Contact Us: 0532-246-5524,25, M: -9335140296 Email: [email protected]

जम्मू-कश्मीर में बाढ़ का प्रकोप

कुदरत की मार के आगे इंसान किस कदर लाचार है, इसकी बानगी वर्ष 2014 के सितंबर माह में जम्मू-कश्मीर में देखने को मिली। मात्र एक हफ्ते की मूसलाधार बारिश और भू-स्खलन ने राज्य का न केवल भूगोल ही बदल दिया है, बल्कि वहां के लोगों को इतनी गहरी पीड़ा पहुंचा दी है कि उन्हें इससे उबरने में बहुत लंबा वक्त लगेगा। आर्थिक क्षति के अलावा बड़ी संख्या में लोग काल-कवलित हो गए। जनजीवन पटरी से उतर गया है तथा साथ ही तमाम सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियां थम गई हैं। जन-धन और राज्य के ढ़ांचागत आधार को कितनी हानि हुई है, इसका अंदाजा अभी नहीं लगाया जा सकता क्योंकि अभी तो शासन-प्रशासन तथा लोग बाढ़ से अस्त-व्यस्त हालात को ही सामान्य बनाने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार हुई वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित राज्य के हालात का जायजा लेने के तत्काल बाद कहा कि यह संकट राष्ट्रीय स्तर की आपदा है। इस त्रासदी की विकरालता का सहज अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने राज्य आपदा राहत कोष के जरिए राज्य सरकार को उपलब्ध कराए जा रहे 11 अरब रुपये की राशि को पर्याप्त नहीं माना, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा 10 अरब रुपये की अतिरिक्त राशि विशेष परियोजना सहायता के रूप में उपलब्ध कराने की बात कही। केंद्र सरकार द्वारा हालात का समुचित सर्वेक्षण करने के बाद जरूरी हुआ तो राज्य सरकार को अतिरिक्त सहायता राशि उपलब्ध कराई जाएगी।

 विनाशकारी प्रभाव

  •   सितंबर, 2014 में मूसलाधार मानसूनी वर्षा के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य में अर्धशताब्दी की सबसे भयानक बाढ़ आई।
  •  यह केवल जम्मू और कश्मीर राज्य तक ही सीमित नहीं थी अपितु पाकिस्तानी नियंत्रण वाले आजाद कश्मीर, गिलगित-बल्तिस्तान व पंजाब प्रांतों में भी इसका व्यापक असर दिखा।
  •   भारत में मानसून के अंतिम चरण में, जम्मू-कश्मीर और इसके आस-पास के इलाकों में 2 सितंबर, 2014 से भारी वर्षा होने लगी।
  •  5 सितंबर, 2014 को श्रीनगर में झेलम नदी का जलस्तर 22.40 फीट (6.83 मीटर) हो गया जो कि खतरे के निशान से 4.40 फीट (1.34 मीटर) अधिक था।
  •  अनंतनाग जिले के संगम में जलस्तर 33 फीट (10 मीटर) पहुंच गया जो कि खतरे के निशान से 12 फीट (3.7 मीटर) ऊपर था। साथ ही, चेनाब नदी भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी।
सूखा व बाढ़ग्रस्त क्षेत्र

भारत में वर्षा का प्रादेशिक और मौसमी वितरण अत्यधिक विषम है। जैसलमेर में जहां वर्षा की मात्रा 10 सेमी. से भी कम है वहीं मासिनराम में वर्षा की मात्रा 1140 सेमी. से अधिक है। भारत में अधिकांश वर्षा जून से सितंबर माह में होती है। कृषि आयोग के अनुसार 75 सेमी. से कम वर्षा प्राप्त करने वाले जिलों को सूखाग्रस्त माना गया है।

सूखा : यह एक असामान्य, लंबा और शुष्क मौसम होता है जो किसी क्षेत्र विशेष में जलीय असंतुलन को पैदा करता है। सूखा के लिए मानसून की अनिश्चित प्रकृति के अलावा, कृषि का अवैज्ञानिक प्रबंधन भी उत्तरदायी है। सूखे के तीन प्रकार हैं :-

(1)          मौसमी सूखा-जब किसी बड़े क्षेत्र में वर्षा की मात्रा अपेक्षा से 75 प्रतिशत कम हो।

(2)          जलीय सूखा-जब मौसमी सूखा की अवधि लंबी हो जाए और नदियों, तालाबों तथा झीलों का पानी सूख जाए।

(3)          कृषिगत सूखा-जब फसल के लिए अपेक्षा से कम वर्षा हो और मिट्टी की नमी फसल के लिए अपर्याप्त हो।

बाढ़ : जब नदी या जल धाराएं अपने तटबंधों को पारकर जल को आस-पास फैला दें तो उसे बाढ़ कहते हैं। इसका मुख्य कारण नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में वर्षा का होना है। ऐसी स्थिति सर्वाधिक चक्रवातों, तूफानों से तटीय क्षेत्रों में उत्पन्न होती है या अचानक बादल फटने से भी उत्पन्न हो जाती है। यद्यपि बाढ़ के लिए मुख्य रूप से मानसून की प्रकृति ही जिम्मेदार है। इसके निम्न कारण भी हैं-

(1)          नदी घाटियों में अधिक अवसादीकरण

(2)          नदियों के द्वारा मार्ग बदलना

(3)     मानवीय बसाव के कारण नदी घाटियों का संकरा होना

(4)     पहाड़ी ढ़ालों में वनों की अत्यधिक कटाई।

बाढ़ के प्रमुख कारण

भारत के जल संसाधन विभाग के अनुसार देश में बाढ़ 60 प्रतिशत नदियों से तथा 40 प्रतिशत चक्रवातों से आती है।

  •    आवृत्ति के अनुसार बाढ़ क्षेत्रों को तीन भागों में बांटा गया है-

(1)          अधिकतम आवृत्ति का क्षेत्र : वह क्षेत्र, जहां प्रत्येक वर्ष बाढ़ आती है। जैसे-ब्रह्मपुत्र घाटी, निम्न गंगा घाटी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, गंडक तथा कोसी नदी घाटी।

(2)     मध्यम आवृत्ति वाले क्षेत्र : जहां 5 वर्ष या उससे कम अंतराल पर बाढ़ आती है। भारत के अधिकांश बाढ़ क्षेत्र इसी के अंतर्गत आते हैं।

(3)          निम्न आवृत्ति क्षेत्र : वे क्षेत्र जहां वर्षा बहुत कम होती है। लेकिन कभी-कभी अचानक बादल फटने से अनियमित जल निकासी के कारण बाढ़ आ जाती है।

  •    भौगोलिक दृष्टि से बाढ़ क्षेत्र को चार भागों में बांटा गया है-

(1)          पूर्वी खंड : पूर्वी उत्तर प्रदेश, उत्तरी बिहार, प. बंगाल, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश तथा असम। इन क्षेत्रों में हिमालय से निकलने वाली नदियों से बाढ़ आती है।

(2)          उत्तरी खंड : जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश। इन क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा के समय बाढ़ आती है।

(3)          दक्षिणी खंड : यह खंड प्रायद्वीपीय भाग में फैला हुआ है। दक्षिणी भारत में सर्वाधिक बाढ़ गोदावरी नदी घाटी में आती है।

(4)          उड़ीसा खंड : इस क्षेत्र में महानदी के कारण बाढ़ आती है। यह नदी कभी मार्ग परिवर्तित करती थी लेकिन वर्तमान में बांध निर्माण के कारण बाढ़ों पर नियंत्रण हो गया है।

  •    भारत सरकार ने बाढ़ों पर नियंत्रण करने के लिए वर्ष 1954 में ‘राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम’ शुरू किया था।
  • फ्लैश फ्लड : हिंदुकुश-हिमालय क्षेत्र में भारत और चीन सहित कई देश अचानक भारी वर्षा, ग्लेशियर पिघलने या बांध अथवा तटबंध टूटने से आई भयावह बाढ़ का सामना करते रहते हैं। भारत में पिछले वर्ष उत्तराखंड और हाल ही में जम्मू-कश्मीर में ऐसी परिस्थितियां बनी। ऐसी बाढ़ को हिमालय क्षेत्र में फ्लैश फ्लड कहा जाता है।
  • लैश फ्लड से निपटने में चीन के अलावा कोई भी देश सक्षम नहीं है। इस संदर्भ में भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल व भूटान काफी पीछे हैं।
  •   चीन ने फ्लैश फ्लड से निपटने के लिए गैर संरचनात्मक तरीके जैसे विशेष चेतावनी प्रणाली प्लेटफार्म, स्वचालित जलस्तर निगरानी प्रणालियां, जीएसएम/जीपीआरएस का उपयोग किया जाता है।
  •    इसके अतिरिक्त फ्लैश फ्लड की जानकारी और प्रशिक्षण देने के लिए बैठकों, रेडियो प्रसारण, टीवी, वेबसाइट, समाचार-पत्रों, बिलबोर्ड, इश्तहार, सीडी तथा कार्ड की सहायता ली जाती है।
  •   इस कारण से जम्मू-कश्मीर में बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं से मरने वालों की संख्या 24 सितंबर, 2014 को 284 तक पहुंच गई।
  •   जम्मू-क्षेत्र के सभी 10 जिलों-कठुआ, सांबा, जम्मू, ऊधमपुर, रियासी, डोडा, किश्तवाड़, रामबान, पुंछ और राजौरी तथा कश्मीर के 10 में से छह जिलों-श्रीनगर, कुलगाम, अनंतनाग, बड़गाम, पुलवामा और सोपियां में भारी नुकसान हुआ है।
हरियाणा सूखाग्रस्त घोषित
  •   सितंबर, 2014 में हरियाणा सरकार ने पूरे प्रदेश को सूखाग्रस्त (Drought-Hit) घोषित किया है।
  •    मौसम विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 1 जून से 31 अगस्त, 2014 तक प्रदेश में औसतन 65 प्रतिशत से कम वर्षा रिकॉर्ड की गई है। राज्य के 21 में से 18 जिलों में 50 प्रतिशत से कम वर्षा हुई है।
  •    जिन किसानों की धान तथा कपास की फसलें 50 प्रतिशत से ज्यादा नष्ट हो गई हैं उन्हें 4,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिया जाएगा।
  •    अन्य फसलों के लिए मुआवजे की रकम 3,500 रुपये प्रति एकड़ होगी।
  •    राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से 4829.25 कऱ़ोड रुपये के विशेष पैकेज की मांग की है।

  उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व वर्ष 2002 में भी राज्य को सूखा प्रभावित प्रदेश घोषित किया गया था।

  •   भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (ASSOCHAM) ने जम्मू-कश्मीर में भारी बाढ़ के कारण राज्य की अर्थव्यवस्था को 5,700 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान 14 सितंबर, 2014 को व्यक्त किया है।
  •  अनुमानित नुकसान राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 10 प्रतिशत है।
  •  बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित उद्योगों में बिजली, रेलवे और संचार की बुनियादी सुविधाओं के अलावा व्यापार, होटल, रेस्तरां, बागवानी तथा हस्तशिल्प शामिल हैं।
  •  एसोचैम ने जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में होटल, व्यापार, कृषि-बागवानी, सड़कों और पुलों के नुकसान के कारण लगभग 2,630 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति का अनुमान व्यक्त किया है।
  •  साथ ही उच्च लागत रेलवे, पहाड़ी इलाकों में बिजली और संचार के विनाश के कारण लगभग 2,700 से 3,000 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति का अनुमान लगाया गया है।
 राहत एवं बचाव
  •   भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर की भीषण बाढ़ से प्रभावित नागरिकों को सुरक्षित निकालने और सहायता प्रदान करने के लिए राहत व बचाव ऑपरेशन संचालित किया।
  •  ऑपरेशन ‘मेघ राहत’ (Operation Megh Rahat), भारतीय सेना की उत्तरी कमान (Northern Command) द्वारा ‘जम्मू’ क्षेत्र के लिए शुरू किया गया था।
  •  इसके अतिरिक्त ‘मिशन सहायता’ (Mission Sahayata) भारतीय सेना द्वारा कश्मीर क्षेत्र के लिए शुरू किया गया।
  •  बचाव व राहत कार्यों के लिए ‘नेशनल डिजास्टर रेस्पांस फोर्स’ (NDRF) की टीमों ने भी मोर्चा संभाला हुआ है।
  •  ऑपरेशन मेघ राहत शुरू कर इसमें सेना के साथ-साथ नौसेना और वायुसेना की मदद ली गई।
  •  20 सितंबर तक इस ऑपरेशन की मदद से लगभग 2.5 लाख राज्यवासियों को बचाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया था।
  •  इसके अतिरिक्त स्थायी-अस्थायी निर्माण कार्य कर स्थानीय वासियों को उपलब्ध मूलभूत आधार सुविधाओं को बहाल करने की कोशिश की गई।
उत्तर प्रदेश के 44 जनपद सूखाग्रस्त
  • 16 सितंबर, 2014 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश के 44 जनपदों को सूखाग्रस्त घोषित करने का निर्णय लिया है।   इन जिलों में वर्तमान मानसून के दौरान सामान्य वर्षा के सापेक्ष 50 प्रतिशत से कम वर्षा हुई है।
  •   प्रदेश सरकार ने सूखे से निपटने के लिए भारत सरकार से 6061 करोड़ रुपये का विशेष राहत पैकेज स्वीकृत करने का अनुरोध किया है।
  •   सूखाग्रस्त घोषित जनपदों में प्रभावित किसानों को राहत पहुंचाने के उद्देश्य से 31 मार्च, 2015 तक उनके अवशेष मुख्य राजस्व देयों (भू-राजस्व एवं सिंचाई) की वसूली स्थगित रहेगी।

 

  •  राज्य की स्थितियों में सुधार होने तथा राज्य सरकार के अधिक सक्रिय होने के बाद ऑपरेशन मेघ राहत को 20 सितंबर, 2014 को रोक दिया गया। इसमें लगभग 30,000 जवानों को लगाया गया था।
  •  केंद्र सरकार द्वारा बाढ़ प्रभावित जम्मू-कश्मीर राज्य में व्यापक राहत व बचाव कार्य किया जा रहा है।
  •  विभिन्न केंद्रीय एजेंसियों द्वारा जम्मू-कश्मीर के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से 2,78,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। इनमें 2,00,000 से अधिक लोगों को रक्षा सेनाओं ने तथा लगभग 52,000 लोगों को एनडीआरएफ ने और 27,000 लोगों को सीआरपीएफ ने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है।
  •  राज्य में विभिन्न गंतव्य स्थलों पर फंसे हुए लगभग 80,000 यात्रियों को भारतीय वायुसेना सहित विभिन्न विमान एजेंसियों द्वारा सुरक्षित निकाला गया है।
  •  लगभग 400 ट्रक/ट्रिपर राहत सामग्री विभिन्न प्रभावित क्षेत्रों में भेजी गई है जिसमें खाने के पैकेट, शिशु आहार, पानी और दवाएं शामिल हैं।
  •  करीब 2,000 टेंट और 80,000 कम्बल विभिन्न एजेंसियों द्वारा प्रदान किए गए हैं।
  •  सेना ने प्रभावित क्षेत्रों में एक बेस हास्पिटल और चार फील्ड अस्पतालों के अतिरिक्त 106 मेडिकल सहायता टीमें तैनात की है।
  •  स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने एंटीबायोटिक दवाएं, ओआरएस पैकेटों और अन्य जीवन रक्षक दवाएं काफी मात्रा में श्रीनगर भेजी है।
 आर्थिक सहायता
  •   भारत के प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर राज्य के सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया और 1,000 करोड़ रुपये की मदद राज्य सरकार को दी, यह पहले के 11,00 करोड़ रुपये के अतिरिक्त फंड था, जो कि पहले ही राज्य को आपदा से निपटने के लिए दिया जा चुका था।
  • महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने ‘मुख्यमंत्री राहत कोष’ से 10 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की।
  •  इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने भी 5-5 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की है।
  •  वित्त मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में बाढ़ व प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए 865.29 करोड़ रुपये की अग्रिम किस्त 12 सितंबर, 2014 को ही जारी कर दी थी।
  •  जम्मू-कश्मीर के बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद के लिए कारपोरेट सेक्टर भी आगे आया है। महिंद्रा एंड महिंद्रा और सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में क्रमशः 2 करोड़ और 3 करोड़ रुपये की मदद दी है।
  •  बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सह अध्यक्ष बिल गेट्स ने जम्मू-कश्मीर बाढ़ पीड़ितों के लिए 7 लाख डॉलर की आपात राहत राशि प्रदान करने की घोषणा की है।
  •  केंद्र सरकार ने सभी सांसदों से ‘सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ (एमपीलैड्स) कोष से जम्मू-कश्मीर बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत व पुनर्वास के लिए योगदान देने को कहा है।
  •  उल्लेखनीय है कि एमपीलैड्स योजना के दिशा-निर्देश के पैरा 2.8 के अनुसार सांसद किसी भी आपदा के समय देश भर में प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास कार्यों के लिए अधिकतम 1 करोड़ रुपये तक दे सकते हैं।
  •   24 सितंबर, 2014 को सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर में बाढ़ के बाद की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया है।
  •  इस समिति की अध्यक्षता जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के वरिष्ठ रजिस्ट्रार (Senior Registrar) करेंगे।
  •  इस समिति के अन्य सदस्यों में जम्मू-कश्मीर राजस्व, राहत और पुनर्वास सचिव, जम्मू बार एसोसिएशन के अध्यक्ष, कश्मीर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष तथा केंद्र द्वारा नामित व्यक्ति शामिल होंगे।
  •  सर्वोच्च न्यायालय ने समिति को दो सप्ताह के अंदर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।
  •  इस रिपोर्ट को सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में भी प्रस्तुत किया जाना है।