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20वां संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन

जलवायु परिवर्तन हमारे जीवन के अस्तित्व और विकास से जुड़ी एक गंभीर वैश्विक समस्या है जिसके परिणामस्वरूप संपूर्ण विश्व में बड़े पैमाने पर उथल-पुथल प्रत्याशित है, जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के द्वीपों का अस्तित्व तो संकटग्रस्त हो ही रहा है, यह मानव जीवन पर विपरीत प्रभाव के साथ प्राकृतिक आपदाओं जैसे- बाढ़, सूखा, समुद्री तूफान आदि की आवृत्ति भी बढ़ा रहा है। जलवायु परिवर्तन से एक तरफ जहां फसलों की उत्पादकता में कमी और उनके चक्रण स्वरूप में परिवर्तन से किसानों की आर्थिक दशा में गिरावट अवश्यंभावी है, वहीं विकास की लागतें बढ़ने से भावी गुणवत्ता भी कमजोर होगी, ऐसे में जलवायु परिवर्तन के वैश्विक दुष्प्रभावों को देखते हुए समय की सबसे बड़ी आवश्यकता इससे निपटने के लिए एक नियोजित और दीर्घकालिक रणनीति पर काम करने की है क्योंकि विकास की अनियोजित प्रक्रिया से पर्यावरणीय अपकर्षण बढ़ रहा है, पृथ्वी की जीवन शक्ति और अनुकूलन धारित करने की क्षमता घट रही है। प्राकृतिक साधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण कई प्रकृतिजन्य संकट हमारे समक्ष खड़े हो रहे हैं, पृथ्वी का तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, ओजोन परत में छेद हो जाने के कारण इसकी सूर्य की पराबैंगनी किरणों को रोकने की क्षमता घट रही है। कुल मिलाकर प्रकृति के निर्मम संहार के चलते उत्पन्न जलवायु परिवर्तन आज विश्व के समक्ष ज्वलंत और मुखर चुनौती बन गई है। इस दिशा में दुनिया भर के लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए पहली बार वैश्विक स्तर पर 5 से 16 जून, 1972 के मध्य स्टॉकहोम (स्वीडन) में मानवीय पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन हुआ, इस सम्मेलन की दसवीं वर्षगांठ मनाने के लिए 10 से 18 मई, 1982 को नैरोबी (केन्या) में राष्ट्रों का सम्मेलन हुआ जिसमें पर्यावरण से जुड़ी विभिन्न कार्य योजनाओं का एक घोषणा-पत्र स्वीकृत किया गया।
स्टॉकहोम सम्मेलन की बीसवीं वर्षगांठ पर 3 से 14 जून, 1992 को रियो डी जनेरियो (ब्राजील) में संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी शिखर सम्मेलन हुआ जिसमें पर्यावरण एवं विकास को अन्योन्याश्रित स्वीकार करते हुए पृथ्वी के पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सभी देशों के सामान्य अधिकारों एवं कर्त्तव्यों को सैद्धांतिक रूप से परिभाषित किया गया। इसी सम्मेलन के दौरान जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए सार्थक प्रयासों हेतु ‘जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन’ (यूएनएफसीसीसी) नामक संधि हस्ताक्षरित की गई जिसके तहत जलवायु परिवर्तन पर पहला संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (CoP1) वर्ष, 1995 में बर्लिन (जर्मनी) में हुआ था, तब से अब तक इसके बीस वार्षिक सम्मेलन हो चुके हैं और इसका 20वां सम्मेलन कोप-20 (20th Session of the Conference of the parties to the UNFCCC) पेरू की राजधानी लीमा में 1 से 14 दिसंबर, 2014 तक आयोजित किया गया। इस सम्मेलन को 12 दिसंबर, 2014 को ही संपन्न होना था लेकिन किसी समझौते पर अंतिम रूप से नहीं पहुंचने की वजह से सम्मेलन को 14 दिसंबर तक के लिए बढ़ा दिया गया, सम्मेलन में दुनिया के 194 देशों के प्रतिनिधियों सहित विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों के 12,500 राजनीतिज्ञ, राजनयिक, जलवायु कार्यकर्त्ता एवं मीडियाकर्मियों ने भाग लिया और जलवायु परिवर्तन की समस्या एवं उसके समाधान पर गंभीर चर्चा की गई। पेरू के पर्यावरण मंत्री मैनुएल पुलगर विदाल ने इस सम्मेलन की अध्यक्षता की और सम्मेलन को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ‘बान-की-मून’ ने भी संबोधित किया। भारत का प्रतिनिधित्व पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने किया। इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कटौती के राष्ट्रीय संकल्पों के लिए आम सहमति वाले प्रारूप की स्वीकृति रही है जिसमें भारत सहित विकासशील देशों की चिंताओं का समाधान किया गया है।

  • जलवायु कार्रवाई का लीमा आह्वान
  • लीमा जलवायु सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मुद्दे पर विकसित एवं विकासशील देशों के बीच दो हफ्ते से विद्यमान गतिरोध अंततः 14 दिसंबर, 2014 को समाप्त हो गया, और अंतिम क्षण में दिसंबर, 2015 में पेरिस के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाली नई वैश्विक जलवायु संधि के मसौदा प्रस्ताव पर सहमति बन गई।
    इस मसौदे को पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में एक ऐतिहासिक समझौते के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि इससे वर्ष 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में 20 प्रतिशत तक कमी लाने की उम्मीद बढ़ी है, अब इस मसौदे को दिसंबर, 2015 में पेरिस में ‘भिन्न राष्ट्रीय परिस्थितियों के आलोक में साझी लेकिन विभेदीकृत जिम्मेदारियां एवं संबंधित क्षमता के सिद्धांत’ के रूप में प्रस्तुत होना है। बहरहाल लीमा सम्मेलन में दुनिया के 194 देशों ने उत्सर्जन कटौती के राष्ट्रीय संकल्प के इस मसौदे को स्वीकार कर लिया है जिससे जलवायु परिवर्तन के मुकाबले के लिए एक बाध्यकारी करार पर हस्ताक्षर का रास्ता साफ हो गया है। ‘जलवायु कार्रवाई का लीमा आह्वान’ नाम के इस मसौदे को दिसंबर, 2015 में पेरिस सम्मेलन में अंतिम रूप से स्वीकृत होना है।
    यह पहला मौका है जब कार्बन उत्सर्जन के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ चुके चीन, भारत व ब्राजील सहित अन्य विकासशील देश अपने कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने पर सहमत हुए हैं, स्वीकृत नए मसौदे के तहत संयुक्त राष्ट्र के सदस्य सभी देश 31 मार्च, 2015 तक अपने उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य को प्रस्तुत करेंगे।
  • गरीबी उन्मूलन और टिकाऊ विकास पर मतभेद
  • अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अक्सर आमने-सामने नजर आने वाले विकसित और विकासशील देश एक बार फिर इसी मुद्रा में नजर आए और सम्मेलन में शिरकत कर रहे देश दो धड़ों में बंट गए। चूंकि पेरिस सम्मेलन से पहले जलवायु परिवर्तन के मामले में पूरा खाका तय करके सभी देशों को अपनी प्रतिबद्धता बतानी है। जिसके तहत कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण के तरीकों को बताने के साथ यह भी बताना है कि कौन-सा देश कब कार्बन उत्सर्जन के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचेगा, इसलिए विकसित देश चाहते हैं कि जलवायु परिवर्तन की बात करते समय विकासशील देश अपने यहां गरीबी उन्मूलन जैसे कार्यक्रमों का हवाला न दें और न ही ऊंची तकनीक पर खर्च में कोई कटौती करें जबकि विकासशील देशों का कहना है कि वे अपने विकास संवर्धन और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की अनदेखी कर जलवायु परिवर्तन की बात नहीं कर सकते, गरीबों की कीमत पर पर्यावरण नहीं बचाया जा सकता, विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा के लिए उम्दा तकनीक चाहिए जिसमें अमीर देशों को मदद करनी ही होगी।
    विकासशील देशों का यह रूख पेरिस सम्मेलन से पहले काफी प्रभावी हो सकता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के नाम पर विकसित देशों ने विकासशील देशों की मदद के लिए जो 100 अरब डॉलर का फंड बनाने की बात की थी उसमें नाममात्र का मौद्रिक कोष संचित हुआ है और वास्तविक कोष वितरण के नाम पर गरीब देशों को कुछ भी मदद नहीं मिली है। सम्मेलन में दोनों पक्षों के बीच विरोध इतना प्रबल रहा कि ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन ने यहां अपना अलग मंच बना लिया। इस मंच पर सभी देशों की जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्य-योजनाओं (Intended Nationaly Determined Contribution-INDC) पर विचार-विमर्श के दौरान भारतीय प्रतिनिधि प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि बेसिक देश कई मसलों को लेकर एकमत हैं और वे आईएनडीसी को संरचनात्मक स्तर पर अधिक अनुकूलन आधारित बनाने पर सहमत हुए हैं। दूसरी ओर यूरोपीय संघ और जापान जैसे विकसित देश जलवायु परिवर्तन समझौते को केवल न्यूनीकरण की व्यवस्था पर केंद्रित रखने पर जोर देते रहे।
  • लीमा सम्मेलन और भारत
  • सम्मेलन के आरंभ में भारत से पर्यावरण मंत्रालय में अपर सचिव सुशील कुमार के प्रतिनिधित्व में करीब छह प्रतिनिधि लीमा पहुंचे थे, बाद मंल पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर 7 दिसंबर, 2014 को सम्मेलन में प्रतिनिधित्व के लिए पहुंचे। जलवायु अनुकूलता के लिए दीर्घकालिक वैश्विक लक्ष्य निश्चित हों जो गुणवत्ता और मात्रा में दोनों स्पष्ट रूप से दिखें।
    सम्मेलन में भारत के लिए सबसे बड़ी सफलता यह थी कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कटौती के राष्ट्रीय संकल्पों के लिए बने सहमति प्रारूप में भारत की सभी बातों को मानते हुए विकासशील देशों की चिंताओं का समाधान किया गया है। सम्मेलन के नतीजों पर प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि यद्यपि वह आईएनडीसी के तहत भावी उत्सर्जन कटौती की समीक्षा के पक्ष में नहीं है क्योंकि सभी देशों को जलवायु परिवर्तन संबंधी जरूरतों को निर्धारित करने की आंतरिक स्वतंत्रता है, फिर भी हमें खुशी है कि सम्मेलन में स्वीकृत मसौदे ने विकासशील देशों की चिंताओं पर ध्यान दिया है तथा इसमें अमीर देशों को अधिक कठोर वित्तीय मदद की प्रतिबद्धताएं करने और वर्ष 2020 से ‘हरित जलवायु कोष’ को बढ़ाकर 100 अरब डॉलर प्रतिवर्ष करने का भी स्पष्ट अधिकार दिया है। विकसित देश, विश्व प्रौद्योगिकी विकास, हस्तांतरण और क्षमता निर्माण के लिए संसाधनों को मुहैया कराने के लिए भी अधिदेशित हैं।
  • प्रथम जलवायु अनुकूलन गैप रिपोर्ट
    लीमा जलवायु वार्ता के दौरान ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (UNEP) ने 5 दिसंबर, 2014 को प्रथम जलवायु अनुकूलन गैप रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु निम्नवत हैं :-
  • यदि वैश्विक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के स्तर में इस हद तक कटौती की जाए जिससे कि वैश्विक तापमान दो डिग्री सेल्सियस से नीचे स्तर तक रहे, तब भी विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन की लागत वर्ष 2050 तक प्रतिवर्ष 70 से 100 अरब अमेरिकी डॉलर के पिछले अनुमान से दो से तीन गुनी रहेगी।
  • वर्ष 2012-13 में अनुकूलन फंडिंग 23-26 अरब डॉलर पहुंचने के बावजूद वर्ष 2020 के बाद अनुकूलन के लिए नए और अतिरिक्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता पड़ेगी।
  • ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कटौती पर आगे की कार्रवाई किए बिना जलवायु परिवर्तन के तीव्र प्रभावों से विश्व समुदायों की रक्षा के लिए और अधिक कार्यवाही करनी होगी इसलिए जलवायु अनुकूलन की लागत में आवश्यक रूप से अधिक वृद्धि होगी।
  • अल्प विकसित और छोटे द्वीपीय देशों को अधिकाधिक जलवायु अनुकूलन की जरूरत है, इन क्षेत्रों में शीघ्र प्रयासों के बिना जलवायु अनुकूलन अंतर की खाई अधिक चौड़ी होती चली जाएगी।
  • जलवायु अनुकूलन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए यद्यपि वित्तीय प्रतिबद्धताओं में हाल के वर्षों में वृद्धि हुई है लेकिन इन्हें बढ़ाने की आवश्यकता है।
  • निजी क्षेत्र द्वारा जलवायु अनुकूलन में फंडिंग के लिए व्यवस्थित मार्ग नहीं है जिससे जलवायु अनुकूलन में उनके वित्तीय योगदान के अनुमानों को कम करके आंका जाता है।
  • जलवायु अनुकूलन की फंडिंग हेतु संसाधनों को अतिरिक्त राजस्व, अंतर्राष्ट्रीय उत्सर्जन भत्तों की नीलामी और घरेलू उत्सर्जन व्यापार योजनाओं में भत्तों की नीलामी करके, अंतर्राष्ट्रीय परिवहन और वित्तीय विनिमय करों से प्राप्त राजस्व द्वारा बढ़ाया जा सकता है।
  • सभी विकासशील देशों के लिए यह विश्लेषण बताता है कि जलवायु अनुकूलन की लागत वर्ष 2025 अथवा 2030 तक 150 अरब डॉलर प्रतिवर्ष से बढ़कर 2050 में 250 अरब डॉलर प्रतिवर्ष तक बढ़ सकती है, यह लागत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिए प्रभावी कार्यवाही की आवश्यकता पर आधारित है।
  • रिपोर्ट में अधिक प्रभावी ढंग से जलवायु परिवर्तन और अनुकूलन पर मौजूदा ज्ञान भंडार के उपभोग पर बल देते हुए कहा गया है कि कई क्षेत्रों और देशों में जलवायु अनुकूलन पर ज्ञान के विश्लेषण का अभाव है जबकि मौजूदा ज्ञान का सदुपयोग जलवायु अनुकूलन उद्देश्य को प्राप्त करने में सभ्य समाज की बहुत हद तक सहायता कर सकता है।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु अनुकूलन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए 26 से 115 अरब डॉलर का प्रबंध 2020 तक और 70 से 220 अरब डॉलर तक का प्रबंध 2050 तक किया जा सकता है।
  • रिपोर्ट में जलवायु अनुकूलन हेतु प्रौद्योगिकीय प्रसार और अंतर्राष्ट्रीय हस्तांतरण में तीव्रता की जरूरत पर बल देते हुए कहा गया है कि तकनीकी हस्तांतरण में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए सरकारी प्रयासों की आवश्यकता है।
  • रिपोर्ट में वैज्ञानिक रूप से विकसित बीजों के प्रयोग पर जोर देते हुए कहा गया है कि इनको अधिकांश अफ्रीकी देशों में परिवर्तित मौसम के संदर्भ में कृषि को बनाए रखने के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
  • लीमा के बाद
  • लीमा सम्मेलन के बाद अब सबकी निगाहें वर्ष 2015 में पेरिस में होने वाले समझौते पर टिकी हैं जिसको सफल बनाने के लिए अभी बहुत प्रयास करने शेष हैं। जलवायु परिवर्तन ऐसा संकट है जिसका समाधान समय पर नहीं हुआ तो धरती की जीवनदायिनी क्षमता ही खतरे में पड़ सकती है, समुद्र का जलस्तर उठने से विशाल तटीय क्षेत्र जलमग्न हो सकते हैं, खाद्य सुरक्षा संकटग्रस्त हो सकती है और कई छोटे टापू देशों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है, कुछ हद तक तो यह सब शुरू भी हो चुका है।
    अभी तक समुद्री जलस्तर बढ़ने से दुनिया में 18 द्वीप जलमग्न हो चुके हैं, भारत में ही 54 द्वीपों के समूह सुंदरबन पर खतरा मंडरा रहा है, यही नहीं आकलैंड, न्यूजीलैंड और दस लाख की आबादी वाला किरिबाती द्वीप भी संकट में है अभी किरिबाती के लोगों को 6000 एकड़ जमीन खरीदकर फिजी में बसाने की योजना पर काम चल रहा है,मालदीव में भी आबादी को नई जगह बसाने के लिए जमीन खरीदने पर विचार हो रहा है, भारत के असम में ब्रह्मपुत्र नदी के बीचोबीच स्थित दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली बाढ़ और भूमि कटाव के कारण खतरे में है, इसका क्षेत्रफल 1278 वर्ग किमी. से घटकर केवल 557 वर्ग किमी. रह गया है, अगर ग्लोबल वार्मिंग के चलते समुद्री जलस्तर में वृद्धि की यही रफ्तार रही तो वर्ष 2020 तक 14 द्वीप पूरी तरह खत्म हो जाएंगे और छोटे द्वीपों पर रहने वाले करीब दो करोड़ लोग वर्ष 2050 तक विस्थापित हो चुके होंगे, इसलिए अब जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए लेकिन चिंता यही है कि अभी तक ऐसी योजना पर सहमति नहीं बन सकी है जो वास्तव में प्रभावी हो, लीमा वार्ता से यह संतोष हो सकता है कि 194 देशों ने एक दस्तावेज को स्वीकृत किया है लेकिन अधिक व्यापक और अहम सवाल फिर भी सामने रह जाता है कि क्या उचित समय में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में इतनी कमी लाई जा सकेगी जिससे जलवायु परिवर्तन के संकट को आवश्यकता के अनुसार कम किया जा सके।
  • निष्कर्ष
  • लीमा में जलवायु परिवर्तन को लेकर शुरू हुई अंतर्राष्ट्रीय बहस में वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य तय करने के समझौते तक पहुंचने के लिए भारत सहित 194 देशों के प्रतिनिधियों ने यहां शिरकत की और 14 दिनों तक चले इस सम्मेलन में तमाम दलीलों पर विचार-विमर्श के बाद पेरिस सम्मेलन में हस्ताक्षर के लिए समझौते का जो मसौदा तय किया गया उसमें कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर आम सहमति बन गई है। अब दुनिया भर के प्रतिनिधियों की कोशिश धरती का तापमान बढ़ाने वाली गैसों के वैश्विक उत्सर्जन को नियंत्रण में करने वाले समझौते पर आधारित कटौती मानकों के राष्ट्रीय संकल्पों को प्रबल बनाने की होगी।
    बहरहाल विकसित और विकासशील देशों के बीच विद्यमान गतिरोध की गुत्थी इस बार सुलझा ली गई है अब पर्यावरण पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है, विकसित देशों को इस संबंध में अपने वादे पूरे करने चाहिए, जलवायु परिवर्तन के नाम पर उन्होंने गरीब देशों की मदद के लिए जो 100 अरब डॉलर की फंड बनाने की बात की थी, उसमें नाममात्र का मौद्रिक कोष हुआ है, फिर भी विकासशील देशों के लिए भी कमर कसने का वक्त आ गया है क्योंकि वैश्विक तापन हर किसी पर अपना असर डाल रहा है। हर जीव-जाति इससे प्रभावित हो रही है। मॉरीशस, मालदीव, इंडोनेशिया और फिलीपींस ही नहीं भारत के लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार के भी बहुत से द्वीपों के गायब हो जाने तक का खतरा पैदा हो गया है इसलिए अब और देरी ठीक नहीं है। 