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पेरिस समझौते से अलग हुआ अमेरिका

July 10th, 2017
America separated from Paris agreement
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  • पृष्ठभूमि
    वर्तमान में विश्व के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती के रूप में पर्यावरणीय समस्या विद्यमान है। यह एक बहुआयामी समस्या है। एक तरफ गरीबी से ग्रस्त देश जहां इसे जटिल बना रहे हैं, वहीं विकसित देशों की विकास के लिए जारी अंधी दौड़ ने पर्यावरण को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। आज विश्व समुदाय इस समस्या से निजात पाने की जुगत में लगा हुआ है। इसी परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2015 में विश्व के देशों द्वारा पेरिस में एक समझौते पर हस्ताक्षर किया गया था। अमेरिका, भारत, चीन तथा यूरोपियन यूनियन के देशों की इसमें प्रमुख भूमिका रही थी।
  • क्या है पेरिस समझौता?
    पेरिस समझौता, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए यूएनएफसीसीसी के सदस्यों (Parties of UNFCCC) द्वारा किया गया एक समझौता है। इस समझौते पर 194 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं, इस समझौते के अनुसार 21वीं सदी के औसत तापमान में औद्योगीकरण के पूर्व के वैश्विक तापमान के स्तर में 2oC से अधिक की वृद्धि नहीं होने दी जाएगी। साथ ही यह भी प्रयास रहेगा कि वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 1.5 2oC तक सीमित रखा जाए। यह समझौता 4 नवंबर, 2016 से लागू हुआ था।
  • पेरिस समझौते से अमेरिका हुआ बाहर
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस समझौते से बाहर होने का निर्णय लिया है। उनके अनुसार, पेरिस समझौता अमेरिका की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही यह भारत तथा चीन को फायदा पहुंचाता है। उनका यह भी तर्क है कि इस समझौते से वर्ष 2025 तक अमेरिका में 27 लाख नौकरियां चली जाएंगी।
    जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर ऐसा दूसरी बार है, जब अमेरिका वैश्विक समझौते से अलग हो गया हो। इससे पूर्व क्योटो प्रोटोकॉल (1997) के साथ अमेरिका ने ऐसा ही किया था। इस घोषणा से पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में जीवाश्म ईंधन की खपत और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए ओबामा प्रशासन द्वारा शुरू की गई नीतियों को समाप्त कर दिया। इसके अतिरिक्त अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund : GCF) समेत ग्लोबल क्लाइमेट चेंज इनिशिएटिव को भी धनराशि प्रदान करने से भी मना कर दिया गया है।
    उल्लेखनीय है कि हरित जलवायु कोष (GCF) को विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने और कम कार्बन प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल बढ़ाने में मदद करने के लिए स्थापित किया गया है।
  • जलवायु परिवर्तन में अमेरिका की भूमिका
    जलवायु परिवर्तन के लिए अमेरिका ऐतिहासिक रूप से सर्वाधिक उत्तरदायी है। वर्तमान में यह दुनिया का दूसरा सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाला देश है। अमेरिका का विद्युत क्षेत्र अकेले ही वर्ष 2015 में 2 बिलियन टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करने के लिए जिम्मेदार था।
देश/संगठन कार्बन उत्सर्जन (%)
चीन 30
सं.रा. अमेरिका 15
यूरोपीय संघ 9
भारत 7
रूस 5
जापान 4
अन्य 30
  • समझौते पर अन्य देशों की स्थिति
    पेरिस समझौते से अलग होने की अमेरिका की घोषणा से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ चल रही वैश्विक मुहिम को नुकसान पहुंचा है। हालांकि जिस तरीके से दुनिया भर के देशों ने अमेरिका के इस फैसले के खिलाफ एकजुटता दिखाई है, उससे ऐसा लगता है कि पृथ्वी को बचाने की अंतरराष्ट्रीय मुहिम की गति धीमी नहीं पड़ी है।
    फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैंक्रो ने डोनाल्ड ट्रंप के नारे ‘अमेरिका ग्रेट अगेन’ के विपरीत विश्व समुदाय की भलाई के लिए नया नारा ‘प्लैनेट ग्रेट अगेन’ दिया है। जिसके पक्ष में दुनिया का नेतृत्व लामबंद हो गया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने पेरिस समझौते से अमेरिका के हटने को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि इससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के वैश्विक प्रयासों को नुकसान पहुंचा है।
  • समझौते पर भारत की स्थिति
    भारत उन राष्ट्रों का नेतृत्व करता है, जो जलवायु परिवर्तन के सर्वाधिक शिकार हैं। पेरिस समझौते से अलग होने की अमेरिका की घोषणा से बिल्कुल अलग भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि पेरिस समझौता भावी पीढ़ियों के लिए किया गया है और इस संबंध में हमारे रुख में कोई बदलाव नहीं होगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत भावी पीढ़ी के साथ खड़ा है और भावी पीढ़ी को हम कैसा पर्यावरण देंगे, यह सोचना हम सबकी जिम्मेदारी है। पर्यावरण एवं पृथ्वी का संरक्षण हमारे अस्तित्व से जुड़ा है। ध्यातव्य है कि भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है। पेरिस समझौते के तहत भारत ने वर्ष 2030 तक 33 से 35 प्रतिशत तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य रखा है। इसके लिए लगभग 2.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जरूरत पड़ने वाली है। जलवायु परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित करते हुए भारत सरकार विभिन्न कार्य योजना (Action Plan) पर काम कर रही है। इनमें नेशनल सोलर मिशन, ग्रीन इंडिया मिशन, नेशनल मिशन ऑन सस्टेनेबल हैबिटेट, नेशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग हिमालयन इकोसिस्टम आदि प्रमुख हैं।
  • निष्कर्ष
    वर्तमान में कोई खुद के लिए, तो कोई आने वाली पीढ़ियों के लिए चिंतित है। प्रकृति के असंतुलन और पर्यावरण के खतरे ने ऐसी ही चिंता सभी देशों के लिए पैदा कर दी है। ऐसी स्थिति अगर विश्व का अगुवा कहा जाने वाला अमेरिका ही पर्यावरण के मुद्दे पर गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करे, तो फिर समस्या का समाधान थोड़ा मुश्किल-सा लगने लगता है। वर्ष 2015 के पेरिस समझौते को अंजाम तक पहुंचाने में अमेरिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। लेकिन इधर बीच जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अमेरिका का जिस तरह का रवैया रहा है उसे देखकर लगता है कि अमेरिका द्वारा अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश हो रही है। भारत जैसे विकासशील देश इस बात के लिए सक्षम नहीं है कि अपने दम पर इस वैश्विक समस्या से निपट सके। इसके लिए बहुत सारा पैसा और नवीन तकनीक चाहिए। इसके लिए भी विकसित देशों की मदद अनिवार्य है। फिलहाल विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका में उत्सर्जन में कटौती के बिना जलवायु परिवर्तन से निपटा नहीं जा सकता है। इसलिए पेरिस समझौते के शेष हस्ताक्षरकर्ता देशों को इस समझौते के प्रति अमेरिका की जवाबदेही तय करने के तरीके ईजाद करने होंगे। ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि बदलते वक्त और दुनिया के बड़े नेताओं के दबाव में अमेरिका, पेरिस समझौते से अलग होने के अपने फैसले पर पुनर्विचार कर सकता है।

लेखक-काली शंकर ‘शारदेय’


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