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दिल्ली में राष्ट्रपति शासन

भारत के मूल संविधान में केंद्रशासित प्रदेशों के लिए विधान सभा तथा मंत्रिपरिषद की व्यवस्था नहीं की गयी थी किंतु वर्ष 1962 में भारत के संविधान में अनुच्छेद ‘239 अंतःस्थापित करके संसद को यह शक्ति दी गयी कि वह संघ राज्य क्षेत्र के लिए मंत्रिपरिषद या विधानमंडल या दोनों का सृजन कर सकती है। दिल्ली के लिए विधान सभा का उपबंध करने और मंत्रिपरिषद के सृजन के लिए और इससे संबंधित अन्य विषयों की व्यवस्था करने हेतु संविधान संशोधन (69वां संशोधन) अधिनियम, 1991 के द्वारा अनुच्छेद 239 (क) और अनुच्छेद 239 (ख) अंतःस्थापित किए गए। यह संशोधन 1 रवरी, 1992 से लागू हुआ। अनुच्छेद 239 (क) में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के प्रशासन एवं उसकी विधायी शक्तियों का उल्लेख है जबकि अनुच्छेद 239 (ख) में दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने के लिए परिस्थितियों का प्रावधान है। यदि ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है जिससे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का प्रशासन अनुच्छेद 239 (क) या वर्ष 1991 के अधिनियम के अनुसार नहीं चलाया जा सकता तो राष्ट्रपति, उप-राज्यपाल से प्रतिवेदन की प्राप्ति पर या अन्यथा उक्त विधियों के प्रवर्तन को निलंबित कर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का प्रशासन अपने हाथ में ले सकता है।

  • दिल्ली की पांचवीं विधान सभा के लिए चुनाव 4 दिसंबर, 2013 को संपन्न कराए गए थे जिसके लिए मतगणना का कार्य 8 दिसंबर, 2013 को संपन्न किया गया था।
  • इस चुनाव में कोई भी दल/गठबंधन बहुमत के लिए निर्धारित 36 सीटें प्राप्त नहीं कर सका।
  • इस प्रकार राज्य में पहली बार त्रिशंकु विधान सभा (Hung Assembly) का जनादेश राजनीतिक पार्टियों को प्राप्त हुआ।
  • अंततः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सहयोग से नवगठित आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक एवं भारतीय राजस्व सेवा के पूर्व अधिकारी अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में 28 दिसंबर, 2013 को शपथ ग्रहण की, किंतु ‘जन लोकपाल विधेयक’ को दिल्ली विधान सभा में पेश करने के मुद्दे पर सदन में हुए मतदान में पराजय के पश्चात केजरीवाल ने 14 फरवरी, 2014 को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया।
  • किसी अन्य दल द्वारा दिल्ली में सरकार गठन का दावा पेश नहीं किए जाने के कारण दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग द्वारा विधान सभा को निलंबित करने तथा दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की गई, जिसे अंततः राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हो गई।
  • परिणामस्वरूप दिल्ली में पहली बार राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।
  • उल्लेखनीय है कि 70 सदस्यीय दिल्ली विधान सभा में जन लोकपाल विधेयक को पेश करने के मुद्दे पर हुए मतदान में 42 विधायकों ने इस विधेयक का विरोध जबकि 27 विधायकों ने इसका समर्थन किया था।
  • जिन 42 विधायकों द्वारा सदन में इस विधेयक को पेश करने का विरोध किया गया उनमें 32 भारतीय जनता पार्टी के, 8 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के, 1 जनता दल (यूनाइटेड) का तथा 1 निर्दलीय विधायक शामिल था।
  • उल्लेखनीय है कि अरविंद केजरीवाल ने अपने इस्तीफे के साथ ही दिल्ली विधान सभा को भंग कर नए चुनाव कराने की मांग की थी लेकिन उपराज्यपाल ने उनकी यह सिफारिश अस्वीकार करते हुए विधान सभा को निलंबित रखने की रिपोर्ट भेजी थी।
  • 20 फरवरी, 2014 को आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधान सभा के निलंबन को चुनौती देते हुए इसके विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दी।
  • 24 फरवरी, 2014 को उच्चतम न्यायालय ने आम आदमी पार्टी की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और 10 दिन के अंदर जवाब देने को कहा।

जन लोकपाल विधेयक की विशेषताएं

  • सात-सदस्यीय जन लोकपाल चयन समिति केंद्रीय चयन समिति (पांच-सदस्यीय) से व्यापक व बड़ी होगी।
  • लोकपाल का क्षेत्राधिकार अपेक्षाकृत अधिक होगा जिसमें मुख्यमंत्री भी शामिल होगा और उसे जांच में दोषी पाए गए अधिकारी/कर्मचारी को निलंबित करने, पदावनति करने या पद से हटाने, वारंट जारी करने, दोषी की संपत्ति जब्त करने तथा लोकपाल द्वारा जारी आदेश की अवमानना पर दोषी व्यक्ति को 6 माह तक के कारावास व जुर्माना से दंडित करने की शक्ति प्राप्त होगी।
  • ‘व्हिसल ब्लोवर’ की सुरक्षा का पूरा प्रबंध होगा और अन्वेषण कार्य तीन महीने में पूर्ण किया जाएगा।
  • झूठी शिकायत करने वाले के विरुद्ध दोनों कानूनों में सजा 1 वर्ष तक की रखी गई हैं किंतु जन लोकपाल विधेयक के प्रावधानों के अनुसार जुर्माना 1 लाख रु. के बजाय 5 लाख रु. तक हो सकता है।
  • तय समय सीमा में शिकायत पर काम नहीं होने की स्थिति में शिकायत निवारण अधिकारी या संबंधित अधिकारी पर 500 रु. प्रति दिन से लेकर 50,000 रु. तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।