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मुल्लापेरियार बांध पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय

मुल्लापेरियार बांध केरल राज्य में पेरियार नदी पर स्थित एक गुरुत्व बांध(Gravity Dam) है। यह थेक्काडी (इडुक्की जिले) में पश्चिमी घाट की इलायची पहाड़ियों (Cardamom Hills) पर समुद्र तल से 881 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसका निर्माण वर्ष 1887 से 1895 के मध्य हुआ था। इस बांध द्वारा पश्चिम की ओर प्रवाहित होकर अरब सागर में गिरने वाली पेरियार नदी के जल को रोककर वापस पूर्व की ओर एक सुरंग द्वारा मोड़ते हुए तमिलनाडु राज्य के वृष्टिछाया (सूखे) वाले इलाकों को जल उपलब्ध कराया जाता है। यह बांध और इसका जलाशय केरल राज्य में है जबकि इसका नियंत्रण, प्रबंधन, संचालन और इसके जल का उपयोग तमिलनाडु राज्य द्वारा किया जाता है। यह बांध तत्कालीन त्रावणकोर के महाराजा और ब्रिटिश सरकार के मध्य 1886 में हस्ताक्षरित एक पट्टा समझौते के बाद बनना प्रारंभ हुआ। इस समझौते द्वारा त्रावणकोर रियासत की 800 एकड़ भूमि को पेरियार नदी पर बांध बनाने हेतु 999 वर्ष के लिए पट्टे पर दिया गया। पट्टे पर त्रावणकोर के दीवान और तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के राज्य सचिव द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे। बाद में त्रावणकोर, कोचीन रियासतों और मालाबार जिले को मिलाकर 1956 में बना केरल राज्य इस समझौते का उत्तराधिकारी बना तो मद्रास प्रेसीडेंसी की जगह तमिलनाडु ने ली। केरल सरकार द्वारा बांध की सुरक्षा को लेकर प्रश्न उठाया जाता रहा है। केरल सरकार के अनुसार बांध के जीर्ण-शीर्ण होने के कारण इसके आस-पास के लाखों लोगों के जीवन को खतरा है और इसीलिए बांध को ध्वस्त कर उसका पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए।

वर्ष 1961 में इस क्षेत्र में आई एक बाढ़ के बाद से केरल सरकार ने इस मुद्दे को जल आयोग के सामने रखा था जिसके बाद दोनों राज्यों द्वारा संयुक्त निरीक्षण कर बांध के जल स्तर को 155 फीट से घटाकर 152 फीट किया गया और 1980 में इसे फिर 136 फीट कर दिया गया। साथ ही केंद्रीय जल आयोग के वर्ष 1980 में दिए निर्देशानुसार बांध की मजबूती के लिए आवश्यक उपाय किए जाने के पश्चात इसे 145 फीट तक किया जा सकता है। तमिलनाडु का तर्क है कि सभी रक्षोपाय किए जाने के बाद अब उसे बांध का जलस्तर बढ़ाने का अधिकार है। परंतु केरल द्वारा इसका विरोध किया जा रहा था। इस हेतु दोनों पक्षों द्वारा मद्रास और केरल उच्च न्यायालयों में दायर याचिकाओं को वर्ष 2001 में उच्चतम न्यायालय ने अपने पास हस्तांतरित कर लिया। वर्ष 2006 में दिए निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु को मुल्लापेरियार बांध का जलस्तर 142 फीट तक बढ़ाने की अनुमति दे दी। परंतु केरल विधानमंडल द्वारा केरल सिंचाई एवं जल संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2006 पारित कर मुल्लापेरियार बांध को खतरनाक घोषित कर उसका जलस्तर 136 फीट निर्धारित कर दिया गया। जिसके बाद तमिलनाडु सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत केरल सरकार के विरुद्ध याचिका दायर की गई थी।

  • 7 मई, 2014 को दिए गए निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को मुल्लापेरियार बांध के जलस्तर को 142 फीट करने की अनुमति प्रदान कर दी।
  • निर्णय के अनुसार बांध को सुदृढ़ करने के उपायों के पूरे होने के बाद इसे बढ़ाकर 152 फीट किया जा सकता है।
  • मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा यह निर्णय सुनाया गया।
  • इस पीठ में शामिल अन्य न्यायाधीशों में न्यायमूर्तिगण एच.एल. दत्तू, सी.के. प्रसाद, मदन बी. लोकुर और एम.वाई. इकबाल थे।
  • संविधान पीठ द्वारा दिए गए निर्णय में केरल विधानमंडल द्वारा पारित केरल सिंचाई एवं जल संचयन (संशोधन) अधिनियम, 2006 को मुल्लापेरियार के संदर्भ में असंवैधानिक घोषित कर दिया गया।
  • निर्णय के द्वारा बांध का जलस्तर 136 फीट से बढ़ाकर 142 फीट करने के तमिलनाडु राज्य के अधिकार में बाधा पहुंचाने से केरल को स्थायी तौर पर रोक दिया गया।
  • उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष 2006 में तमिलनाडु सरकार को बांध का जलस्तर बढ़ाकर 142 फीट करने की अनुमति देने वाले निर्णय को निष्प्रभावी करने हेतु यह अधिनियम केरल विधानमंडल द्वारा पारित किया गया था।
  • अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने केरल राज्य को अपने कानून को तमिलनाडु राज्य पर थोपने से रोक दिया है।
  • संविधान पीठ के अनुसार उच्चतम न्यायालय के वर्ष 2006 के आदेश को निष्प्रभावी करने का प्रयास न्यायिक कामकाज में हस्तक्षेप है।
  • पीठ के अनुसार संविधान द्वारा कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों का बंटवारा किया गया है और इनमें से किसी को एक-दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
  • संविधान पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि कानून पारित करने में अगर शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन होता है तो उस कानून को अविधिमान्य घोषित किया जा सकता है।
  • पीठ ने कहा कि यदि शक्तियों के पृथक्करण में निहित सांविधानिक आदर्शों का अतिक्रमण होता है तो न्यायालय कानून को अवैधानिक घोषित कर सकता है।
  • अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय में पीठ ने कहा कि विधानमंडल केवल कानून को संशोधित कर सकता है परंतु न्यायालय द्वारा दिए निर्णय या आदेश को अमान्य घोषित नहीं कर सकता।
  • पीठ द्वारा एक तीन सदस्यीय समिति का भी गठन किया गया जो मुल्लापेरियार बांध की ऊंचाई को बढ़ाकर 142 फीट करने का पर्यवेक्षण करेगी और उसे सुनिश्चित करेगी।
  • तीन सदस्यीय समिति की अध्यक्षता केंद्रीय जल आयोग के चेयरमैन द्वारा की जाएगी जबकि केरल और तमिलनाडु राज्यों द्वारा अपने एक-एक प्रतिनिधियों की नियुक्ति की जाएगी।
  • केरल राज्य की आशंकाओं को दूर करने के लिए पीठ ने कहा कि मानसून पूर्व और पश्चात समिति द्वारा बांध का समय-समय पर निरीक्षण किया जाए और बांध की सुरक्षा हेतु आवश्यक उपाय किए जाएं।
  • केरल सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह तमिलनाडु को बांध की मरम्मत और सुरक्षा हेतु अन्य आवश्यक कदम उठाने की अनुमति प्रदान करे।