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यूक्रेन : शक्ति राष्ट्रों का अखाड़ा

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पूर्वी यूरोपीय देश यूक्रेन वर्तमान में अशांति के दौर से गुजर रहा है। यूक्रेन यूरोप में विस्तारित रूस के बाद दूसरा सबसे बड़ा देश है। इसके पूर्व एवं उत्तर-पूर्व में रूस, उत्तर-पश्चिम में बेलारूस, पश्चिम में पोलैंड, स्लोवाकिया, हंगरी, दक्षिण-पश्चिम में रोमानिया, मालडोवा, दक्षिण में काला सागर तथा दक्षिण पूर्व में अजोव सागर अवस्थित हैं। यूरोपीय संघ और रूस द्वारा यूक्रेन को अपने पाले में रखने के प्रति विशेष रुचि ही वर्तमान अशांति का मूल कारण है। इस रुचि के पीछे के कारण भी छिपे नहीं हैं। यूक्रेन में यूरोपीय देशों ने भारी निवेश किया हुआ है। ये देश गैस के लिए विशेष रूप से यूक्रेन पर ही आश्रित हैं।

दूसरी ओर रूस के साथ यूक्रेन के संबंध भौगोलिक के साथ-साथ सांस्कृतिक भी हैं। लगभग 350 वर्षों तक यूक्रेन रूस का अंग या इसके साथ गठबंधन में रहा है। यूक्रेन में रूसी मूल की 17 प्रतिशत आबादी अधिवासित है। यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप के सेवस्तापोल (काला सागर तट पर) में रूसी सैन्य अड्डा है। यहां की जनता का भी भावनात्मक लगाव रूस के साथ है, जिसके ऐतिहासिक कारण भी हैं।

यूक्रेन में पश्चिमी देशों के किसी हस्तक्षेप के प्रति रूस विशेष रूप में इसलिए भी सशंकित रहता है कि इससे यहां की रूसी मूल की जनसंख्या के हित प्रभावित होंगे। रूस इन लोगों के हितों की सुरक्षा अपना उत्तरदायित्व मानता है। इसके अतिरिक्त यूक्रेन का पश्चिमी देशों के प्रभाव में आने या नाटो की सदस्यता ग्रहण करने का अर्थ यह भी है कि खतरा रूस के मुहाने तक आ चुका है। यही कारण है कि परिस्थितियों को अपने प्रतिकूल होते देख रूस ने यूक्रेन में सेना भेजने तक की चेतावनी दे डाली थी।

कैसे बिगड़ी स्थितियां ?

सोवियत संघ के विघटन के बाद जब घटक देशों की आर्थिक स्थितियां बदतर होने लगीं तो अनेक देशों में यूरोपीय संघ से जुड़ने की जनाकांक्षा कुलांचे भरने लगी। यूक्रेन, जो शेष यूरोप एवं रूस के मध्य एक बफर स्टेट है, उसके द्वारा यह निर्णय ले पाना कठिन था कि वह किधर जाए? रूस की ओर या फिर यूरोपीय संघ की ओर। जनमत भी विभाजित था, पश्चिमी यूक्रेन यूरोपीय संघ का समर्थक था तो पूर्वी यूक्रेन रूस समर्थक।

क्रीमिया और रूस

यह वही क्रीमिया है जहां 1853 से 1856 के बीच हुए युद्ध को इतिहास में क्रीमिया के युद्ध के नाम से जाना जाता है। विधितः यह यूक्रेन का अंग है किंतु यहां की अधिकांश जनसंख्या रूसी मूल की है और जिसका रूस के साथ विशेष लगाव है। ‘रूसी‘ यहां की आधिकारिक भाषा है। सेवस्तापोल में रूसी सैनिक विद्यमान रहते हैं। यह सैन्य अड्डा रूस को यूक्रेन से पट्टे पर प्राप्त है जिसकी अवधि 2042 तक है।

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि 1954 के पूर्व तक क्रीमिया रूस का अंग था। 1954 में तत्कालीन सोवियत संघ नेता निकिता ख्रुश्चेव ने इसे यूक्रेन को हस्तांतरित कर दिया था। यूक्रेन के रूस के साथ गठबंधन की 300वीं वर्षगांठ के अवसर पर उपहार के रूप में क्रीमिया यूक्रेन को दे दिया गया था। 1991 में सोवियत विघटन के समय क्रीमिया को लेकर गतिरोध उत्पन्न हुआ था किंतु जुलाई, 1992 में यूक्रेन तथा क्रीमिया की संसद ने यह प्रस्ताव पारित कर दिया था कि क्रीमिया यूक्रेन का अंग बना रहेगा किंतु इसे विशिष्ट सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्वायत्तता हासिल रहेगी।

आज यूक्रेन में परिस्थितियां जहां पहुंच चुकी हैं, उसका बीजारोपण वस्तुतः 30 मार्च, 2012 को तब हो चुका था जब यूरोपीय संघ एवं यूक्रेन ने एक संघ समझौते (Association Agreement) के प्रति रुचि प्रदर्शित की।

बाद में यूरोपीय संघ ने यह शर्त रखी कि समझौता तब तक अनुमन्य नहीं होगा जब तक कि यूक्रेन लोकतंत्र एवं कानून के शासन (Democracy & Rule of law) के प्रति प्रतिबद्धता नहीं व्यक्त करेगा। शर्तों में विपक्षी नेता यूलिया ताइमोशेंको एवं यूरी लुतशेंको की रिहाई भी शामिल थी। यूक्रेन की संसद में जब यूरोपीय मानदंडों के अनुरूप उदार कानूनों को पारित करने की तैयारी चल रही थी तभी सशंकित रूस ने अगस्त, 2013 में यूक्रेन से आयात हेतु निर्धारित सीमा शुल्क विनियमों में परिवर्तन कर दिया। 14 अगस्त से रूसी सीमा शुल्क सेवा ने यूक्रेन से आने वाली सभी वस्तुओं पर रोक लगा दी। रूस ने अपने इस कदम से यह चेता दिया था कि वह यूक्रेन के यूरोप की तरफ पींगे बढ़ाने को बर्दाश्त नहीं करेगा। यूरोप के साथ जुड़ाव के बदले यूक्रेन, ऋण एवं अनुदान भी चाहता था। उसने यूरोपीय संघ से 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋणों एवं अनुदान हेतु अनुरोध किया था। यूरोपीय संघ कुछ शर्तों के साथ 610 मिलियन यूरो (838 मिलियन अमेरिकी डॉलर) ऋण पर सहमत था। उधर रूस ने 15 बिलियन डॉलर की सहमति दे दी, साथ ही यूक्रेन के लिए सस्ती दरों पर गैस का प्रस्ताव भी किया।

यूरो मैदान

यूरो मैदान पदनाम पहली बार ट्विटर हैशटैग के रूप में प्रयुक्त हुआ। प्रदर्शन शुरू होने के पहले दिन ही इस नाम से ट्विटर पर एकाउंट शुरू किया गया। बाद में अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में यह नाम खासा लोकप्रिय हो गया। इस नाम के दो हिस्से हैं। प्रथम भाग ‘यूरो’ यूरोप का संक्षिप्त रूप है जबकि मैदान (Maidan) का अर्थ है- स्वतंत्रता चौक (Independence Square)। यह चौक यूक्रेन की राजधानी कीव का मुख्य चौराहा है जहां प्रदर्शन केंद्रित रहे। वर्तमान प्रदर्शनों को यूक्रेनियाई बसंत  (Ukranian Spring), फरवरी क्रांति (February Revolution) आदि नामों से भी पुकारा गया है।

21 नवंबर, 2013 को यूक्रेन की सरकार ने संघ समझौते पर हस्ताक्षर की तैयारियों को निलंबित करने का फरमान जारी किया। इसी के बाद यहां की राजनीति में उबाल आ गया। यूरोप समर्थक विपक्ष ने 21 नवंबर, 2013 की रात्रि से ही यूरोप के साथ सहयोग की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन प्रारंभ कर दिए। प्रदर्शनों को यूरो मैदान (Euro Maidan) की संज्ञा दी गयी।

यूरो मैदान से फरवरी क्रांति तक

यूक्रेन में यूरो मैदान प्रदर्शन केवल इसलिए नहीं प्रारंभ हुए थे कि राष्ट्रपति यानुकोविच ने यूरोपीय संघ से समझौते के बनिस्पत रूसी सहायता को प्राथमिकता दे दी थी। दरअसल यूक्रेन, विशेषकर पश्चिमी यूक्रेन की जनता यूरोपीय संघ के साथ किसी समझौते में इस बात को निहित समझती थी कि यूक्रेन यूरोपीय प्रगतिशील मूल्यों पर आगे बढ़ेगा और इसे रूस मॉडल से मुक्ति मिलेगी। जनता राष्ट्रपति के भ्रष्टाचार और परिवारवाद से भी मुक्ति चाहती थी। दूसरी ओर राष्ट्रपति यानुकोविच पूर्वी यूक्रेन और क्रीमिया की जनता के नैतिक समर्थन से शक्तियुक्त थे।

यूरो मैदान प्रदर्शन, जो 21 नवंबर, 2013 से प्रारंभ हुए थे 17 फरवरी, 2014 तक तो शांतिपूर्ण रहे परंतु 18 फरवरी, 2014 को प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए। इसका कारण सरकार द्वारा किया गया बल प्रयोग भी था। 18 फरवरी को लगभग 20 हजार यूरो-मैदान प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़ने लगे। वे 2004 के उस संविधान को बहाल करने की मांग कर रहे थे जो 2010 में श्री विक्टर यानुकोविच के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद निरस्त कर दिया गया था। पुलिस ने जब बल प्रयोग किया तो हिंसा भड़क उठी। 20 फरवरी तक 48 घंटों में ही संघर्ष में 77 प्रदर्शनकारियों और 15 पुलिस कर्मियों की मौत हो चुकी थी। यूक्रेन के इतिहास में उसके स्वतंत्र देश के रूप में गठन के बाद यह सबसे बड़ी हिंसा थी। 20 फरवरी, 2014 को यूक्रेन की संसद ने बल प्रयोग की निंदा करते हुए सभी संस्थानों के लिए यह फरमान जारी किया कि प्रदर्शनकारियों पर हिंसा न करें, लेकिन प्रदर्शनकारी संतुष्ट नहीं हुए। 21 फरवरी को राष्ट्रपति यानुकोविच ने विपक्षी नेताओं के साथ एक समझौता हस्ताक्षरित किया जिसमें नई राष्ट्रीय एकता सरकार, सांविधानिक बदलावों, सत्ता संसद को हस्तांतरित करना तथा समय-पूर्व दिसंबर में चुनाव कराना स्वीकार किया गया था लेकिन तब तक परिस्थितियां खतरनाक मोड़ ले चुकी थीं। उग्र प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति के इस्तीफे से कम पर राजी नहीं थे। बदली परिस्थितियों में 22 फरवरी, 2014 को राष्ट्रपति यानुकोविच राजधानी छोड़कर पूर्वी यूक्रेन में जा छिपे। इसी बीच 22 फरवरी को यूक्रेन की संसद बर्खोवना राडा (Verkhovna Rada) ने राष्ट्रपति पर महाभियोग संस्थापित किया और 23 फरवरी को उनकी गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया। ओलेक्जेंडर तुर्शिनोव को यूक्रेन का अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया गया।

संसद ने शून्य के मुकाबले 328 मतों के अंतर से राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग पारित करने के साथ ही 25 मई, 2014 राष्ट्रपति चुनाव की तिथि घोषित कर दी। इधर रूस समर्थक राजनीतिज्ञों एवं कार्यकर्ताओं ने सभा कर रूस से क्रीमिया को बचाने का अनुरोध किया।

28 फरवरी को पलायन कर गए राष्ट्रपति यानुकोविच दक्षिण रूस में अवतरित हुए और संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि यूक्रेन में समय से पूर्व मई, 2014 में कराए जाने वाले चुनाव अवैध हैं और वे इसमें भाग नहीं लेंगे।

शक्ति राष्ट्रों का अखाड़ा यूक्रेन

इसी बीच 2 मार्च, 2014 को पूरी दुनिया के अख़बारों में यह ख़बर छा गई कि रूस यूक्रेन में सैन्य हस्तक्षेप कर सकता है। उल्लेखनीय है कि क्रीमिया के सेवस्तापोल में रूसी सैनिक एक समझौते के तहत मौजूद हैं। इसी के साथ यह आशंका भी व्यक्त की गई कि रूसी हस्तक्षेप एक उकसाने वाली कार्रवाई होगी और अमेरिका एवं अनेक यूरोपीय देश यूक्रेन पर हमले के मूकदर्शक ही नहीं बने रहेंगे। यूक्रेन को लेकर शक्ति राष्ट्रों के बीच वाक-युद्ध प्रारंभ हो चुका था। दरअसल युद्ध सरीखा वातावरण पैदा किया था, 1 मार्च को रूसी संसद द्वारा अनुमोदित उस प्रस्ताव ने जिसमें यूक्रेन में रूसी सेना तैनात करने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया गया था। यह अनुरोध राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने किया था।

एक देश दो संस्कृतियां

यूक्रेन की भौगोलिक स्थिति और जनसांख्यिकीय संरचना ही इस देश में महाशक्तियों को अपनी नाक घुसाने का अवसर प्रदान करती है। इसे पूरा समझने के लिए यूक्रेन के इतिहास में जाने की जरूरत होगी।

ईसा पूर्व प्रथम सहस्त्राब्दि में यूक्रेन में घूमंतू हमलावर जातियों का प्रवास प्रारंभ हुआ। 6वीं शताब्दी के आस-पास मध्य एवं पूर्वी यूक्रेन पर स्लोवाक जनजाति का कब्जा हो गया। 11वीं शताब्दी तक यूक्रेन की राजधानी कीव कीवियाई रूस (Kievan Russia) के महत्त्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हो चुकी थी। 12वीं शताब्दी में मंगोल आक्रमणकारियों ने कीव पर कब्जा कर लिया। 14वीं शताब्दी तक पश्चिम की ओर से अधिकांश यूक्रेन को पोलैंड एवं लिथुआनिया ने कब्जे में ले लिया था। 1667 में यूक्रेन पोलैंड एवं रूस के मध्य विभाजित हुआ। 1793 में यह संपूर्ण रूप से रूस के कब्जे में आ गया। 1917 की बोल्शेविक क्रांति के समय यूक्रेन के तीन अलग-अलग हिस्सों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर लिया, किंतु 1921 आते-आते परंपरागत रूप से पश्चिमी हिस्सा पोलैंड में तथा मध्य एवं पूर्वी हिस्सा सोवियत संघ में शामिल हो गया। 1939 में पोलैंड में जर्मनी और सोवियत हमले के बाद पूरा यूक्रेन सोवियत संघ में मिला लिया गया। 1941 में जब जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला किया तो पश्चिमी यूरोप के निवासियों ने जर्मनी का स्वागत किया, किंतु हमले में जर्मनी ने यूक्रेन के यहूदियों के साथ-साथ अन्य नागरिकों को भी निशाना बनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध में कुछ यूक्रेनी जर्मनी के विरुद्ध लड़ रहे थे तो कुछ सोवियत संघ के। युद्ध पश्चात यूक्रेन सोवियत संघ का अंग बना रहा। सोवियत संघ के विघटन के बाद 24 अगस्त, 1991 को यूक्रेन स्वतंत्र देश बना जिसमें 1954 में उपहार में उसे हासिल क्रीमिया भी शामिल था। यद्यपि कि संधि के तहत क्रीमिया में रूस को सैनिक अड्डा कायम रखने का अधिकार प्राप्त है।

इस प्रकार ऐतिहासिक रूप से यूक्रेन दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक भाग रूसी-भाषी

पूर्वी यूक्रेन एवं क्रीमिया है जहां रूस ने खासा औद्योगिकीकरण किया हुआ है। दूसरा हिस्सा पश्चिमी यूक्रेन का है जो पोलैंड एवं अन्य यूरोपीय देशों से निकटता महसूस करता है। एक बात जिस पर पूरा देश एकमत है, वह है राजधानी कीवदेश के दोनों हिस्से कीव को अपनी राजधानी मानते हैं।

वास्तव में यूक्रेन के लिए सहायता राशि का प्रस्ताव भी जब रूस एवं यूरोपीय संघ करते हैं तो उसमें यूक्रेन पर प्रभाव जमाने की ही चाल छुपी रहती है। ऐतिहासिक रूप से जनता के दो भागों में विभाजित रहने के कारण उनकी चालें कामयाब भी होती हैं।

नया मोड़

अभी यूक्रेन की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए समाधान का कोई रास्ता आगे बढ़ता उससे पहले ही एक नया मोड़ तब आ गया जब 6 मार्च, 2014 को यूक्रेन के क्रीमिया स्वायत्त क्षेत्र की संसद ने रूसी गणराज्य के अन्य प्रांतों को मिलने वाले अधिकारों के साथ रूस में शामिल होने का निर्णय लिया। क्रीमिया की संसद की वेबसाइट पर प्रकाशित घोषणा के अनुसार 16 मार्च, 2014 को क्रीमिया में इस बात पर जनमत संग्रह कराया जाएगा कि क्या वे रूसी संघ के सदस्य के नागरिक के रूप में फिर से रूस का अंग बनना चाहते हैं या वे यूक्रेन के अंग के रूप में क्रीमिया की वर्तमान स्थिति को बरकरार रखना चाहते हैं।

दूसरी ओर यूक्रेन की सरकार के साथ ही यूरोपीय संघ और अमेरिका ने भी क्रीमिया क्षेत्र में जनमत कराने संबंधी रूस की कोशिशों की आलोचना की है और इसे गैर-कानूनी करार दिया है। ब्रुसेल्स में आयोजित एक सम्मेलन में यूरोपीय संघ ने रूस को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि रूस समस्या के समाधान में मदद नहीं करता है तो उस पर कुछ प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं, जिसमें यात्राओं को रोकना और यूरोपीय संघ तथा रूस के बीच होने वाले सम्मेलन को रद्द करना शामिल हो सकता है।

क्रीमिया विवाद के कानूनी पहलू

1954 के पूर्व तक क्रीमिया रूस का ही हिस्सा था। 1954 में तत्कालीन सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने क्रीमिया यूक्रेन को तोहफे में दे दिया था। इसके 10 वर्ष पूर्व जोसेफ स्टालिन ने क्रीमिया की 3 लाख तातार आबादी को हिटलर के सहयोग के आरोप में निर्वासित कर दिया था। जब 1991 में यूक्रेन आजाद हुआ तो तब के रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन इस बात पर राजी हो गये कि क्रीमिया यूक्रेन का अभिन्न अंग बना रहेगा। वर्ष 1994 में यूक्रेन के संबंध में बूडापेस्ट समझौता संपन्न हुआ जिस पर रूस, अमेरिका, यूक्रेन और ब्रिटेन ने हस्ताक्षर किए हैं। समझौते में प्रावधान है कि कोई देश यूक्रेन की क्षेत्रीय संप्रभुता और राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ ताकत का इस्तेमाल नहीं करेगा। ये देश इस बात पर भी सहमत हुए कि यूक्रेन पर आर्थिक दबाव नहीं डाला जाएगा। यूक्रेन के साथ हुए द्विपक्षीय समझौते के तहत रूस क्रीमिया के सेवस्तापोल स्थित सैनिक अड्डे पर अपने 25,000 सैनिक रख सकता है।

रूस पर आरोप है कि उसने बूडापेस्ट समझौते का उल्लंघन किया है। साथ ही यूक्रेन के साथ हुए द्विपक्षीय समझौते का भी उल्लंघन किया है क्योंकि उसके सैनिकों को सैन्य अड्डे पर ही रहने का अधिकार है लेकिन ये पूरे क्रीमिया में फैले हुए हैं।

रूस का कहना है कि वह यूक्रेन में इसलिए है ताकि अपने नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा कर सके।

समाधान समझदारी में निहित है

यूक्रेन की समस्या के समाधान पर विचार करते समय इस तथ्य को ध्यान में रखना जरूरी है कि शक्ति राष्ट्रों के लिए बफर स्टेट का खासा राजनीतिक महत्त्व होता है। यूक्रेन में रूस की रुचि को यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है कि यूक्रेन एक स्वतंत्र राष्ट्र है और उसे कोई भी निर्णय लेने का अधिकार है। यदि यूक्रेन यूरोपीय संघ में शामिल होता है या नाटो का सदस्य बनता है तो रूस की चिंताएं जायज़ हैं। इस क्षेत्र में मिश्रित नृजातीय बसाव तथा अलग-अलग राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के कारण जातीय संहार का भी खतरा है, जिस पर प्रभावी अंकुश रूस ही लगा सकता है। बफर राष्ट्रों और उनके इर्द-गिर्द स्थित शक्तिशाली राष्ट्रों के बीच संबंधों को अत्यंत समझदारी से निभाया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए भारत एवं चीन के मध्य स्थित नेपाल एवं भूटान को लेकर कोई टकराव न समुपस्थित हो इसके लिए आवश्यक है कि बड़े देश बफर राज्यों में अनावश्यक रुचि न प्रदर्शित करें और बफर राज्यों के लिए भी यह हितकारी है कि वे संतुलन के साथ संबंधों को कायम रखें। यूक्रेन के मामले में भी यूरोपीय संघ, अमेरिका, रूस तथा यूक्रेन से ऐसी ही समझदारी अपेक्षित है।