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छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले

वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में स्थित ग्राम नक्सलबाड़ी से पनपा अतिवादी भारतीय साम्यवादी आंदोलन आज भारत की आंतरिक सुरक्षा हेतु एक गंभीर चुनौती बन गया है। नक्सलबाड़ी ग्राम से प्रारंभ होने के कारण साम्यवादी आंदोलन की इस अतिवादी शाखा को भारत में नक्सलवाद की संज्ञा दी गई है। यद्यपि केंद्र सरकार के आधिकारिक वक्तव्यों में इसे वामपंथी उग्रवाद(Left Wing Extremism) कहा जाता है। भारत में यह आंदोलन यद्यपि चीनी नायक माओ, रूसी क्रांति पुरुष लेनिन और स्टालिन से ही प्रेरित है तथापि चारू मजूमदार को नक्सलवाद का प्रणेता माना जाता है। भारत में इस विचारधारा के अनुगामियों की सशस्त्र संघर्ष की नीति ही एक लंबे समय से देश के सुरक्षा प्रतिष्ठानों के साथ उनके संघर्ष का कारण है। विशेष रूप से माओवादी राजनीतिक और सशस्त्र संघर्ष की विचारधारा का अनुसरण करते हुए भारत के विभिन्न नक्सल गुटों ने वर्ष 2004 में परस्पर एकजुट होकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन कर लिया। तब से माओवादी हिंसा गहन और गहनतर होती जा रही है जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण 25 मई, 2013 को सामने आया जब छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं सहित 28 लोगों की दुर्दांत हत्या कर दी गई थी।

  • 11 मार्च, 2014 को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में 70-100 की संख्या में नक्सलियों ने 50 जवानों वाली केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल और राज्य पुलिस की संयुक्त टीम पर घात लगाकर हमला किया।
  • हमले में 15 जवानों और एक नागरिक की मृत्यु हो गई।
  • यह घटना तब हुई जब दो प्लाटूनों में विभाजित संयुक्त टीम टोंगपाल (Tongpal) गांव से जीरम (Jeeram) घाटी की ओर जा रही थी।
  • उल्लेखनीय है कि जीरम घाटी वही स्थान है जहां नक्सलियों ने मई, 2013 में घात लगाकर हमला कर 28 लोगों की हत्या कर दी थी।
  • जीरम घाटी राज्य की राजधानी रायपुर से लगभग 400 किमी. दूर सघन वनों का इलाका है।
  • संयुक्त टीम क्षेत्र को सुरक्षा टुकड़ियों के संचालन हेतु सुरक्षित करने के लिए क्षेत्रीय प्रभुत्व (Area Domination) का अभ्यास कर रही थी और साथ ही निर्माण कार्य में लगे मजदूरों को सुरक्षा भी प्रदान कर रही थी।
  • ज्ञातव्य है कि गृह मंत्रालय द्वारा लोक सभा चुनावों की घोषणा के मद्देनजर नक्सली हमले की चेतावनी फरवरी माह में ही जारी की गई थी।
  • यद्यपि बाद में गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने स्पष्ट किया कि इस हमले के संबंध में कोई विशेष खुफिया सूचना नहीं थी।
  • गृह मंत्री द्वारा 11 मार्च को घोषणा की गई कि इस हमले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (National Investigation Agency : NIA) द्वारा की जाएगी।
  • हमले में नक्सलियों ने पहले आईईडी (IED: Improvised Explosive Device) ब्लास्ट किया और सुरक्षा बलों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
  • यद्यपि सुरक्षा बल संख्या में नक्सलियों से कम थे और हमला अकस्मात हुआ फिर भी उन्होंने डटकर नक्सलियों से मोर्चा लिया, परंतु शीघ्र ही उनका गोला-बारूद समाप्त हो गया।
  • इस हमले से नक्सलियों के दुस्साहस का पता चलता है क्योंकि दक्षिणी छत्तीसगढ़ के व्यस्ततम राजमार्गों में से एक पर यह हमला हुआ। इस क्षेत्र में पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के शिविर स्थित हैं।
  • नक्सलियों द्वारा अपने चुने गए स्थान और समय पर घात लगाकर हमले कर सकने की उनकी दुस्साहसपूर्ण क्षमता भी इस हमले से स्पष्ट हुई।
  • यद्यपि हमले से पूर्व सीआरपीएफ टीम द्वारा अपने गश्ती रूटीन में बदलाव न किए जाने से एक पूर्वानुमेय (Predictible) पैटर्न बन गया जिससे नक्सलियों को उनके संचरण को मॉनिटर करने और गश्ती दल की शक्ति का आकलन करने में मदद मिली।
  • छत्तीसगढ़ के अशांत बस्तर लोक सभा क्षेत्र में 16वीं लोक सभा हेतु मतदान के दो दिनों बाद ही 12 अप्रैल, 2014 को नक्सलियों ने दो अलग-अलग स्थानों पर हमला कर 14 व्यक्तियों को मौत के घाट उतार दिया।
  • पहला हमला छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के कुटरू में अपराह्न के समय चुनाव संपन्न कराकर वहां से लौट रहीं पोलिंग पार्टियों पर हुआ।
  • नक्सलियों ने केतुलनार के समीप बारूदी सुरंग में शक्तिशाली विस्फोट कर बस को उड़ा दिया।
  • इस भीषण हमले में चुनाव ड्यूटी में शामिल सात कर्मचारियों की मौके पर ही मौत हो गई जबकि पांच अन्य को गंभीर चोटें आईं।
  • पहले हमले के कुछ ही देर बाद नक्सलियों ने दरभा के निकट कमनार गांव में एक एंबुलेंस को विस्फोट कर उड़ा दिया।
  • इस हमले में सीआरपीएफ के पांच जवानों समेत एंबुलेंस ड्राइवर तथा एक मेडिकल तकनीशियन की मृत्यु हो गई।