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किशोर आयु-सीमा : उच्चतम न्यायालय का निर्णय

उच्चतम न्यायालय की तीन-सदस्यीय पूर्ण पीठ ने किशोरों की आयु-सीमा के निर्धारण संबंधी याचिका का निस्तारण करते हुए यह निर्णीत किया है कि भारत में किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 के द्वारा निर्धारित किशोर की आयु-सीमा 18 वर्ष विधिपूर्ण है और इससे संविधान के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन नहीं होता है। उच्चतम न्यायालय में यह याचिका डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी और नई दिल्ली में सामूहिक दुष्कर्म एवं हत्या की (16 दिसंबर, 2012) शिकार युवती के पिता की ओर से दायर की गई थी। इस याचिका में याचिकाकर्ताओं ने यद्यपि किशोर न्याय अधिनियम के किसी प्रावधान को सीधे चुनौती नहीं दी थी तथापि इसकी धारा 1(4) अर्थात अधिनियम के विस्तार क्षेत्र, धारा 2(k) अर्थात किशोर की परिभाषा (18 वर्ष का बालक), सपठित धारा 2(l) और धारा 7 के प्रावधानों की व्याख्या किए जाने की मांग की थी उनका तर्क था कि किशोर की आयु-सीमा पर पुनर्विचार करते हुए उसकी मानसिक एवं बौद्धिक परिपक्वता के आधार पर उसके आपराधिक दायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए और गंभीर अपराध के मामलों में उसका विचारण इस अधिनियम के तहत नहीं बल्कि सामान्य कानून के अंतर्गत और सामान्य न्यायालय के द्वारा विनिश्चित किया जाना चाहिए।

  • उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी. सथशिवम तथा न्यायमूर्ति- गण रंजन गोगोई और शिवकीर्ति सिंह की पूर्ण पीठ ने यह निर्णय 28 मार्च, 2014 को डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी और अन्य बनाम राजू, किशोर न्याय बोर्ड और अन्य (2014) के मामले का निस्तारण करते हुए दिया है।
  • उच्चतम न्यायालय की पूर्ण पीठ ने याचिकाकर्ताओं के सभी तर्कों को अमान्य करते हुए तथा याचिकाओं को निरस्त करते हुए अग्रलिखित निर्णय दिया है-
  • यदि विधायिका ने किशोर और वयस्क के बीच में विभाजक रेखा के रूप में 18 वर्ष की आयु को माना है तथा ऐसा निर्णय संविधान के अंतर्गत भी अनुमति योग्य है तब न्यायालयों के द्वारा इसकी समीक्षा (जांच) समाप्त कर दी जानी चाहिए।
  • अन्यथा भी विश्वस्तरीय धारणा है कि 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को किशोर माना जाना चाहिए और उसके साथ अलग से व्यवहार किया जाना चाहिए, जहां तक मामला उसके द्वारा किए गए अपराध से संबंधित है।
  • भारत ने अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन/मानकों/नियमों को स्वीकार किया है और विधायिका ने उसे अपनी बुद्धिमत्ता से वर्तमान प्रारूप में अधिनियमित भी किया है।
  • 18 वर्ष से कम आयु के अपराधियों को एक वर्ग मानकर उनके द्वारा किए गए अपराध के उपचार के लिए अलग व्यवस्था किया जाना विपरीत-मूलक नहीं माना जा सकता है।
  • भारतीय दंड संहिता किशोरों पर भी लागू होगी। अंतर केवल यह है कि मामले के विचारण एवं दंड के मामले में किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधान आरोपित होंगे न कि नियमित कानून के प्रावधान।
  • किशोर अपराधी राजू (दिल्ली गैंगरेप घटना का दोषी) को नियमित न्यायालय में भेजने का कोई प्रश्न ही नहीं है।

किशोर न्याय : स्मरणीय तथ्य

  • किशोर न्याय पर आधारित महत्त्वपूर्ण दस्तावेज ‘बीजिंग नियम’ (Beijing Rules) है भारत इसका एक हस्ताक्षरकर्ता देश है।
  • मूल रूप में इस नियम को ‘यूनाइटेड नेशंस स्टैण्डर्ड मिनिमम रूल्स फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ जुवेनाइल जस्टिस, 1985 के नाम से जाना जाता है। इसमें संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के किशोर कैदियों एवं अपराधियों के विचारण हेतु सामान्य दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया गया है।
  • ‘यूनाइटेड नेशंस रूल्स फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ जुवेनाइल्स डिप्राइव्ड ऑफ देयर लिबर्टी, 1990 को हवाना नियम के नाम से जाना जाता है। इसके अंतर्गत 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को किशोर माना गया है।
  • यह सदस्य राष्ट्रों में किशोर मामलों के लिए एक समिति गठित करने का प्रावधान करता है।
  • इसके अनुपालन में भारत सरकार ने वर्ष 1997 में एक कमेटी गठित की थी और उसकी सिफारिशों (जून, 2000) के आधार पर वर्ष 2006 में किशोर कानून में व्यापक परिवर्तन किए थे।
  • ‘यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ द चाइल्ड, 1990 एक अन्य दस्तावेज सीआरसी के नाम से विख्यात है, जो 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को ‘किशोर’ मानते हुए उसे किसी अपराध में ‘मृत्युदंड’ अथवा आजीवन कारावास देने को प्रतिबंधित करता है।
  • ध्यातव्य है कि कनाडा, ब्रिटेन, ब्राजील, भूटान एवं संयुक्त राज्य अमेरिका में किशोर की अधिकतम आयु-सीमा 18 वर्ष नियत है। किंतु 12-18 वर्ष की आयु के बालक का गंभीर मामलों में दायित्व निर्धारण सामान्य न्यायालयों द्वारा किया जा सकता है, विशेषकर अमेरिका में।
  • उल्लेखनीय है कि सार्क देश बांग्लादेश में किशोर की आयु-सीमा 16 वर्ष से कम निर्धारित है।