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IRNSS-1C उपग्रह की सफल स्थापना

December 13th, 2014
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वर्ष 2014 के अक्टूबर माह की 16 तारीख अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत के लिए बेहद खास रही। इस दिन भारत ने अपने तीसरे नैविगेशन उपग्रह IRNSS-1C का सफल प्रक्षेपण ध्रुवीय रॉकेट के 28वीं उड़ान (पीएसएलवी-सी26) के जरिए श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया। 16 अक्टूबर को भारतीय समयानुसार 1 बजकर 32 मिनट पर 44.4 मीटर लंबे पीएसएलवी-सी26 रॉकेट ने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के ‘फर्स्ट लांच पैड’ (First Launch Pad) से IRNSS-1C उपग्रह के साथ उड़ान भरी और आसमान के स्याह कैनवस पर गहरे सुनहरे रंग की ज्वाला का चित्र सा बन गया। लिफ्ट ऑफ के करीब 20 मिनट 18 सेकंड पश्चात ध्रुवीय रॉकेट ने 1425.4 किग्रा. वजनी IRNSS-1C उपग्रह को 282.56 किमी.× 20,670 किमी. की दीर्घवृत्ताकार कक्षा (Elliptical Orbit) में स्थापित कर दिया। दीर्घवृत्ताकार कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित होने के पश्चात उपग्रह के सौर पैनल स्वतः ही खुल गए और इसरो की हासन, कर्नाटक स्थित ‘मुख्य नियंत्रण सुविधा’ (Master Control Facility) ने उपग्रह का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। मुख्य नियंत्रण सुविधा द्वारा उपग्रह से संलग्न मोटर (Apogee Motor) को 17 अक्टूबर से लेकर 19 अक्टूबर के बीच 4 बार दागा गया और इस प्रकार उपग्रह के कक्षोन्नयन (Orbit raising) की प्रक्रियाएं संपन्न हुईं। उपग्रह की कक्षा का उन्नयन कर उसे वांछित भू-स्थिर कक्षा (Geostationary Orbit) में 83 डिग्री पूर्वी देशांतर पर स्थापित कर दिया गया।

उल्लेखनीय है कि IRNSS-1C उन 7 उपग्रहों की शृंखला में से तीसरा उपग्रह है, जिन्हें ‘भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली’ (Indian Regional Navigation Satellite System) को पूर्णतया संचालित करने के लिए छोड़ा जाना है। इसके पूर्व भारतीय नैविगेशन प्रणाली के पहले उपग्रह IRNSS-1A की सफल स्थापना ध्रुवीय रॉकेट की 24वीं उड़ान (PSLV-C22) द्वारा 1 जुलाई, 2013 को की गई थी। इसी क्रम में भारत ने अपने दूसरे नैविगेशन उपग्रह IRNSS-1B का प्रक्षेपण 4 अप्रैल, 2014 को ध्रुवीय रॉकेट के 26वीं उड़ान (मिशन PSLV-C24) के जरिए किया था। IRNSS-1A तथा IRNSS-1B दोनों ही उपग्रह अपनी निर्दिष्ट भू-समकालिक कक्षाओं से संतोषजनक ढंग से कार्य कर रहे हैं।

सातवीं बार PSLV के XL संस्करण का प्रयोग

सद्यः मिशन ध्रुवीय रॉकेट का लगातार 27वां सफल मिशन था। इस मिशन में PSLV के ‘एक्स-एल संस्करण’ (X-L Version : Extra Large) का इस्तेमाल किया गया था। ध्रुवीय रॉकेट के सद्यः प्रक्षेपण से पूर्व इसरो द्वारा 6 बार PSLV के XL संस्करण का इस्तेमाल सफलतापूर्वक किया गया था। PSLV के XL संस्करण के पिछले 6 प्रक्षेपणों पर एक नजर-

  • PSLV के XL संस्करण का प्रयोग पहली बार 22 अक्टूबर, 2008 को चंद्रयान-1 (मिशन PSLV-C11) को चंद्रमा की 100 किमी. की ऊंचाई वाली कक्षा में स्थापित करने के लिए किया गया था।
  • 15 जुलाई, 2011 को XL संस्करण द्वारा दूरसंचार उपग्रह GSAT-12 की 36000 किमी. की ऊंचाई वाली भू-स्थिर कक्षा में सफल स्थापना की गई।
  • 26 अप्रैल, 2012 को ध्र्रुवीय रॉकेट मिशन (PSLV-C19) ने भारत के प्रथम रडार इमेजिंग उपग्रह रीसैट-1 को स्थापित किया।
  • 1 जुलाई, 2013 को भारत के पहले नैविगेशन उपग्रह IRNSS-1A को मिशन PSLV-C22 द्वारा सफलतापूर्वक स्थापित किया गया।
  • 5 नवंबर, 2013 को PSLV के XL संस्करण (मिशन PSLV-C25) द्वारा ही भारत के मंगल मिशन का प्रक्षेपण किया गया था।
  • 4 अप्रैल, 2014 को भारत की नैविगेशन प्रणाली के दूसरे उपग्रह IRNSS-1B का सफल प्रक्षेपण (मिशन PSLV-C24) भी PSLV के XL संस्करण के जरिए ही किया गया था।

PSLV

       कोर-एलोन संस्करण     स्टैंडर्ड संस्करण        एक्स-एल संस्करण

       (बिना स्ट्रैप-ऑन मोटरों के)                          (बृहद स्ट्रैप-ऑन मोटरयुक्त)

लंबाई              44 मीटर                   44 मीटर                   44 मीटर

लिफ्ट

ऑफ               230 टन                    295 टन                      320 टन

भार

प्रणोदन       ठोस एवं तरल       ठोस एवं तरल        ठोस एवं तरल

पेलोड   630 किमी. की ऊंचाई वाली                    630 किमी. की ऊंचाई      630 किमी. की ऊंचाई वाली

क्षमता   ध्रुवीय सूर्य-समकालिक कक्षा                   वाली ध्रुवीय सूर्य-सम-      ध्रुवीय सूर्य-समकालिक कक्षा

       में 1050 किग्रा. पेलोड को कालिक कक्षा में 1600   में 1750 किग्रा. पेलोड को,

       स्थापित करने में सक्षम  किग्रा. पेलोड को, ‘भू-स्थिर      भू-स्थिर अंतरण कक्षा में 1100

                            अंतरण कक्षा’ (GTO) में        किग्रा. पेलोड को तथा 400

                                                        1050 किग्रा. पेलोड को तथा      किमी. की ऊंचाई वाली पृथ्वी

                            400 किमी. की ऊंचाई वाली      की निम्न कक्षा में 3700 किग्रा.

                            पृथ्वी की निम्न कक्षा में        पेलोड को स्थापित करने में

                            3500 किग्रा.पेलोड को    सक्षम

                            स्थापित करने में सक्षम

सेवा में

आने का              2007                                 1993                                      2008

वर्ष

        ज्ञातव्य है कि भिन्न-भिन्न मिशनों की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं के मद्देनजर इसरो द्वारा ध्रुवीय रॉकेट के कई संस्करण विकसित किए गए हैं। वर्तमान में PSLV के निम्न तीन संस्करण परिचालन में हैं:-(i) स्टैंडर्ड संस्करण (ii) कोर एलोन (CA) संस्करण (iii) एक्स-एल संस्करण।

ज्ञातव्य है कि IRNSS-1C उपग्रह दो प्रकार के पेलोड यथा नैविगेशन पेलोड (Navigation Payload) तथा-रेंजिंग पेलोड (Ranging Payload) से लैस है। नैविगेशन पेलोड नैविगेशन सेवाओं संबंधी सिग्नलों को प्रयोक्ताओं तक पहुंचाएगा। यह पेलोड L5 बैंड (1176.45 MHz) तथा S बैंड (2492.028 MHz) पर कार्य करेगा। एक उच्च परिशुद्धता वाली ‘रूबीडियम आणविक घड़ी’ (Rubidium Atomic Clock) भी उपग्रह के नैविगेशन पेलोड का हिस्सा है। IRNSS-1C उपग्रह का रेंजिंग पेलोड C-बैंड के एक ट्रांसपोंडर से लैस है जो उपग्रह की रेंज का सही-सही पता लगाने में मददगार साबित होगा।

भारतीय नैविगेशन प्रणाली की संरचना

भारतीय नैविगेशन प्रणाली में 7 उपग्रह होंगे, जिसमें से 3 की सफल स्थापना की जा चुकी है। 3 उपग्रह 36,000 किमी. की ऊंचाई पर भू- स्थिर कक्षा में स्थापित किए जाएंगे और धरती से एक ही जगह पर स्थिर दिखाई पड़ेंगे।

शेष 4 उपग्रहों को जोड़े के रूप में (in pairs) आनत भू-समकालिक कक्षा (Inclined GSO) में छोड़ा जाएगा। तीनों उपग्रह एक निश्चित पथ पर धरती की परिक्रमा करेंगे तो शेष चारों उपग्रह धरती के परिप्रेक्ष्य में एक स्थान पर स्थिर होंगे और आंकड़ों का प्रेक्षण करते रहेंगे।

  • यह प्रणाली स्वतंत्र क्षेत्रीय नैविगेशन प्रणाली है और यह भारत भूमि और उसके आस-पास 1500 किमी. के दायरे में यथास्थिति की सूचनाएं (Position Information) प्रदान करेगी।
  • यह प्रणाली दो तरह की सेवाएं प्रदान करेगी-पहली सेवा SPS (Standard Positioning Services) है जो सभी उपयोगकर्ताओं के लिए होगी।
  • दूसरी सेवा है-RS (Restricted Services) जो मात्र अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए ही है।
  • इस प्रणाली की सफल स्थापना के साथ भारत में किसी भी स्थल की सुनिश्चित जानकारी 10 मीटर तक की शुद्धता (Accuracy) के साथ प्राप्त की जा सकेगी और भारत के सीमावर्ती समुद्री क्षेत्रों में इसकी परिशुद्धता 20 मीटर तक होगी।

भारतीय नैविगेशन प्रणाली ट्रकों, कारों, युद्धक टैंकों, समुद्री जहाजों, पनडुब्बियों, वायुयानों और प्रक्षेपास्त्रों की अवस्थिति की सटीक जानकारी प्रेषित करने में मदद करेगी। इस प्रणाली का उपयोग करके ट्रक/कार ड्राइवर, नागरिक और युद्धक विमानों के पायलट, समुद्री जहाजों के कैप्टन समुचित रूप से अपने रूटों की आयोजना कर सकेंगे, क्योंकि ये उपग्रह उन्हें अपने लक्ष्यों की ओर निर्देशित करते रहेंगे। यहां तक कि मिसाइलें भी आसानी से अपने लक्ष्यों को खोज पाने में सफल होंगी। वायुयानों की ‘सुरक्षित लैंडिंग’ के लिए तो यह सेवा अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी और इससे दुर्घटनाएं टाली जा सकती हैं।

वर्ष 2015 तक IRNSS कार्यक्रम के सभी सातों उपग्रहों के पूरी तरह से संचालित हो जाने की उम्मीद है।


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