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अंतरराज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक, 2017

May 5th, 2017
Interstate River Water Disputes (Amendment) Bill 2017
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  • क्या है?
    14 मार्च, 2017 को केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरुद्धार मंत्री उमा भारती द्वारा अंतरराज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक, 2017 लोक सभा में पेश किया गया। इस विधेयक द्वारा अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 में संशोधन प्रस्तावित है।
  • संशोधन क्यों?
    राज्यों द्वारा जल की मांग में लगातार वृद्धि के कारण बढ़ रही अंतरराज्यीय जल विवादों के समाधान हेतु कानूनी ढांचा प्रदान करने वाले अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 में कुछ कमियां महसूस की गई हैं। इस अधिनियम के तहत प्रत्येक अंतरराज्यीय नदी जल विवाद के लिए एक अलग न्यायाधिकरण के गठन का प्रावधान है, जिसके द्वारा निर्णय देने के लिए कोई समय-सीमा न होने के कारण विवादों के समाधान में देरी हो रही है। कावेरी, रावी, व्यास से संबंधित न्यायाधिकरण क्रमशः पिछले 26 और 30 वर्षों से अस्तित्व में है। इसके अतिरिक्त अध्यक्ष या सदस्यों के लिए ऊपरी आयु सीमा का न होना, किसी रिक्ति के कारण रुका कार्य तथा न्यायाधिकरण की रिपोर्ट प्रकाशित करने की कोई समय-सीमा न होना, अन्य कमियां हैं। अतः इस अधिनियम में संशोधन प्रस्तावित है।
  • विवाद निवारण समिति
    इस संशोधन विधेयक में केंद्र सरकार द्वारा विवाद निवारण समिति (DRC) के गठन का प्रावधान है, जिससे दोस्ताना तरीके से राज्यों के बीच जल विवादों को सुलझाया जा सके। केंद्र सरकार द्वारा इस समिति को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए एक वर्ष का समय मिलेगा, जिसे अधिकतम 6 माह के लिए बढ़ाया जा सकेगा।
  • नए न्यायाधिकरण का गठन
    विवाद निवारण समिति (DRC) के माध्यम से यदि विवाद का समाधान न हो पाए, तो उस पर निर्णय के लिए अंतरराज्यीय नदी जल विवाद न्यायाधिकरण के गठन का प्रावधान है। इसकी कई शाखाएं हो सकती हैं। सभी मौजूदा न्यायाधिकरणों को भंग कर दिया जाएगा और जो मामले लंबित पड़े होंगे, उन्हें नए गठित न्यायाधिकरण में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
  • न्यायाधिकरण को निर्णय हेतु प्रदत्त समय
    विधेयक के तहत प्रस्तावित न्यायाधिकरण को दो वर्षों में किसी विवाद पर निर्णय देना होगा। इसे अधिकतम एक वर्ष के लिए और बढ़ाया जा सकता है। जबकि अधिनियम, 1956 के तहत न्यायाधिकरण को तीन वर्ष की अवधि में फैसला देना होता है। इसे अधिकतम दो वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकता है। यदि राज्य द्वारा पुनः विचार हेतु मामले को न्यायाधिकरण के पास भेजा जाता है, तो उसे एक वर्ष के अंदर रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपनी होगी। इस एक वर्ष की अवधि को केंद्र सरकार उस अवधि तक के लिए बढ़ा सकती है, जो उसे जरूरी लगे। विधेयक, 2017 के अनुसार, यह अवधि अधिक से अधिक 6 महीने हो सकती है।
  • गजट में निर्णय का प्रकाशन जरूरी नहीं
    विधेयक में न्यायाधिकरण के निर्णय को सरकारी गजट में प्रकाशित करने के प्रावधान को हटा दिया गया है। न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम और विवाद में शामिल सभी पक्षों के लिए बाध्यकारी होगा। इसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के समान ही लागू माना जाएगा। जबकि अधिनियम, 1956 के तहत न्यायाधिकरण का निर्णय सरकारी गजट में प्रकाशित करने का प्रावधान है।
  • डेटा बैंक और सूचना प्रणाली
    इस विधेयक के तहत केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक नदी बेसिन से जुड़े डेटा बैंक और सूचना प्रणाली का रख-रखाव करने के लिए एक एजेंसी को नियुक्त या अधिकृत करेगी।
  • केंद्र सरकार को अतिरिक्त अधिकार
    यह विधेयक, केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि जल की कमी के कारण उत्पन्न होने वाली तनावपूर्ण स्थिति में वह जल वितरण से संबंधित नियम बना सकती है।
  • निष्कर्ष
    वैश्विक तापन के कारण मीठे जल की कमी तथा लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण जल की मांग में भी लगातार वृद्धि होती जा रही है। नदियां मीठे पानी की प्रमुख स्रोत हैं। चूंकि देश की अधिकतर नदियां एक से अधिक राज्यों से होकर प्रवाहित होती हैं, अतः प्राकृतिक ढाल के अनुसार निचले राज्यों को अधिक पानी प्राप्त होता रहा है। लेकिन ऊपरी राज्यों द्वारा इन नदियों पर बांध का निर्माण कर जल के प्रवाह को रोकने से विवाद की स्थिति उत्पन्न होने लगी है। कई नदियों के जल बंटवारे को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है। ऐसी स्थिति में संशोधन विधेयक, 2017 द्वारा अधिनियम 1956 की कुछ खामियों को दूर करने का प्रयास किया गया है। उम्मीद है कि इससे विवादों के शीघ्र एवं न्यायपूर्ण निपटान में मदद मिलेगी।

लेखक-‘काली शंकर ’शारदेय’


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