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चितले समिति रिपोर्ट, 2017

July 6th, 2017
chitale committee report 2017
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2525 किमी. लंबी गंगा नदी गंगोत्री से निकलकर बंगाल की खाड़ी तक बहती है। गंगा के प्रवाह मार्ग में गाद/तलछट के जमा होने से नदी के निरंतर प्रवाह में अवरोध उत्पन्न हो गया है। इस समस्या को ध्यान में रखकर जल संसाधन एवं नदी विकास मंत्रालय द्वारा भीमगौड़ा (उत्तराखंड) से फरक्का (पश्चिम बंगाल) तक गंगा नदी की गाद निकालने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने एवं रेत के अवैध खनन रोकने के लिए चितले समिति का गठन जुलाई, 2016 में किया गया था। समिति के अध्यक्ष राष्ट्रीय गंगा नदी प्राधिकरण (NGRBA) के विशेष सदस्य श्री माधव चितले को बनाया गया। समिति के अन्य सदस्यों में जल संसाधन विकास मंत्रालय के सचिव, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के सचिव तथा विद्युत अनुसंधान स्टेशन के निदेशक को शामिल किया गया है।
चितले समिति की रिपोर्ट के अनुसार, गंगा नदी में तलछट का जमाव मुख्य रूप से भीमगौड़ा बैराज के नीचे की ओर तथा गंगा में मिलने वाली सहायक नदियों के संगम स्थल के पास पाया जाता है। गंगा एवं घाघरा नदी के संगम स्थल पर अत्यधिक गाद के जमाव के कारण नदी के पास मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ तेजी से बढ़कर लगभग 12-15 किलोमीटर तक फैल जाती है। बाढ़ की समस्या का समाधान करने के लिए गाद निकालने की समुचित प्रक्रिया को अपनाए जाने की आवश्यकता है।
नदियों से तलछट/गाद हटाने के लिए समिति ने निम्नलिखित मूल सिद्धांतों को ध्यान में रखने की सिफारिश की है-

  • नदी प्रणाली में गाद प्रवाह कम करने के लिए कृषि की उन्नत पद्धतियों को अपनाकर भूमि को कटाव से बचाने की प्रक्रिया को अपनाने की आवश्यकता है।
  • नदी तट की सुरक्षा, जल ग्रहण क्षेत्र प्रबंधन और जल विभाजक विकास कार्यों में प्रगति आवश्यक है।
  • नदी के प्रवाह मार्ग में भूमि का कटाव तथा तलछट का जमाव नदी के प्राकृतिक नियमन कार्य हैं। इसमें मानवीय हस्तक्षेप को रोककर संतुलन बनाने की आवश्यकता है।
  • गाद को हटाने के साथ ही गाद के प्रवाह के लिए मार्ग बनाने की रणनीति अपनाई जानी चाहिए।
  • महत्वपूर्ण बिंदु
  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के रेत खनन के दिशा-निर्देशों के अतिरिक्त गंगा नदी में गाद हटाने के कार्यों के विशिष्ट संदर्भ में समिति ने निम्नलिखित दिशा-निर्देशों का सुझाव दिया है-
    (i) गंगा नदी प्राकृतिक नदी तल तथा तट के झुकाव के अनुरूप स्वयं का संतुलन प्राप्त करने का प्रयास करती है। बाढ़ के स्तर को नियंत्रित करने के लिए नदी के साथ बाढ़ के लिए पर्याप्त मैदान और झीलें उपलब्ध कराना आवश्यक है।
    (ii) बैराज/पुल जैसे निर्माण कार्यों के कारण गाद भरने से नदी के मार्ग में परिवर्तन हो सकता है इसलिए नदी की आकारिकी को प्रभावित किए बिना उचित मूल्यांकन के बाद ही निर्माण कार्य किया जाना चाहिए।
    (iii) नदी के संकुचन के कारण व्यापक गाद जमा हो सकती है ऐसे स्थलों का पूर्व चयन द्वारा प्रवाह में गाद हटाने का कार्य गहराई में किया जा सकता है जिससे नदी को मुख्य धारा में प्रवाह की सही दिशा मिल सके।
    (iv) संगम वाले स्थानों, विशेष रूप से भारी गाद अपने साथ ले जाने वाली सहायक नदियों जैसे घाघरा, सोन इत्यादि से गाद हटाना आवश्यक है क्योंकि इन संगम स्थलों पर गाद के अत्यधिक जमाव के कारण ही बाढ़ की समस्या होती है।
    (v) नदियों में बाढ़ वाले मैदानी क्षेत्रों में कृषि की पद्धति को उन्नत करने की आवश्यकता है जिससे कि बाढ़ के पानी के प्रवाह में कोई अवरोध उत्पन्न न हो सके।
    (vi) पर्यावरण दृष्टि से स्वीकार्य और व्यावहारिक दृष्टि से समुचित गाद निपटान योजना बनाने की आवश्यकता है।
    (vii) नदी में उपस्थित बजरी/रेत/गाद का समुचित उपयोग, आवास, सड़कों, बांध जैसे निर्माण कार्यों में किया जा सकता है।
    (viii) फरक्का बांध से हटाई गई तलछट का उपयोग फरक्का फीडर नहर की फिर से ग्रेडिंग किया जा सकता है और बांध संबंधी तालाब के चारों ओर बने तटबंध को मजबूत किया जा सकता है।
    (ix) बांध/तटबंध के ढांचों के अपतटीय स्थल तक तलछट का सुरक्षित आगमन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक व्यवस्था करनी होगी जिससे तलछट संबंधी संतुलन को स्थायी बनाया जा सके।
    नदी में गाद निकालने के प्रतिकूल प्रभाव-
    अत्यधिक गाद निकालने से नदी का तल नीचे हो सकता है।
    नदी के तल के नीचे होने से तट का कटाव बढ़ सकता है।
    नदी के आस-पास स्थित उथले जल स्तर का नीचे की ओर जाना।
    पर्यावरण संबंधी समस्या का उत्पन्न होना।

लेखक-प्रभात सिंह


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