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नीति आयोग द्वारा राष्ट्रीय पोषण रणनीति जारी

October 25th, 2017
national nutrition strategy india
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  • राष्ट्रीय पोषण रणनीति?
    5 सितंबर, 2017 को हरित क्रांति के नेतृत्वकर्ता डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन और पद्मश्री डॉ. एच. सुदर्शन ने नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार और सदस्य डॉ. विनोद पॉल के साथ ‘राष्ट्रीय पोषण रणनीति’ (National Nutrition Strategy) को जारी किया। नीति आयोग ने पोषण में निवेश की सिफारिश करते हुए ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट, 2015 के हवाले से कहा कि निम्न और मध्यम आय वाले 40 देशों में पोषण में निवेश का लागत-लाभ अनुपात 16 :1 है।
  • विजन 2022
    राष्ट्रीय पोषण रणनीति यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि प्रत्येक बच्चे, किशोरी और महिला (विशेष रूप से कमजोर समुदायों) को इष्टतम् पोषण स्थिति प्राप्त हो सके। विशेष रूप से जीवन के प्रथम तीन वर्षों समेत संपूर्ण जीवन चक्र में अल्प पोषण को कम करने तथा रोकने पर विशेष ध्यान दिया गया है।
  • लक्ष्य, उद्देश्य और मुख्य संकेतक
  • वर्ष 2022 तक बच्चों (0-3 वर्ष) में अल्प पोषण (कम वजन के प्रसार) को रोकने के लिए NFHS-4 स्तर से प्रतिवर्ष 3 प्रतिशत तक कम किया जाना है।
  • वर्ष 2022 तक युवा बच्चों, किशोरियों और प्रजनन आयु समूह (15-49 वर्ष) की महिलाओं में रक्ताल्पता (Anemia) के प्रसार को NFHS-4 स्तर से एक-तिहाई तक कम करना है।
  • दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2030 तक पोषण रणनीति का लक्ष्य सभी प्रकार के अल्प पोषण को कम करना है।
    निगरानी योग्य परिणाम वर्तमान स्थिति लक्ष्य, 2022
    1 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में कम वजन (Below-2.50) में प्रतिशत कमी 35.7 20.7
    2 बच्चों (6-59 माह) में रक्ताल्पता के प्रसार में कमी 58.4 19.5
    3 महिलाओं और लड़कियों (15-49 वर्ष) में रक्ताल्पता में कमी 53.1 17.7
  • सतत् विकास लक्ष्य के 17 संकेतकों में से कम-से-कम 12 संकेतक यह दर्शाते हैं कि सतत् विकास को सुनिश्चित करने का आधार निर्मित करने में पोषण प्रासंगिक है। अतः राष्ट्रीय पोषण रणनीति, सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होगी।
  • पोषण रणनीति में एक ढांचे की परिकल्पना की गई है, जिसके तहत पोषक के चार निर्धारक तत्वों, स्वास्थ्य सेवाओं, खाद्य पदार्थ, पेयजल और साफ-सफाई तथा आय एवं आजीविका में सुधार पर बल दिया गया है।
  • पोषण रणनीति-कैसे?
    राष्ट्रीय पोषण रणनीति के तहत ‘कुपोषण मुक्त भारत’ (Kuposhan Mukt Bharat) पर जोर दिया गया है, जो कि स्वच्छ भारत और स्वस्थ भारत से जुड़ा हुआ है।
  • मुख्य रणनीतियां
  • शासन सुधार – न्यूट्रिशन सेंटर स्टेज (Nutrition Centre Stage) और सार्वजनिक जवाबदेही
  • उदाहरणों द्वारा नेतृत्व – कुपोषण मुक्त राज्यों, जिलों और पंचायतें
  • अभिसरण – पोषण के निर्धारकों के साथ आईसीडीएस (ICDS), एनएचएम (NHM) और स्वच्छ भारत और अन्य के लिए राज्य/जिला कार्यान्वयन योजनाओं का सम्मिलन।
  • प्राथमिकता के तौर पर कार्रवाई – बाल अल्प-पोषण के उच्चतम स्तर वाले जिलों/ब्लॉकों में सबसे कमजोर समुदाय तक पहुंचना।
  • गंभीर आयु समूह तक परामर्श की पहुंच – कुशल एवं समकक्ष परामर्शदाताओं और समर्थन समूहों के द्वारा गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं तथा 3 वर्ष से कम आयु के बच्चों तक सलाह की पहुंच।
  • देखभाल की निरंतरता – जीवन भर निवारक तथा इलाजपूर्ण देखभाल
  • अभिनव सेवा प्रदाता मॉडल-अभी भी परिबू (ओडिशा), सुपोषण एवं स्नेह शिविर (मध्य प्रदेश) आदि।
  • समुदाय आधारित निगरानी
  • सक्षम कार्रवाई – पुनर्गठित आईसीडीएस के नए घटकों का कार्यान्वयन, मनरेगा के माध्यम से पालनाघर, सबला का विस्तार और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के माध्यम से मातृत्व लाभ का कार्यान्वयन और स्वास्थ्य प्रणाली के तहत पोषण को मजबूती प्रदान करना।
  • राष्ट्रीय पोषण मिशन
    राष्ट्रीय पोषण रणनीति का उद्देश्य राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के समान राष्ट्रीय पोषण मिशन (National Nutrition Mission) की शुरुआत करना है। यह महिलाओं और बच्चों के विकास, स्वास्थ्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण, स्वच्छता, पेयजल और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में पोषण संबंधी व्यवधानों के एकीकरण में सक्षम होगा।
  • कुपोषण क्या है?
    कुपोषण यह प्रदर्शित करता है कि अपनी उम्र के हिसाब से बच्चे या तो बहुत छोटे या बहुत पतले हैं। ऐसे बच्चे जिनकी लंबाई उनकी उम्र के अनुसार, औसत लंबाई से कम होता है, उनको छोटे कद का (Stunted) माना जाता है। इसी प्रकार बच्चे जिनका वजन उनकी उम्र के हिसाब से औसत वजन से कम होता है, उन्हें पतला (Or Wasted) माना जाता है। इन दोनों प्रकार के बच्चों को उचित पोषक की कमी और जन्म के बाद शिशु की अपर्याप्त देखभाल की वजह से कम वजन वाला माना जाता है।
  • अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
    वर्ष 2005 से 2015 के बीच भारत में कुल मिलाकर कम वजन वाले बच्चों की प्रतिशतता में कमी दर्ज की गई है। हालांकि बच्चों में वास्टिंग (उम्र के हिसाब से कम वजन) की प्रवृत्ति में पंजाब, गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और सिक्किम में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।
  • कम वजन वाले बच्चों का प्रसार शहरी क्षेत्रों (29%) की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों (38%) में अधिक है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार 2.5 किग्रा. से कम वजन वाले शिशुओं की मृत्यु होने की संभावना 20 गुना अधिक होती है। भारत में 19 प्रतिशत बच्चों में जन्म के समय राष्ट्रीय औसत वजन 2.5 किग्रा. से कम है।
  • कम वजन वाले बच्चों की सर्वाधिक संख्या मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में है।
  • भारत में लगभग आधे से अधिक (58%) बच्चे रक्ताल्पता (Anemia) से ग्रस्त हैं।
  • भारत में वयस्कों में 23 प्रतिशत महिलाएं और 20 प्रतिशत पुरुष कुपोषित हैं। इसके अलावा 21 प्रतिशत महिलाएं और 19 प्रतिशत पुरुष अधिक वजन या स्थूलकाय हैं।
  • बाल कुपोषण
  • एक अनुमान के अनुसार, भारत में 0-18 आयु वर्ग के लगभग 43 करोड़ बच्चे हैं। महिलाएं और बच्चे मिलकर भारत की जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत हैं।
  • नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-4 (NFHS-4) के अनुसार, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में कम वजन (Underweight) होने की प्रबलता में 16 प्रतिशत की कमी आई है।
  • इस संदर्भ में हिमाचल प्रदेश (41.9% तक), मेघालय, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश (40% तक), त्रिपुरा (39 % तक) और मणिपुर (37.8% तक) में उल्लेखनीय कमी देखी जा सकती है जबकि महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में लगभग स्थिर स्थिति रही।
  • बच्चों में वृद्धि अवरोध (Stunting) में कुल मिलाकर कमी देखी गई है लेकिन बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मेघालय, मध्य प्रदेश और दादरा एवं नागर हवेली में यह उच्च स्तर पर बना हुआ है। इन राज्यों में 40 प्रतिशत से अधिक बच्चे वृद्धि अवरोध से ग्रसित हैं।
  • NFHS-4 (2015-16) के अनुसार 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में वेस्टिंग (Wasting) अथवा तीव्र कुपोषण (Acute Malnutrition) उच्च स्तर पर बना हुआ है।
  • महिलाओं एवं लड़कियों की स्थिति
  • NFHS-4 (2015-16) के अनुसार 15-49 आयु वर्ग की महिलाओं और लड़कियों की पोषण स्थिति में सुधार हुआ है।
  • लो बॉडी मॉस इंडेक्स (BMI) के साथ महिलाओं में कुपोषण की मात्रा घटकर NFHS-3 के 35.5 प्रतिशत की अपेक्षा NFHS-4 में 22.9 प्रतिशत हो गई है।
  • NFHS-4 के अनुसार, महिलाओं और लड़कियों में रक्ताल्पता की स्थिति में गिरावट देखी गई है। कुल 53 प्रतिशत महिलाएं एवं लड़कियां रक्ताल्पता (Anemia) से ग्रसित हैं।
  • कुल प्रजनन दर (TFR) में गिरावट दर्ज की गई। जो कि NFHS-3 के 2.7 से घटकर NFHS-4 में 2.2 रह गई है।
  • माताओं में स्तनपान कराने की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। स्तनपान दर NFHS-3 के 23.4 प्रतिशत से बढ़कर NFHS-4 में 41.6 प्रतिशत हो गया। इस संदर्भ में केरल, अरुणाचल प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में गिरावट दर्ज की गई।
  • स्तनपान के स्वास्थ्य एवं आर्थिक लाभ पर लांसेट, 2016 (LANCET, 2016) रिपोर्ट यह इंगित करता है कि युक्ततम स्तनपान का सार्वभौमीकरण करके मुख्य रूप से डायरिया (Diarrhea) और न्यूमोनिया (Pheumonia) से सुरक्षा करते हुए 156,000 बच्चों की मृत्यु को कम किया जा सकता है।
  • NFHS-4 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रत्येक दूसरा बच्चा (58.4%) रक्ताल्पता से ग्रसित है।
  • NFHS-4 के अनुसार, 20-24 आयु वर्ग की लगभग 26.8 प्रतिशत वर्तमान में विवाहित महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व हो गई थी।
  • निष्कर्ष
    देश में पोषण की स्थिति में सुधार लाने के लिए पिछले कई वर्षों में विभिन्न सरकारी पहलों की शुरुआत की गई है। जिनमें एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS), राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), जननी सुरक्षा योजना, मातृत्व सहयोग योजना, मिड-डे मील योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन एवं अन्य शामिल हैं। हालांकि पिछले वर्षों में कुपोषण में कमी देखी गई है, फिर भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय पोषण रणनीति जारी की गई है।
    इसके तहत राज्य, जिला और स्थानीय स्तर पर अधिक लचीलेपन और निर्णय लेने के साथ एक विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया जाना है। उम्मीद है कि यह रणनीति भारत को कुपोषण मुक्त बनाने में कारगर सिद्ध होगी।

लेखक-काली शंकर ‘शारदेय’


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