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एस्ट्रोसैट का सफल प्रक्षेपण

November 14th, 2015
Astrosat successfully launched
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मनुष्य का जिज्ञासु स्वभाव उसे प्रकृति प्रदत्त है। मनुष्य का यही स्वभाव ब्रह्मांडीय घटनाओं के प्रति उसके औत्सुक्य को जगाता है। मनुष्य पिछली सदी तक केवल प्रकाश किरण रूपी खिड़की से ही अंतरिक्ष के नजारों को देखने में समर्थ था। वर्ष 1609 में गैलीलियो ने आकाशीय पिंडों के प्रेक्षण के लिए पहली बार एक दूरबीन का प्रयोग किया। दरअसल, खगोलीय घटनाओं के प्रेक्षण का आधार इन खगोलीय पिंडों से निकला विकिरण होता है, जिसे दूरबीनें अभिग्रहित करती हैं तथा उसके अनुसार उस ब्रह्मांडीय पिंड के विषय में जानकारी देती हैं। ब्रह्मांड सभी तरह के विकिरणों का उत्सर्जन करता है तथा इन विकिरणों में से बहुत थोड़े ही विकिरण हमारी पृथ्वी तक पहुंच पाते हैं। विभिन्न प्रकार के विद्युत चुंबकीय विकिरणों में प्रमुख हैं :- पराबैंगनी, अवरक्त, एक्स-किरण, गामा किरण इत्यादि। ये सभी विकिरण हमारी पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाते हैं। हमारी पृथ्वी का वायुमंडल कुछ प्रकार के विकिरणों को बाहर ही रोक देता है तथा कुछ ही विकिरणों को प्रविष्ट होने की अनुमति देता है। सौभाग्यवश, पृथ्वी में जीवन के अस्तित्व को कायम रखने के लिए पृथ्वी का वायुमंडल हानिकारक उच्च-ऊर्जा विकिरणों यथा एक्स-किरणों, गामा-किरणों तथा पराबैंगनी विकिरणों को प्रवेश से रोक देता है। पृथ्वी का वायुमंडल अधिकांश अवरक्त विकिरणों को भी अवशोषित कर लेता है। लेकिन इसके विपरीत दृश्य प्रकाश व रेडियो तरंगें हमारे वायुमंडल के आर-पार बड़ी आसानी से गुजर सकती हैं जिनके अध्ययन हेतु पृथ्वी पर दूरबीनों एवं वेधशालाओं को सामान्यतः ऊंचे स्थानों अथवा पहाड़ के ऊपर स्थापित किया जाता है जिससे ये वायुमंडल के अधिक से अधिक भाग का प्रेक्षण कर सकें। इस प्रकार पृथ्वी पर स्थित दूरबीनों से ब्रह्मांड के विषय में हमें जो भी जानकारी प्राप्त होती है, वह ब्रह्मांडीय पिंडों के द्वारा उत्सर्जित दृश्य प्रकाश एवं रेडियो तरंगों से ही प्राप्त होती है। लेकिन ब्रह्मांड में ऐसे पिंड भी हैं जो बहुत ही अल्प मात्रा में दृष्य प्रकाश या रेडियो तरंगों का उत्सर्जन करते हैं, अतः ऐसे पिंडों का अवरक्त अथवा एक्स-विकिरण में खगोलिकी सर्वेक्षण करने के लिए दूरबीनों को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करना आवश्यक हो जाता है।

  • नासा का ग्रेट ऑब्जर्वेटरीज कार्यक्रम
    चूंकि आरंभ में ऐसी एक दूरबीन विकसित करना संभव नहीं था जो भिन्न-भिन्न तरंग-दैर्ध्यों (Wave-Lenths) के विकिरणों पर एक -साथ कार्य कर सके, इसलिए ऐसी अलग-अलग अंतरिक्ष दूरबीनों के विकास की आवश्यकता महसूस हुई जिनसे विद्युत-चुंबकीय स्पेक्ट्रम के भिन्न-भिन्न तरंग-दैर्ध्य के विकिरणों (पराबैंगनी दृश्य प्रकाश, गामा तथा अवरक्त आदि) का प्रेक्षण किया जा सके। इसी आवश्यकता के मद्देनजर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने ‘ग्रेट ऑब्जर्वेटरीज कार्यक्रम’ (Great Observatories Program) के अंतर्गत चार अंतरिक्ष दूरबीनों का प्रमोचन किया। इस कार्य की पहली कड़ी थी ‘हब्बल स्पेस टेलिस्कोप’ (HST : Hubble Space Telescope), जिसका प्रमोचन 24 अप्रैल, 1990 को किया गया था। इसकी क्षमता को बढ़ाने तथा इसकी त्रुटियों को ठीक करने के लिए पांच बार, वर्ष 1993, 1997, 1999, 2002 एवं 2009 में अंतरिक्ष में ही इसकी मरम्मत की जा चुकी है। इसी वर्ष 24 अप्रैल को हब्बल दूरबीन ने अपने कार्यकाल के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं और नासा की योजना इसको कम से कम वर्ष 2020 तक संचालित रखने की है। हब्बल दूरदर्शी दृश्य प्रकाश, निकट पराबैंगनी (Near Ultraviolet) तथा निकट अवरक्त (Near Infrared) तरंगदैर्ध्य पर कार्य करता है। इसके बाद 5 अप्रैल, 1991 को ‘कॉम्पटन गामा-किरण प्रेक्षणशाला’ (Compton Gamma Ray Observatory) को प्रमोचित किया गया। इसे यह नाम विश्वविख्यात भौतिकशास्त्री डॉ. आर्थर होली कॉम्पटन (Dr. Arthur Holly Compton) के सम्मान में दिया गया है। यह वेधशाला 4 जून, 2000 तक संचालित रही तथा इसे मुख्यतः गामा किरणों के प्रेक्षण के लिए प्रक्षेपित किया गया था। तीसरी प्रेक्षणशाला ‘चंद्रा एक्स-किरण प्रेक्षणशाला’ (CXO : Chandra X-Ray Observatory) थी, जिसका अंतरिक्ष में प्रमोचन 23 जुलाई, 1999 को किया गया। यह दूरबीन एक लंबी अंडाकार कक्षा में पृथ्वी का चक्कर लगाते हुए ब्रह्मांड के एक्स-रे स्रोतों की खोज करने के लिए बनी है। भारतीय मूल के प्रख्यात अमेरिकी वैज्ञानिक सुबह्मण्यम चंद्रशेखर के नाम पर इसका नामकरण किया गया है और यह अब भी कार्यरत है। नासा के ग्रेट ऑब्जर्वेटरीज कार्यक्रम की अंतिम कड़ी ‘स्पित्जर अंतरिक्ष दूरबीन’ (Spitzer Space Telescope) जिसका प्रमोचन 25 अगस्त, 2003 को हुआ। मुख्यतः अवरक्त विकिरणों के प्रेक्षण के लिए बनी यह दूरबीन भी अभी कार्यरत है। इसी के साथ नासा के उपर्युक्त वर्णित कार्यक्रम का समापन हुआ और नासा ने ऐसी 4 वेधशालाओं का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया, जिनमें से प्रत्येक ब्रह्मांड का एक अलग तरह के प्रकाश यथा दृश्य, गामा किरण, एक्स किरण तथा अवरक्त में अवलोकन करने में सक्षम थी।
    जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है कि नासा की योजना हब्बल दूरबीन को वर्ष 2020 तक संचालित रखने की है, अतः वर्ष 2020 के बाद हब्बल के उत्तराधिकारी के रूप में कार्य करने हेतु नासा ने एक अत्यधिक नवीनतम और उच्च कोटि की दूरबीन की योजना बनाई है। इस दूरबीन का नाम है-‘जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन’ (JWST : James Webb Space Telescope)। यह नाम नासा के द्वितीय प्रशासक ‘जेम्स ई. वेब’ के सम्मान में रखा गया है। उल्लेखनीय है कि जेम्स वेब के कार्यकाल में 75 से भी अधिक अन्वेषण प्रमोचन किए गए। अपोलो परियोजनाओं के कार्यान्वयन में उनका बहुत बड़ा हाथ था तथा उन्हीं के कार्यकाल में नील आर्मस्ट्रांग (चंद्रमा पर मानव का प्रथम पदार्पण) चंद्रमा की सतह पर उतरे। जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन एक विशालकाय अवरक्त दूरबीन (Infrared Telescope) है जो हब्बल दूरबीन द्वारा प्रारंभ किए गए वैज्ञानिक अभियानों को चालू रखेगी। इसका प्रमोचन अक्टूबर, 2018 में अनेक प्रकार के खगोलीय अध्ययनों जैसे तारों और आकाश गंगाओं का आविर्भाव, तारों एवं ग्रहों के बनने की प्रक्रिया इत्यादि के लिए प्रस्तावित है।
  • अंतरिक्ष वेधशाला और भारत
    भारतीय खगोलविद अब तक पृथ्वी पर स्थापित दूरबीनों से ही ब्रह्मांड की हलचलों पर नजर रखते आए हैं। भारत में जमीन पर निर्मित वेधशालाएं दशकों से काम कर रही हैं। इनमें पुणे के निकट स्थित ‘जायंट मीटरवेव रेडियो टेलिस्कोप’ (GMRT : Giant Metrewave Radio Telescope) और लद्दाख की ‘इंडियन एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी’ (Indian Astronomical Observatory) दुनिया भर में जाना-माना नाम है। ब्रह्मांड से आने वाले दृश्य प्रकाश, रेडियो और कुछ सीमा तक अवरक्त विकिरण का अध्ययन इनसे आसानी से किया जा सकता है, लेकिन पराबैंगनी, गामा, एक्स एवं वाई किरणों के एक विस्तृत बैंड का अध्ययन इनके द्वारा संभव नहीं है। इन ब्रह्मांडीय किरणों से संबंधित अध्ययन के लिए ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (ISRO) अभी तक विदेशी संसाधनों जैसे हब्बल पर ही निर्भर रहा है।
    अब तक खगोलीय पिंडों के अध्ययन हेतु पूर्णतः समर्पित भारत की कोई वेधशाला अंतरिक्ष में स्थापित नहीं थी, हालांकि इसरो ने अपने उपग्रहों के साथ कुछ ऐसे उपकरण अंतरिक्ष में भेजे हैं जो ब्रह्मांड से उत्सर्जित उच्च ऊर्जा के विकिरणों का अध्ययन करने मे सक्षम थे। वर्ष 1975 में प्रक्षेपित भारत के प्रथम उपग्रह आर्यभट्ट के साथ कॉस्मिक एक्स किरण, सौर-न्यूट्रॉन एवं गामा किरणों का मापन करने के लिए तीन प्रयोगात्मक पेलोड थे। इसके बाद मई, 1994 में एएसएलवी डी-4 द्वारा छोड़ा गया ‘श्रॉस-सी2’ (SROSS-C2) उपग्रह अपने साथ ‘गामा किरण प्रस्फोट संसूचक’ (Gamma Ray Burst Detector) नामक नीतिभार ले गया था। फिर वर्ष 1996 में इसरो ने ‘आईआरएस-पी3’ (IRS-P3) नाम का एक उपग्रह प्रक्षेपित किया था जिसके साथ एक उपकरण ऐसा भी था जो ब्रह्मांड से निकलने वाली एक्स-किरणों का अध्ययन कर उनके स्रोत के बारे में जानकारी जुटा सकता था।
  • और अब एस्ट्रोसैट
    वर्ष 1996 में आईआरएस-पी3 उपग्रह के साथ भेजे गए ‘इंडियन एक्स-रे एस्ट्रोनॉमी एक्सपेरिमेंट’ (IXAE : Indian X-ray Astronomy Experiment) की सफलता के पश्चात इसरो ने दूरबीन उपग्रह (Telescope Satellite) के निर्माण पर विचार करना प्रारंभ किया और केंद्र सरकार ने इसरो के इस प्रस्ताव को वर्ष 2004 में मंजूरी प्रदान कर दी। तय समय सीमा के हिसाब से यह उपग्रह वर्ष 2010 में छोड़ा जाना था लेकिन इसकी तकनीकी जटिलताओं और दर्जनों संस्थानों के इससे संबद्ध होने की वजह से परियोजना में देर होती रही।
    लेकिन अंततः 28 सितंबर, 2015 को लंबे इंतजार के बाद लांच हो गई अंतरिक्ष में ‘एस्ट्रोसैट’ (ASTROSAT) नामक भारतीय दूरबीन। सात वर्ष पहले इसरो ने चंद्रमा का अध्ययन करने के लिए चंद्रयान-1 का प्रक्षेपण किया था, उसके बाद वर्ष 2013 में मंगलयान छोड़ा गया। इसरो के ये दोनों अभियान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में मील का पत्थर हैं और अब इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इसरो ने एस्ट्रोसैट नामक ‘भारत का पहला खगोलीय मिशन’ (India’s First Astronomical Mission) प्रक्षेपित किया है। उल्लेखनीय है कि चंद्रयान और मंगलयान जैसी परियोजनाओं की जब योजना बनाई गई थी, तब ये मूलतः ‘प्रौद्योगिकी-प्रदर्शन’ (Technology-demonstration) परियोजनाएं थी। हालांकि इन मिशनों में वैज्ञानिक घटक (Science component) भी सम्मिलित था, परंतु ये मिशन मुख्य रूप से अंतरिक्ष में भारत के गहन अन्वेषण का आधार निर्मित करने के लिए प्रक्षेपित किए गए थे। इनके अतिरिक्त पिछले तीन दशकों के दौरान इसरो ने जो विभिन्न अन्य उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं वो मुख्यतः रिमोट सेंसिंग, संचार, मैपिंग, नेविगेशन आदि अनुप्रयोगों तक ही सीमित थे, लेकिन एस्ट्रोसैट भारत का पहला ऐसा मिशन है जो पूरी तरह ‘खगोलीय परिघटनाओं’ (Astrono-mical phenomena) के अध्ययन हेतु समर्पित है।
    28 सितंबर, 2015 को श्रीहरिकोटा स्थित ‘सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र शार’ (SDSC SHAR) के प्रथम लांच पैड से भारत के ‘ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (मिशन : PSLV-C30) ने उड़ान भरने के बाद महज 22 मिनट एवं 32 सेकंड में 650 किमी. की दूरी तय कर एस्ट्रोसैट को पृथ्वी की निर्दिष्ट कक्षा में स्थापित करने में अहम कामयाबी हासिल कर ली। विश्व के सबसे विश्वसनीय प्रक्षेपण वाहनों में से एक पीएसएलवी की यह कुल 31वीं उड़ान थी। यह बताना लाजिमी है कि इस यान की 31 में से पिछली लगातार 30 उड़ानें कामयाब रही हैं। सद्यः उड़ान में पहले चरण के 6 स्ट्रैप-ऑन-मोटरों’ (Strap-on Motors) के साथ ध्रुवीय रॉकेट के सबसे भारी ‘एक्सएल’ (XL) संस्करण का प्रयोग किया गया। यह भी उल्लेखनीय है कि PSLV-C30XL प्रारूप में ध्रुवीय रॉकेट की कुल 10वीं उड़ान थी।
    ध्रुवीय रॉकेट के चौथे चरण से अलग होने के तुरंत बाद एस्ट्रोसैट के दो सौर पैनल स्वतः ही तैनात हो गए और बंगलुरू स्थित इस्ट्रैक (ISTRAC : ISRO Telemetry, Tracking and Command Network) के मिशन संचालन परिसर (Mission Operations Complex) स्थित अंतरिक्षयान नियंत्रण केंद्र ने एस्ट्रोसैट का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। उल्लेखनीय है कि ध्रुवीय रॉकेट ने एस्ट्रोसैट को भूमध्य रेखा से 6 डिग्री के कोण पर झुकी हुई 644.6 × 651.5 किमी. की कक्षा में स्थापित किया है जो अंतिम लक्ष्यित कक्षा के बहुत निकट है।
  •  क्यों खास है एस्ट्रोसैट?
    वैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो एस्ट्रोसैट खगोलीय घटनाओं के अध्ययन को पूर्णतः समर्पित ‘भारत की पहली बहु-तरंगदैर्ध्य अंतरिक्ष वेधशाला’ (India’s First multi-wave length Space Observatory) है, यानी अंतरिक्ष में स्थित ऐसी वेधशाला जो ब्रह्मांड के कोने-कोने से आने वाली अलग-अलग तरंगदैर्ध्य वाली किरणों का अध्ययन कर उनके स्रोत के बारे में जानकारी जुटाती है। इसरो के अनुसार, अपने पांच पेलोड के साथ एस्ट्रोसैट एक ही समय में विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम के दृश्य प्रकाश, पराबैंगनी तथा निम्न एवं उच्च ऊर्जा वाले एक्स-विकिरण क्षेत्रों में ब्रह्मांड को देख पाने में सक्षम है। यही क्षमता इसे अपने पूर्ववर्ती दूरदर्शियों से अलग करती है। किसी भी वैश्विक अंतरिक्ष आधारित दूरदर्शी में इस तरह की खूबियां नहीं हैं। एस्ट्रोसैट की मदद से ब्रह्मांड के कई नए राज खुलेंगे। इसकी मदद से भारत के वैज्ञानिक अंतरिक्ष में पाई जाने वाली तमाम किस्म की किरणों और पिंडों के बारे में पुख्ता जानकारी हासिल कर पाएंगे। यही नहीं, ब्लैक होल, आकाशगंगाएं और तारे किस तरह बनते और नष्ट होते हैं, इसका भी अध्ययन हो पाएगा।
    अंतरिक्ष में सक्रिय हुई इस एस्ट्रोसैट नामक दूरबीन को अमेरिकी अंतरिक्ष वेधशाला ‘हब्बल’ का लघु संस्करण कहा जा रहा है। हब्बल को नासा ने वर्ष 1990 में अंतरिक्ष में स्थापित किया था जो पिछले 25 वर्षों से लगातार सक्रिय है जबकि एस्ट्रोसैट की मिशन अवधि पांच वर्ष है। हब्बल की तुलना में एस्ट्रोसैट का वजन और लागत दोनों काफी कम है। एस्ट्रोसैट का कुल वजन 1513 किग्रा. है, तो हब्बल का वजन एस्ट्रोसैट से 10 गुना ज्यादा यानी 15000 किग्रा. है। इसकी कुल लागत 178 करोड़ रुपये आई वहीं हब्बल के निर्माण में कुल ढाई अरब डॉलर यानी लगभग 195 अरब रुपये की लागत आई। जहां नासा ने हब्बल के विकास और प्रक्षेपण के लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का सहयोग लिया, वहीं इसरो ने स्वयं के संसाधनों से देश में ही एस्ट्रोसैट का निर्माण किया और अपने ही अंतरिक्षयान पीएसएलवी-सी30 के जरिए इसे प्रक्षेपित किया।

एस्ट्रोसैट के साथ प्रक्षेपित विदेशी उपग्रह

1.  लापन-ए2 (LAPAN-A2) इंडोनेशिया के ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस’ (LAPAN) का एक माइक्रो-उपग्रह (Microsatellite) है जो ‘ऑटोमेटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम’ (AIS) द्वारा समुद्री निगरानी (Maritime Surveillance) हेतु प्रक्षेपित किया गया है।

2.   एनएलएस-14 (ईवी9) [NLS-14 (Ev9) ]यह कनाडा के ‘यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो इंस्टीट्यूट फॉर एड्वांस्ड स्टडीज’ की स्पेस फ्लाइट लेबोरेटरी का एक नैनो उपग्रह है। यह भी समुद्र की निगरानी करने वाला उपग्रह है।

3.   अमेरिकी के सैन फ्रांसिस्को स्थित स्पायर ग्लोबल इंक द्वारा निर्मित चार लेमूर (LEMUR) नैनो उपग्रह वास्तव में गैर-दृश्य (Non-Visual) सुदूर संवेदी (Remote Sensing) उपग्रह हैं जिनका प्रमुख उद्देश्य ‘ऑटोमेटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम’ (AIS) के जरिए जलपोतों पर नजर रखते हुए समुद्री खुफिया जानकारी जुटाना है।

  • एस्ट्रोसैट के निर्माण में इसरो सहित खगोल विज्ञान के क्षेत्र में संलग्न देश के सभी प्रमुख संस्थानों यथा पुणे स्थित ‘खगोलशास्त्र एवं खगोलभौतिकी अंतर्विश्वविद्यालय केंद्र’ (IUCAA), मुंबई स्थित ‘टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान’ (TIFR) बंगलुरु स्थित ‘भारतीय ताराभौतिकी संस्थान’ (IIAP) तथा बंगलुरू में ही स्थित ‘रामन अनुसंधान संस्थान’ (RRI) की भागीदारी रही है। इनके अतिरिक्त भारत के ही कुछ विश्वविद्यालयों और यू.के. स्थित लीसेस्टर विश्वविद्यालय एवं कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी (Canadian Space Agency) ने भी एस्ट्रोसैट के निर्माण में सहयोग दिया है। सद्यः मिशन के तहत, पीएसएलवी-सी30 रॉकेट के जरिए छोड़ा गया एस्ट्रोसैट अपने साथ 6 विदेशी उपग्रह भी ले गया है। इन छह उपग्रहों में दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका के चार नैनो उपग्रह भी शामिल हैं। ये उपग्रह सैन फ्रांसिस्को की कंपनी ‘स्पायर ग्लोबल इंक’ (Spire Global Inc) द्वारा निर्मित हैं। यह भी कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है। इसरो वैसे तो अभी तक कई देशों के उपग्रह प्रक्षेपित कर चुका है, लेकिन यह पहला अवसर है जब उसने अमेरिका के व्यावसायिक उपग्रहों को प्रक्षेपित किया। अमेरिका के 4 नैनो उपग्रहों के साथ ही इसरो ने कनाडा और इंडोनेशिया का भी एक-एक उपग्रह इस मिशन के तहत प्रक्षेपित किया। ताजा प्रक्षेपण के साथ ही इसरो द्वारा अब तक अंतरिक्ष में भेजे गए विदेशी उपग्रहों की कुल संख्या 51 हो गई है। इसके ग्राहकों में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस समेत कुल 20 देश शामिल हैं। वर्ष 1994 से 2015 तक की अवधि के दौरान पीएसएलवी की 30 सफल उड़ानों के माध्यम से इसरो ने 51 विदेशी उपग्रहों सहित कुल 84 उपग्रहों का प्रमोचन किया है। सद्यः मिशन के तहत पीएसएलवी के साथ लांच किए गए सातों उपग्रहों का कुल वजन लगभग 1631 किग्रा. है।

एस्ट्रोसैट के वैज्ञानिक पेलोड

एस्ट्रोसैट पर सुदूर खगोलीय पिंडों के अध्ययन के लिए पांच विशेषज्ञ उपकरण लगे हुए हैं। ये उपकरण हैंः-

1.  यूवीआईटी (UVIT : Ultraviolet Imaging Telescope)

2.  एलएएक्सपीसी (LAXPC : Large Area X-Ray Proportional Counter)

3.  एसएक्सटी (SXT  : Soft X-ray Telescope)

4.   सीजेडटीआई (CZTI : Cadmium Zinc Telluride Imager)

5.   एसएसएम (SSM : Scanning Sky Monitor)

  • एस्ट्रोसैट के सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत ऐसा पहला विकासशील देश बन गया है, जिसका अंतरिक्ष में अपना टेलिस्कोप है। भारत की कामयाबी इसलिए भी खास मायने रखती है क्योंकि यह काबिलियत यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के अलावा अभी तक अमेरिका जापान और रूस जैसे देशों के पास ही थी। भारत का पड़ोसी देश चीन अभी अपनी पहली अंतरिक्ष दूरबीन ‘हार्ड एक्स-रे मॉड्युलेशन टेलिस्कोप’ (Hard X-ray Modulation Telescope) के निर्माण की प्रक्रिया में ही है। जाहिर है अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में देश के लिए यह सचमुच एक बड़ी कामयाबी है। इस कामयाबी से देश में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में रहने वाले हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो गया है।

लेखक-सौरभ मेहरोत्रा


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