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‘जल्लीकट्टू’ (बुल-फाइटिंग) और ‘बुल-रेस’ प्रतिबंधित

उच्चतम न्यायालय ने 7 मई, 2014 को दिए अपने एक निर्णय में तमिलनाडु राज्य द्वारा प्रदेश में जल्लीकट्टू(Jallikattu) प्रथा को कायम रखने से संबंधित तमिलनाडु जल्लीकट्टू विनियमन अधिनियम, 2009′(Tamilnadu Regulation of Jallikattu Act, 2009) के प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करते हुए पूरे देश में जल्लीकट्टू अर्थात सांड़ों की लड़ाई (तमिलनाडु) या उससे संबंधित किसी भी खेल, प्रशिक्षण, मनोरंजन या सांड़-दौड़ इत्यादि (महाराष्ट्र) को प्रतिबंधित कर दिया है तथा पशु अत्याचार निवारण अधिनियम, 1960′(Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960) एवं भारतीय संविधान की पूर्ण व्याख्या पशुओं अर्थात वन्य-जीवों के पक्ष में करते हुए स्पष्ट घोषित किया है कि पशु भी अपने विधिक एवं संवैधानिक अधिकारों को प्राप्त करने के हकदार हैं।

यह निर्णय एनीमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया बनाम ए. नागराज और अन्य के मामले में न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष की खंडपीठ ने दिया है।

  • इस मामले में तमिलनाडु ‘जल्लीकट्टू’ विनियमन अधिनियम पर मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय, जिसमें अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार जल्लीकट्टू को राज्य में जारी रखने का निर्णय दिया गया था, के विरुद्ध अनेक याचिकाएं और अपीलें प्रस्तुत की गई थीं।
  • इसी मामले में महाराष्ट्र राज्य के अंदर बैलगाड़ी-दौड़ (Bullock-cart race), खेल, मनोरंजन या प्रशिक्षण को प्रतिबंधित करने वाले केंद्र सरकार और राज्य सरकार के संबंधित शासनादेश को उचित बताने वाले बंबई उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध भी दायर अनेक अपीलों और याचिकाओं को एक साथ निपटाते हुए न्यायालय ने संयुक्त रूप से यह निर्णय दिया है।
  • अतः निर्णय का प्रभाव तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र राज्य के साथ-साथ पूरे देश में लागू होगा।
  • संपूर्ण प्रकरण पर अध्ययन करने के बाद ‘एनीमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया’ ने पाया कि ‘जल्लीकट्टू’ प्रथा या ‘बैलगाड़ी-दौड़’ या इसी प्रकार के अन्य आयोजनों में सांड़ों के साथ क्रूरता तथा बर्बरता का व्यवहार किया जाता है और उन्हें अनेक प्रकार से यातनाएं भी दी जाती हैं।
  • यहां तक कि उन्हें उत्तेजित करने के लिए शराब तक भी पिलाई जाती है फिर उन्हें अन्य सांड़ों के साथ लड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है।
  • इन घटनाओं में कभी-कभी अनेक सांड़ मर भी जाते हैं तथा दर्शक भी घायल होते हैं। इसलिए संयुक्त रूप में ये कृत्य/घटनाएं पशु अत्याचार निवारण अधिनियम, 1960के अंतर्गत पशुओं को प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करती हैं।
  • न्यायालय ने बोर्ड के तर्कों से सहमति व्यक्त करते हुए तथा इस संबंध में सांड़ों के प्रयोग को प्रतिबंधित कर केंद्र सरकार के शासनादेश दिनांक 11.07.2011 को उचित मानते हुए निर्णय दिया है कि ‘जल्लीकट्टू’, बैलगाड़ी-दौड़ और इस प्रकार की अन्य घटनाएं या कार्य पशु अत्याचार निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 3 तथा धारा 11 (1) (क) का उल्लंघन करते हैं इसलिए केंद्र सरकार की अधिसूचना को कायम रखते हुए निर्देश दिया जाता है कि सांड़ों का प्रयोग न तो जल्लीकट्टू की घटनाओं में और न ही ‘बैलगाड़ी-दौड़’ के रूप में किया जाएगा।
  • यह प्रतिबंध तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र सहित पूरे देश में लागू होगा।
  • न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पशु अत्याचार निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 3 और 11 तथा अन्य संबंधित प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 15A(g) के साथ संज्ञान में लेते हुए समझा जाना चाहिए जिसके अनुसार जीवित प्राणियों के प्रति सहानुभूति रखना प्रत्येक नागरिक का मूल कर्त्तव्य है।
  • न्यायालय ने पशुओं/वन्य जीवों के जीवन को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मानव को प्राप्त ‘जीवन एवं दैहिक’ स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ते हुए निर्णीत किया है कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत शब्द ‘जीवन’(Life) को बहुत व्यापक अर्थ प्रदान किया गया है, जिसमें आधारभूत पर्यावरण में वन्य जीव को सम्मिलित करते हुए, जीवन के वे सभी प्रारूप सम्मिलित हैं, जो मानव जीवन के लिए आवश्यक हैं और उनमें हस्तक्षेप किया जाना अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आता है और पशु भी सम्मान व गरिमा के अधिकारी हैं।
  • पशुओं के अधिकारों की व्याख्या करने में न्यायालय ने 500-600 ईसा पूर्व रचित ईश उपनिषद के इस सूत्र वाक्य को भी आधार बनाया है कि ‘ब्रह्मांड अपने प्राणियों के साथ धरती से संबंधित है और कोई भी प्राणी एक-दूसरे से बड़ा नहीं है। इसलिए किसी भी प्रजाति को अन्य प्रजाति के अधिकारों और विशेषाधिकारों का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए’।
  • न्यायालय ने निर्देश दिया है कि जानवरों को प्रदत्त पांच स्वतंत्रताओं की संरक्षा और सुरक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की जाए और उन्हें विधिक और संविधानिक अधिकार (संरक्षण) प्रदान करने के लिए आवश्यक कानून बनाए तथा उन्हें एनीमल वेलफेयर बोर्ड के माध्यम से कार्यान्वित कराया जाए।
  • उल्लेखनीय है कि ओआईई (OIE : World Health Organization of Animal Health) अंतर्राष्ट्रीय रूप से स्वीकृत पशुओं से संबंधित पांच स्वतंत्रताओं को मान्यता प्रदान करता है।
  • ये अधिकार हैं-
    1. भूख, प्यास एवं कुपोषण से स्वतंत्रता
    2. भय एवं कष्ट से स्वतंत्रता
    3. शारीरिक एवं ऊष्मीय पीड़ा से स्वतंत्रता
    4. दर्द, चोट एवं रोग से स्वतंत्रता
    5. सामान्य आचरण अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता।
    उल्लेखनीय है कि भारत भी ओआईई का एक सदस्य है।

वन्य-जीव एवं भारतीय संविधान

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48क में प्रावधान किया गया है कि ‘राज्य देश के पर्यावरण संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य-जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा। यह भाग IV में शामिल होने के कारण राज्य का कर्त्तव्य है किंतु राज्य इसके लिए बाध्य नहीं है।
  • अनुच्छेद 51 क (छ) के अंतर्गत देश के नागरिकों का कर्त्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य-जीव आते हैं, की रक्षा करे और उनका संवर्धन करे तथा प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव रखे किंतु यह भी एक कर्त्तव्य है तथा इसे भी बाध्यकारी नहीं बनाया जा सकता है।
  • पशु अत्याचार निवारण अधिनियम, 1960 के द्वारा पशुओं के विरुद्ध अत्याचार को दंडनीय बनाया गया है किंतु इसका प्रवर्तन नहीं के बराबर होता है।

क्या है जल्लीकट्टू?

  • ‘जल्लीकट्टू’ एक तमिल शब्द है, जिसकी उत्पत्ति ‘कालीकट्टू’ से हुई है। ‘काली’ का अर्थ कॉइन (Coin) अर्थात सिक्का से है और ‘कट्टू’ का तात्पर्य उपहारस्वरूप (Package) प्रदान किए जाने से है।
  • प्राचीन तमिल परंपरा में लोग ‘सांड़’ की भगवान शिव के वाहन के रूप में पूजा करते हुए और उन्हें गले लगाते हुए उनके सींगों में ‘सोने-चांदी’ के सिक्के पहनाते थे, जिसे तब ‘कालीकट्टू’ और बाद में ‘जल्लीकट्टू’ कहा जाने लगा।
  • पहले यह भी प्रथा थी कि जो व्यक्ति सांड़ की इस प्रकार पूजा करता था, वह उस सांड़ के मालिक से अपनी पुत्री का विवाह भी कर देता था।
  • तमिलनाडु में प्रारंभ में यह प्रथा फसलों के पकने के अवसर पर प्रायः जनवरी-फरवरी के महीने में अथवा किसी त्योहार के अवसर पर मंदिरों के सामने संपन्न होती थी और आज भी हो रही है।
  • जल्लीकट्टू की प्राचीन प्रथा अब खेल एवं मनोरंजन के रूप में परिवर्तित हो चुकी है जिसे तमिलनाडु राज्य द्वारा जल्लीकट्टू विनियमन अधिनियम, 2009 पारित करके एक कानूनी मान्यता दे दी गई थी।

जल्लीकट्टू और अंतर्राष्ट्रीय कानून

  • ‘जल्लीकट्टू’ जैसी प्रथा मुख्यतः ‘वन्य-जीवों’ के अधिकारों को प्रभावित करती है, भले ही उसका ‘प्रारूप’ अलग हो परंतु इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘पशु अत्याचार’ की श्रेणी में माना जाता है।
  • पशु अत्याचार के निवारण के लिए सर्वमान्य किसी अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा का अभाव है, किंतु वन्य- प्राणियों के वर्ग विशेष पर कुछ अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन संपन्न हुए, जिनमें पक्षियों के संरक्षण के लिए घोषणा (1875), ह्वेल (मछली) के संरक्षण के कन्वेंशन (1931 एवं संशोधित कन्वेंशन 1946), वन्य-प्राणी से संबंधित कन्वेंशन (1990) तथा जैवविविधता पर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण संरक्षण कन्वेंशन (1992) मुख्य हैं।
  • जर्मनी विश्व का संभवतः पहला देश है जिसने वर्ष 2002 में अपने संविधान में मानव के बाद ‘और पशुओं’(and animals) शब्द जोड़कर मानव के साथ-साथ पशुओं को गरिमा (Animal Dignity) को प्रदान करना राज्य का कर्त्तव्य नियत किया है।
  • ब्रिटेन (2006) और ऑस्ट्रिया (2010) ने भी इस विषय पर कानून बनाए हैं।