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उत्तर प्रदेश में ‘उर्दू’ दूसरी राजभाषा के रूप में वैध

उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) नामक लगभग एक दशक पुरानी लंबित अपील का निस्तारण करते हुए उच्चतम न्यायालय की पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने उस कानून को वैध और संविधानिक घोषित किया है जिसके अंतर्गत हिंदी के बाद उर्दू को उत्तर प्रदेश की दूसरी राजभाषा घोषित किया गया था। अतः अब उत्तर प्रदेश में उर्दू दूसरी राजभाषा बनी रहेगी।

  •   उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा और न्यायमूर्तिगण दीपक मिश्रा, मदन बी. लोकुर, कुरियन जोसेफ और एस.ए. बोबडे की संविधान पीठ ने यह निर्णय 4 सितंबर, 2014 को राजभाषा से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 345 और 347 की व्याख्या करते हुए दिया है।
  •   ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले 7 अप्रैल, 1982 को जारी एक अध्यादेश के द्वारा और अंततः उत्तर प्रदेश शासकीय (Official) भाषा (संशोधन) अधिनियम, 1989 के द्वारा उत्तर प्रदेश में शासकीय कार्यों के लिए ‘उर्दू’ को दूसरी राजभाषा घोषित किया था।
  •   उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ने अध्यादेश और अधिनियम दोनों को इस आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी कि राज्य में एक भाषा ‘हिंदी’ राजभाषा के रूप में वर्ष 1951 से ही मान्यता-प्राप्त है। अतः उर्दू को राजभाषा घोषित नहीं किया जा सकता है।
  •   उच्च न्यायालय ने हिंदी साहित्य सम्मेलन की याचिका 16 अगस्त, 1996 को निरस्त कर दी थी, जिसके विरुद्ध वर्ष 1997 में उच्चतम न्यायालय में अपील की गई।
  •  उच्चतम न्यायालय में पहले एक खंडपीठ (दो-सदस्यीय पीठ) ने मामला पूर्णपीठ को सौंप दिया और बाद में पूर्णपीठ (तीन-सदस्यीय पीठ) ने भी मामले को 29 अक्टूबर, 2003 को संविधान पीठ को भेज दिया।
  •   संविधान पीठ ने निर्णय दिया है कि उत्तर प्रदेश सरकार का अधिनियम संविधान की मंशा (आशय) के अनुरूप है और वैध तथा संविधानिक है। संविधान में (अनुच्छेद 345) ऐसा कुछ नहीं है जो राज्य में हिंदी के अतिरिक्त एक या अधिक भाषा को शासकीय भाषा के रूप में प्रयोग किए जाने की घोषणा करने से रोकता हो।
  •  निर्णय में उल्लिखित है कि देश के अनेक राज्यों जैसे- बिहार, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड ने राज्य में हिंदी के अतिरिक्त अन्य स्थानीय भाषाओं, जो आम जनता के द्वारा अधिक प्रयोग की जाती हैं, को शासकीय भाषा के रूप में मान्यता दी है।

भाषा संबंधी संविधानिक प्रावधान

संविधान के भाग 17 के कुल 4 अध्याय (अनुच्छेद 343 से 351) राजभाषा से संबंधित हैं।

अध्याय 1, अनुच्छेद 343 और 344 संघ की राजभाषा (केंद्र सरकार की शासकीय भाषा) से संबंधित हैं।

 अनुच्छेद 343(1) के अनुसार, संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी तथा अंकों का रूप भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप अर्थात 1, 2, 3,4…….होगा।

   अध्याय 2, अनुच्छेद 345 से 347 प्रादेशिक भाषाओं से संबंधित है, जिसके अनुच्छेद 345 में प्रावधान किया गया है कि किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा उस राज्य में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को या हिंदी को उस राज्य के सभी या किन्हीं शासकीय प्रयोजनों (उपयोग) के लिए (राजभाषा के रूप में) स्वीकार कर सकता है।

  इसी अनुच्छेद के अधीन सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश शासकीय भाषा अधिनियम, 1951 के द्वारा घोषित किया गया कि हिंदी राज्य की राजभाषा होगी तथा लिपि देवनागरी लिपि होगी।

  अनुच्छेद 347 के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी राज्य की जनसंख्या के किसी भाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा को ‘राजभाषा’ के रूप में मान्यता दिए जाने के लिए राज्य को निर्देश दे सकता है, किंतु इस अनुच्छेद का प्रयोग संभवतः राष्ट्रपति को नहीं करना पड़ा है क्योंकि भाषा विवाद अनुच्छेद 345 के अंतर्गत ही निस्तारित होते रहे हैं।

  अध्याय 3, अनुच्छेद 348 और 349 में देश के उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की भाषा से संबंधित प्रावधान किया गया है।

अध्याय 4 के अनुच्छेद 350 से 351 में विविध उपबंध किए गए हैं, जिनमें भाषा संबंधी व्यथा (पीड़ा) का निवारण (अनुच्छेद 350), प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने (अनुच्छेद 350 क), भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी की नियुक्ति (अनुच्छेद 350 ख) तथा हिंदी भाषा के विकास के लिए संघ के कर्त्तव्यों (अनुच्छेद 351) का उल्लेख किया गया है।

  •  दिल्ली में तो ‘हिंदी’ के अलावा ‘पंजाबी’ और ‘उर्दू’ को भी शासकीय काम-काज की भाषा (राजभाषा) के रूप में मान्यता प्राप्त है।
  •  मात्र यह कि हिंदी को स्पष्ट रूप से या अलग से राज्य में सरकारी भाषा के रूप में अपनाए जाने की घोषणा की जा चुकी है, यह किसी अन्य भाषा को सरकारी भाषा के रूप में अपनाने के किसी राज्य के विधानमंडल के विकल्प को बंद नहीं कर देता है।
  •  न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 345 में प्रयोग की गई शब्दावली ‘‘उस राज्य में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को ‘या’ हिंदी को’’ का तात्पर्य यह नहीं है कि ‘हिंदी’ को ‘राजभाषा’ घोषित करने के बाद किसी अन्य भाषा को ‘राजभाषा’ घोषित नहीं किया जा सकता है, बल्कि इसका तात्पर्य यह है कि ‘हिंदी’ को ‘राजभाषा’ घोषित किए जाने के बाद भी राज्य का विधानमंडल उस राज्य में प्रयोग होने वाली अन्य भाषाओं में से एक या अधिक को राजभाषा घोषित कर सकता है।