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किशनगंगा परियोजना विवाद पर अंतिम निर्णय

जल और ऊर्जा जीवधारियों की मूलभूत आवश्यकताओं में शामिल हैं। किसी भी देश के विकास के लिए इन दो मूलभूत संसाधनों की पर्याप्तता अनिवार्य है क्योंकि जीवन के लिए जल तथा जीवन में गतिशीलता के लिए शक्ति (Power) की आवश्यकता होती है। वर्तमान परिदृश्य में ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए जल एक मुख्य उपादान के रूप में जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन में प्रयुक्त होता है। भारत में भी ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए कई जलविद्युत परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन्हीं परियोजनाओं में से एक किशनगंगा जलविद्युत परियोजना भी है जो जम्मू एवं कश्मीर राज्य में बांदीपुरा के निकट गुरेज घाटी में झेलम की सहायक नदी किशनगंगा पर अवस्थित है। इस परियोजना पर पाकिस्तान ने कई आपत्तियां उठाई थीं और वर्ष 2010 में द हेग (नीदरलैंड्स) स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) में इसके विरोध में अपील दायर की थी। इस अपील पर दिए अपने निर्णय में न्यायालय ने पाकिस्तान के दावों को खारिज कर भारतीय पक्ष को परियोजना के संचालन की अनुमति प्रदान कर दी है।

  • भारत द्वारा जम्मू एवं कश्मीर के बारामुला जिले में किशनगंगा नदी पर 330 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना स्थापित करने के प्रस्ताव के पक्ष में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने 20 दिसंबर, 2013 को अंतिम निर्णय दिया।
  • न्यायालय द्वारा इस विवाद के निपटारे के लिए अमेरिकी न्यायविद स्टीफन एम. स्वेबेल की अध्यक्षता में गठित पंचाट द्वारा निर्गत अंतिम निर्णय में पाकिस्तान की अपील को खारिज कर दिया गया।
  • न्यायालय ने अपने निर्णय में भारत को परियोजना निर्माण हेतु अनुमति प्रदान कर दी तथा अपने निर्णय में न्यायालय ने कहा कि भारत को किशनगंगा नदी में हर समय 9 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड (क्यूमेक्स) का न्यूनतम जल-प्रवाह जारी रखना सुनिश्चित करना होगा।
  • उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान द्वारा नदी में 100 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड का प्राकृतिक प्रवाह बनाए रखने की मांग की गई थी।
  • ध्यातव्य है कि पाकिस्तान द्वारा किशनगंगा परियोजना को वर्ष 1960 के सिंधु जल समझौते (जिसके तहत पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों के जल के अबाधित उपयोग का अधिकार है) का उल्लंघन मानते हुए यह मामला स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के समक्ष वर्ष 2010 में प्रस्तुत किया गया था।
  • उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व पाकिस्तान द्वारा भारत की बगलिहार जलविद्युत परियोजना पर भी आपत्ति दर्ज कराई गई थी जिसे विश्व बैंक के निष्पक्ष मध्यस्थ रेमंड लाफिते ने निरस्त कर दिया था।
  • ज्ञातव्य है कि किशनगंगा झेलम की सहायक नदी है जिसे पाकिस्तान में ‘नीलम’ के नाम से जाना जाता है।
  • इस परियोजना के तहत इस पर 37 मीटर (121 फीट) ऊंचा बांध बनाकर गुरेज घाटी में 103 मीटर गहरा जलाशय बनाया जाएगा तथा किशनगंगा के जल को बोनार मदमती नाला में विस्थापित किया जाएगा।
  • भारत द्वारा वर्ष 2007 में 3,642.04 करोड़ रुपये की लागत से किशनगंगा जलविद्युत परियोजना (NHPC के तहत) प्रारंभ की गई थी।
  • रन ऑफ दि रिवर (R-O-R) प्रणाली पर आधारित इस परियोजना का वर्ष 2016 तक परिचालन प्रारंभ होना प्रस्तावित है।

सिंधु जल समझौता

विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए वर्ष 1960 के सिंधु जल समझौते (IWT) के तहत हिमालय क्षेत्र की भारत से होकर पाकिस्तान में बहने वाली 6 प्रमुख नदियों में से तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम एवं चिनाब) के जल के अबाधित उपयोग का अधिकार पाकिस्तान को तथा तीन पूर्वी नदियों (सतलज, रावी एवं व्यास) का अधिकार भारत को प्रदान किया गया था।