सम-सामयिक घटना चक्र | Railway Solved Paper Books | SSC Constable Solved Paper Books | Civil Services Solved Paper Books
Contact Us: 0532-246-5524,25, M: -9335140296 Email: [email protected]

आतंक का निर्धारण, उभरती प्रतिक्रियाएं (साभार द हिंदू एडिटोरियल 19 नवंबर, 2015)

मूल लेखक- राकेश सूद

13 नवंबर, 2015 को शुक्रवार के दिन फ्रांस में 26/11 जैसी घटना घटित हुई। तीन घंटे की अंधाधुंध गोलीबारी के दौरान 129 लोगों की मृत्यु हो गई और रोशनी का शहर आतंक के अंधकार से ढक गया। इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली तथा भविष्य में ऐसे और हमलों की धमकी भी दी। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने इसे एक युद्ध की घटना करार दिया और आतंकवादियों को इस हमले का जवाब देने में किसी भी तरह की दया न दिखाने का संकल्प लिया। देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया तथा फ्रांस की सीमाओं के आस-पास गतिविधियां कम कर दी गईं।
इस घटना के पश्चात विश्व भर से सहानुभूति प्रकट की गई। विश्व भर के सभी प्रमुख स्मारकों को फ्रांस के रंगों से प्रकाशित किया गया। तुर्की में जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान नेताओं ने इस घटना के शिकार लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक मिनट का मौन धारण किया तथा आतंकवाद से निपटने के लिए एक बार फिर अपने प्रयासों को मजबूती प्रदान करने और उन्हें समन्वित करने का प्रण लिया।
11 वर्ष पहले, मार्च-2004 में मैड्रिड में चार पैसेंजर ट्रेनों में हुए शृंखलाबद्ध बम धमाकों में जब 191 निर्दोष लोगों की जानें चली गईं थी तब भी विश्व भर के लोगों ने इसी तरह से अपना रोष प्रकट किया था। 21 लोगों को इस घटना का दोषी ठहराया गया था। इस घटना के एक वर्ष बाद जुलाई, 2005 में लंदन में तीन भूमिगत रेलवे लाइनों तथा एक बस में हुए आत्मघाती हमलों में 56 लोगों की मृत्यु हो गई थी और उस समय भी विश्व ने लंदन के लोगों के प्रति सहानुभूति प्रकट की थी। हालांकि इन सब कथनों एवं घोषणाओं के बावजूद आतंकवाद के विरुद्ध समन्वित कार्यवाही का अभाव रहा है।
पेरिस के मामले में हाल के वर्षों में एक नहीं बल्कि ऐसी दो घटनाएं हुई थीं जिनके कारण पेरिस को आतंकवाद के प्रति सजग रहने की चेतावनी मिली थी। इस वर्ष जनवरी में दो भाइयों शेरिफ एवं सईद काउची ने एक जानी-मानी साप्ताहिक व्यंग्यात्मक पत्रिका शार्ली ऐब्दो के पेरिस स्थित कार्यालय पर हमला कर पत्रिका के संपादक सहित 12 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। हमलावर पत्रिका में छपे पैगंबर मुहम्मद के कार्टून से नाराज थे। जब अपराधियों की खोज-बीन शुरू हुई, तो इन दोनों भाइयों एवं इनके एक सहयोगी एमिडी कौलिबली को फ्रांस की पुलिस ने मार गिराया। यमन में स्थित अल-कायदा आतंकवादी संगठन ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली। बाद में हुई गहन जांच में हमलावरों के ब्रुसेल्स स्थित आतंकी नेटवर्क से संपर्क का पता चला जिन्होंने हमलावरों को हथियार मुहैया कराने में भूमिका निभाई थी।
मार्च, 2012 में मोहम्मद मेराह ने तुलूज एवं मोंतउबन में तीन अलग-अलग घटनाओं में फ्रांसीसी सैनिकों एवं यहूदी बच्चों को मौत के घाट उतार दिया, बाद में वह पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। अल-कायदा ने इस हमले की जिम्मेदारी ली। मेराह को उसकी पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान की यात्राओं के दौरान उग्रवादी बनाया गया था। बाद में इस बात का खुलासा हुआ कि पेरिस में भारतीय दूतावास एवं एयर इंडिया कार्यालय को निशाना बनाने के लिए लश्कर-ए-तैयबा आतंकी संगठन उससे संपर्क में था। इसे एकल आतंकी हमले की संज्ञा दी गई जो पश्च दृष्टि से उस समस्या का न्यून आकलन लग रहा है जिसका फ्रांस सामना कर रहा है।
यूरोपीय देशों में से फ्रांस में अप्रवासियों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है, जो अधिकतर मगरेब तथा अफ्रीका में उसके पूर्व-उपनिवेशों से उत्पन्न है। हालांकि फ्रांस में जनगणना में धर्म को शामिल नहीं किया जाता, लेकिन फिर भी ऐसा अनुमानित है कि फ्रांस में मुसलमानों की संख्या लगभग 60 लाख है जो समग्र जनसंख्या का करीब 10 प्रतिशत है।
पहली पीढ़ी के प्रवासी, जिनका ध्यान पूरी तरह से आर्थिक प्रगति पर केंद्रित था, उनसे अलग दूसरी पीढ़ी के प्रवासी उग्रवादीकरण के प्रति अधिक संवेदनशील थे। ऐसा विशेष रूप से वर्ष 2003 में इराक पर अमेरिकी आक्रमण के बाद अधिक परिलक्षित हुआ था। हालांकि फ्रांस ने इस अमेरिकी हमले का विरोध किया था, लेकिन फ्रांस दृढ़तापूर्वक पश्चिमी खेमे में ही दिखाई पड़ा था।
राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी तथा फ्रांस्वा ओलांद द्वारा लीबिया, माली और अब सीरिया में अनुकरण की गई मजबूत हस्तक्षेप की नीतियों ने भी मुसलमान युवाओं का मन भटकाने में योगदान दिया। वर्ष 2008 के आर्थिक संकट के बाद फ्रांस में बेरोजगारी में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई लेकिन मुसलमानों में बेराजगारी दर इसकी लगभग दोगुनी थी। कुछ शहरी संकुलनों जैसे-पेरिस, मार्सैय तथा तुलूज के आस-पास मुसलमान समुदायों की सघनता के कारण मस्जिदों के नेटवर्क एवं इंटरनेट कैफे के माध्यम से उन्हें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, यमन, इराक और अब सीरिया के जिहादी नेटवर्क से जोड़ा गया। ऐसा अनुमान है कि वर्तमान में एक हजार से अधिक फ्रांसीसी नागरिक इस्लामिक स्टेट के आतंकी के रूप में सीरिया पलायन कर चुके हैं, जो किसी भी यूरोपीय देश की तुलना में सर्वाधिक संख्या है, इसके अतिरिक्त केवल यूके से ही इतनी संख्या में नागरिक आईएस में शामिल हुए हैं।
फ्रांस में वर्ष 2004 में लागू हुए एक कानून के अनुसार, सार्वजनिक संस्थानों में धार्मिक चिह्नों के आडंबरपूर्ण प्रदर्शन पर रोक है। इस कानून की वजह से भी मुसलमान जनसंख्या के एक हिस्से में विराग पैदा हो गया क्योंकि यह हिजाब को धारण करने पर रोक लगाता है।
जब फ्रांस में उग्रवादीकरण की घटनाएं बढ़ीं, तो बाहरी उग्रवादी संस्थाओं से संपर्क में रहे व्यक्तियों एवं संगठनों की निगरानी के लिए सुरक्षा एजेंसियों को अतिरिक्त शक्ति प्रदान करने के लिए नए कानून लागू किए गए। शीर्ष मुसलमान समुदाय के नेताओं तथा मौलवियों से संवाद स्थापित करने के लिए प्रधानमंत्री मैन्युएल वाल्स के स्तर पर उच्च-श्रेणी की पहलें की गईं।
हालांकि इन सब परंपरागत नीतिगत उपायों के बावजूद मुस्लिम जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को विरक्ति से रोका नहीं जा सका। इसका एक कारण यह था कि ये नीतियां राष्ट्रीय सीमाओं के अंतर्गत संचालित की गईं तथा यह वैश्विक जिहाद की विचारधारा के आग्रह को संज्ञान में लेने में विफल रहीं।

अनुवादक
सौरभ मेहरोत्रा