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सह-जीवन पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ ने 21 अप्रैल, 2014 को उदय गुप्ता बनाम आयशा और अन्य के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय में एक टिप्पणी पर विचार करते हुए स्पष्टीकरण दिया है कि सह-जीवन में रहना कोई अपराध नहीं है और यदि इस दौरान सह-जीवन (लिव-इन-रिलेशन) में रह रहे स्त्री और पुरुष के संसर्ग से कोई बच्चा पैदा होता है तो वह इन दोनों की वैध संतान माना जाएगा।

न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान और न्यायमूर्ति जे. चेलेमेश्वर की खंडपीठ ने इस मामले में निम्नलिखित निर्णय दिया है-

  • इस न्यायालय ने मदन मोहन सिंह और अन्य बनाम रजनीकांत और एक अन्य (2010) के मामले में अनेक निर्णयों की समीक्षा के बाद दिए गए इस निष्कर्ष को अनुमोदित किया था कि यदि कोई स्त्री-पुरुष लंबे समय से एक साथ लिव-इन-रिलेशन अर्थात सह-जीवन के रूप में जीवन व्यतीत कर रहे हैं तब विधि उनके विवाह की उपधारणा करेगी।
  • इसे विवाह ही माना जाएगा और उनके संबंधों से जन्म लेने वाली संतान को अवैध नहीं कहा जा सकता।
  • सह-जीवन के दौरान उत्पन्न बच्चा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 16 के अंतर्गत एक धर्मज संतान के रूप में मान्य होगा। ऐसा उत्पन्न बच्चे के सामाजिक जीवन को देखते हुए विधायी प्रयोजन को प्राथमिकता देने के कारण माना गया है।
  • भारत माता और एक अन्य बनाम विजय रंगनाथन के मामले में ऐसे बच्चे की धर्मजता (Legitimacy) के बारे में विचार किया गया था।
  • ध्यातव्य है कि यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2010 में दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू के मामले में ‘सह-जीवन’ के पक्ष में निर्णय देकर इसके बारे में उठ रही अनेक भ्रांतियों और अनिश्चितताओं को दूर कर दिया था, फिर भी समय-समय पर अनेक मामले इस विषय पर उत्पन्न हो रहे हैं। तब इस न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि ‘सह-जीवन कोई अपराध नहीं है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार के रूप में एक अभिन्न अंग है’।
  • मालिमथ समिति, जिसे देश की दांडिक विधि पर सुधार के लिए सुझाव देने हेतु गठित किया गया था, ने भी सिफारिश की थी कि ”दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के अंतर्गत ‘भरण-पोषण’ के प्रयोजनार्थ शब्द ‘पत्नी’ के अंतर्गत ‘सह-जीवन’ में रह रही स्त्री को भी शामिल किया जाए, किंतु इस आशय का कोई भी संशोधन या विधिक प्रावधान अभी तक नहीं किया गया है और प्रत्येक अधिकार एवं दायित्व न्यायिक निर्णयों पर आधारित हैं।”
  • महाराष्ट्र सरकार ने मालिमथ समिति की सिफारिश के अनुसार वर्ष 2008 में बिना विवाह किए एक साथ पति-पत्नी के रूप में रह रहे व्यक्तियों के संबंधों अर्थात सह-जीवन को वैधानिक मान्यता प्रदान कर दी है।
  • विश्व के अधिकांश देशों में लिव-इन-रिलेशन का संबंध प्रायः एक करार के रूप में स्थापित होता है, जिसमें दोनों पक्षों एवं उनकी संतानों के लिए कुछ अधिकार, उत्तराधिकार और दायित्व निर्वहन का प्रावधान होता है, फिर भी खुले तौर पर उन्हें सामाजिक मान्यता अभी प्राप्त नहीं है।
  • अमेरिका में लिव-इन- एग्रीमेंट, चीन में पारस्परिक समझौता, फ्रांस के सिविल सॉलिडेरिटी पैक्ट, 1999 (न्यायालय के समक्ष पक्षों के द्वारा पारस्परिक समझौता), ब्रिटेन में वसीयती समझौता आदि के माध्यम से सह-जीवन को कायम रखा गया है।
  • स्कॉटलैंड एक ऐसा देश है जहां सह-जीवन को कानूनी मान्यता प्राप्त है तो कनाडा में इसे कॉमन लॉ मैरेज के रूप में मान्यता प्राप्त है।