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दागी सांसदों/विधायकों पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय

उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ ने 10 मार्च, 2014 को पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन और अन्य बनाम भारत संघ और एक अन्य (2014)नामक जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए देश के निचले न्यायालयों को निर्देश दिया है कि सांसदों और विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मामलों की सुनवाई आरोप तय होने के एक वर्ष की अवधि के भीतर पूर्ण कर ली जाए अर्थात मामला निर्णीत कर दिया जाए। यदि इस समय-सीमा के भीतर ऐसा नहीं हो पाता है तो विचारण न्यायालय को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को इसका कारण दर्शित करना होगा। मुख्य न्यायाधीश मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को दृष्टिगत करते हुए समय-सीमा बढ़ा सकते हैं।

  • उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में 16 दिसंबर, 2013 को विधि आयोग से राजनीति को अपराध से मुक्त करने और चुनाव में झूठा शपथपत्र प्रस्तुत करने के साथ चुनाव सुधार पर उसकी राय मांगी थी।
  • इसमें दो मुख्य प्रश्न पूछे गए थे-(1) ‡या आरोप-पत्र पेश होने या तय होने पर निर्योग्यता घोषित की जा सकती है? और (2) ‡या झूठा शपथपत्र निर्योग्यता का आधार हो सकता है?
  • याचिका में याचिकाकर्ता ने न्यायालय से मांग की थी कि गंभीर अपराधों में आरोपी व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोका जाए तथा चुनाव में झूठा शपथपत्र प्रस्तुत करने वालों को निर्योग्य घोषित करने का निर्देश जारी किया जाए।
  • यह याचिका उच्चतम न्यायालय के 10 जुलाई, 2013 को दिए गए निर्णय के परिप्रेक्ष्य में दायर की गई थी।
  • विधि आयोग ने अपनी 244वीं रिपोर्ट में चुनाव सुधार से संबंधित अपने सुझाव विधि और न्याय मंत्रालय को 24 Òरवरी, 2014 को सौंपे थे, जिन्हें न्यायालय ने स्वीकार करते हुए उपर्युक्त निर्देश जारी किया है।
  • विधि आयोग की मुख्य सिफारिशें इस प्रकार हैं-
  • पांच वर्ष या इससे अधिक दंड के प्रावधान वाले मामलों में आरोप तय होने पर किसी प्रत्याशी को चुनावी राजनीति में भाग लेने हेतु अयोग्य ठहराया जाना चाहिए।
  • चुनाव में झूठा शपथपत्र प्रस्तुत करने पर प्रत्याशी को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के अंतर्गत भ्रष्ट आचरण के रूप में मानते हुए निर्योग्य घोषित किया जाना चाहिए तथा इसके लिए धारा 125A में नियत दंड 6 माह को बढ़ाकर 2 वर्ष कर दिया जाना चाहिए।
  • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के अंतर्गत अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आधार पर निर्योग्यता निर्धारित नहीं की जा सकती है क्योंकि इस चरण का कार्य केवल पुलिस अन्वेषण की अंतिम रिपोर्ट मात्र होता है और उसमें न्यायिक विवेक सम्मिलित नहीं होता है।
  • पांच वर्ष या उससे अधिक सजा के प्रावधान वाले मामलों में आरोप तय होने पर प्रत्याशी के निर्योग्य माने जाने को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में शामिल किया जा सकता है।
  • वर्तमान सांसदों/विधायकों के विरुद्ध मामलों में आरोप तय करने की प्रक्रिया धीमी है। इसे दिन-प्रतिदिन के आधार पर सुना जाना चाहिए और अंतिम सुनवाई एक वर्ष में पूर्ण कर ली जानी चाहिए।
  • यदि नामांकन की तिथि से ठीक एक वर्ष पूर्व प्रत्याशी के विरुद्ध कोई आरोप, जिसमें 5 वर्ष या अधिक की सजा हो सकती है, लंबित है, तब उसे निर्योग्य माना जाना चाहिए।
  • वर्तमान सांसद/विधायक के विरुद्ध ऐसा आरोप कानून के अधिनियमन के समय हो तब उसे भी निर्योग्य माना जाए।
  • यदि मामले की सुनवाई एक वर्ष के भीतर पूरी नहीं होती है तब सांसद या विधायक को सदन में मतदान करने से अयोग्य घोषित किया जा सकता है तथा उनके भत्ते और अन्य कार्यालय-व्ययों को निलंबित किया जा सकता है।