम में सत्ता में आती है, तो गोवध (Cow Slaughter) पर प्रतिबंध इन राज्यों में नहीं लागू किया जाएगा।’ उल्लेखनीय है इन राज्यों की जनसंख्या ईसाई बहुल है और इनकी विधान सभाओं के चुनाव अगले वर्ष होने जा रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि भिन्न-भिन्न राज्यों के लिए न तो नीतियां एक हो सकती हैं न ही इनके चुनाव परिणामों के आधार एक हो सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि राज्यों में कहीं साम्यता नहीं है। इन सभी राज्यों के चुनावों में अमीर उम्मीदवारों को अधिक सफलता मिली है, शिक्षित उम्मीदवार ज्यादा सफल रहे हैं और राजनीति में बाहुबलियों का कद बढ़ा है। इस अंक के आवरण आलेख में सभी 5 राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणामों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च (Public Spending) की दृष्टि से भारत विश्व के सर्वाधिक न्यून व्यय करने वाले देशों में से एक है। वैश्विक औसत GDP के 5.99 प्रतिशत की तुलना में भारत में मात्र GDP का 1.15 प्रतिशत स्वास्थ्य पर व्यय किया जाता है। 15 मार्च, 2017 को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017’ में स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद के वर्तमान 1.15 प्रतिशत से बढ़ाकर वर्ष 2025 तक 2.5 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। इस नीति में स्वास्थ्य क्षेत्र के अन्य बहुत से लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। इस अंक में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति पर आलेख प्रस्तुत किया गया है।
बैंक द्वारा व्यापारियों से क्रेडिट/डेबिट कार्ड से भुगतान प्राप्ति की स्थिति में जो शुल्क वसूला जाता है, उसे एम.डी.आर. (Merchant Discount Rate) कहा जाता है। एम.डी.आर. की दरों को युक्तिसंगत बनाने को लेकर व्यापक विमर्श जारी है। इसी विषय पर आलेख इस अंक में प्रस्तुत किया गया है।
संदर्भ स्तंभ के तहत वर्षांत समीक्षा, 2016 का द्वितीय खंड प्रस्तुत किया गया है।
इस अंक के साथ म.प्र.पी.सी.एस., प्रारंभिक परीक्षा, 2017 का हल प्रश्न-पत्र निःशुल्क प्रदान किया गया है।
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